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पश्चिम बंगाल के हालिया चुनावी परिणामों को केवल सत्ता परिवर्तन के रूप में देखना एक गंभीर भूल होगी. यह केवल सरकार बदलने की कहानी नहीं है-यह उस सोच के टूटने की कहानी है, जिसने बंगाल को दशकों तक एक फर्जी रोमांटिसिज़्म वैचारिक दायरे में बांधकर रखा था और इसी वैचारिकता की आड़ में पश्चिम बंगाल की राजनीति को दशकों तक एक ‘अपवाद’ के रूप में प्रस्तुत किया गया. कहा गया कि यह राज्य बाकी भारत से अलग है. यहां विचारधारा चलती है, यहां पहचान नहीं, ‘बंगालियत’ जीतती है. यहां हिंदू-मुस्लिम नहीं, वर्ग-संघर्ष की राजनीति होती है. लेकिन पश्चिम बंगाल में जो कुछ हो रहा था वह एक तरफा था. हिंदू-मुस्लिम एकता की आड़ में मुस्लिम रिवाज सनातनी परंपरा पर हावी किया जा रहा था. लेकिन आज पश्चिम बंगाल विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी की जीत के बाद आज यह पूरा नैरेटिव दरकता हुआ दिखाई दे रहा है. अब सवाल सीधा है-क्या पश्चिम बंगाल में इस बार जो हुआ, वह सिर्फ सत्ता परिवर्तन है? या फिर यह उस लंबे दबाव का विस्फोट है, जिसे ‘हिंदू पुनर्जागरण’ कह सकते हैं?

वैचारिक रोमांटिसिज़्म का मिथक आखिर टूट गया

इस विधानसभा चुनाव में जो परिणाम सामने आए वे यह संकेत देते हैं कि मतदाता अब केवल फर्जी रोमांटिसिज़्म के आधार पर निर्णय नहीं ले रहा. वह अपनी पहचान, सुरक्षा और भविष्य तीनों को ध्यान में रखकर वोट कर रहा है. पश्चिम बंगाल के मतदाताओं ने यह साबित करने की कोशिश की है कि पिछले डेढ़ दशकों में ममता बनर्जी ने वोट तो सबका लिया मगर काम सिर्फ और सिर्फ मुसलमान के हित में करने कि कोशिश की. तभी जुबान ही सही बंगाली मतदाता यह बोल रहे थे कि ममता बनर्जी का अगर अधिकार चलता तो खुले तौर पर वह या घोषणा कर देती की उनकी सरकार में हिंदुओं को सरकारी योजनाओं से वंचित किया जाता है. हिंदुओं को उनके संस्कृत रीति रिवाज पर प्रशासनिक पाबंदी लगाई जा रही थी वही मुसलमान को कुछ भी करने की खुली छूट ममता सरकार में दी गई थी.

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तुष्टिकरण बनाम प्रतिक्रिया: राजनीति का नया ध्रुवीकरण

ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के रहते हुए खुद को मुसलमान के अंतरराष्ट्रीय रहनुमा होने के साथ-साथ अल्ट्रा वामपंथी साबित करने की कोशिश की. ममता बनर्जी न संदेश देने की कोशिश की कि उन्हें हिंदू वोटो की चिंतानहीं हैं और न ही हिंदुओं के सभ्यता और संस्कृतियों का कोई ख्याल रखती हैं. लेकिन हर राजनीतिक संदेश एक प्रतिक्रिया पैदा करता है. और यही प्रतिक्रिया धीरे-धीरे एक बड़े राजनीतिक ध्रुव में बदल गई, जहां एक वर्ग ने यह महसूस करना शुरू किया कि उसकी पहचान और हितों को समान प्राथमिकता नहीं मिल रही. यहीं से पश्चिम बंगाल में हिंदू वोट एक राजनीतिक अवधारणा के रूप में उभरा और भाजपा को बिना किसी बड़े संगठन के ही बिस्तर मिल गया.

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बांग्लादेश फैक्टर: भावना, भय और राजनीति

पश्चिम बंगाल की सीमा बांग्लादेश से जुड़ी है. यह केवल भूगोल नहीं, बल्कि राजनीति भी है. जब बांग्लादेश में हिंदु समुदाय के खिलाफ हिंसा की खबरें आती हैं, तो उसका असर केवल अखबारों तक सीमित नहीं रहता. सीमावर्ती जिलों में यह एक सामाजिक चर्चा का हिस्सा बनता है. हाल ही में बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के दौरान और उसके बाद जिस तरीके के हिंसा हुई और उसे हिंसा में हिंदुओं को निशाना बनाया गया उसके बाद पश्चिम बंगाल की सोचने पर विवश हुए. पश्चिम बंगाल के हिंदुओं के मन में यह विचार घर कर गया कि अगर यहां भी मुसलमान की आबादी लगातार बढ़ती रही और मुसलमान ताकतवर होते रहे तो कहीं हिंदुओं के अस्तित्व पर खतरा तो नहीं हो जाएगा? क्या यह असर सीधे वोट में बदलता है? इसका कोई सीधा गणित नहीं है. लेकिन यह मतदाता की मनोवृत्ति को प्रभावित करता है. पश्चिम बंगाल के कई हिस्सों में यह भावना उभरती दिखी है कि जनसंख्या, सांस्कृतिक प्रभाव और राजनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव भविष्य को प्रभावित कर सकते हैं. एक और जहां एसआईआर के मुद्दे पर टीएमसी मुसलमानो के भीतर आग लगा रही थी वही पश्चिम बंगाल के हिंदुओं के भीतर बांग्लादेश में हो रहे हिंदू पर अत्याचार के खिलाफ चिंगारी सुलग रही थी जो मतदान के दिन धधक उठा.

भाजपा: संगठन नहीं, एक मंच

भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल में जो हासिल किया, वह केवल संगठन विस्तार का परिणाम नहीं है. यह उस राजनीतिक स्पेस को भरने का प्रयास है जो लंबे समय तक खाली पड़ा था. भाजपा ने खुद को एक ऐसे मंच के रूप में पेश किया जहां एक विशेष सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को राजनीतिक अभिव्यक्ति मिल सकती है. इसने उन मतदाताओं को आकर्षित किया, जो खुद को पहले राजनीतिक रूप से अनसुना महसूस करते थे.

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वामपंथ का अंत: एक विचारधारा का पतन

पश्चिम बंगाल में वामपंथ केवल एक राजनीतिक दल नहीं था वह एक विचार था, एक व्यवस्था थी, एक राजनीतिक संस्कृति थी. लेकिन आज वह लगभग अप्रासंगिक हो चुका है. यह केवल चुनावी हार नहीं है यह उस वैचारिक ढांचे का पतन है, जिसने वर्ग की राजनीति को पहचान की राजनीति से ऊपर रखा था.

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कांग्रेस: असमंजस की राजनीति

कांग्रेस की स्थिति सबसे दिलचस्प और सबसे कमजोर है. राष्ट्रीय स्तर पर वह भाजपा के खिलाफ गठबंधन की बात करती है. लेकिन राज्य स्तर पर वही सहयोगी दल उसके प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं. यह दोहरी रणनीति उसे कहीं का नहीं छोड़ रही. बंगाल में कांग्रेस आज न तो एक स्वतंत्र शक्ति है, न ही एक निर्णायक सहयोगी.

क्या यह ‘हिंदू पुनर्जागरण’ है?

अब मूल सवाल-क्या इसे ‘हिंदू पुनर्जागरण’ कहा जा सकता है? अगर पुनर्जागरण का मतलब है एक ऐसी पहचान का राजनीतिक रूप से सक्रिय होना, जो पहले निष्क्रिय थी, तो हां, कुछ हद तक यह शब्द लागू हो सकता है. लेकिन अगर इसका मतलब यह है कि पूरा चुनाव केवल इसी एक कारक पर आधारित है, तो यह निष्कर्ष जल्दबाजी होगा. फिर भी, यह मानने में हिचक नहीं होनी चाहिए कि पश्चिम बंगाल में अब ‘हिंदू वोट’ एक राजनीतिक वास्तविकता बन चुका है, जिसे नज़रअंदाज़ करना किसी भी दल के लिए मुश्किल होगा.

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नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं. न्यूज 24 किसी तथ्य की पुष्टि नहीं करता.

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First published on: May 04, 2026 04:38 PM

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