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गणतंत्र दिवस हमारे देश की स्वतंत्रता संग्राम की महानता का प्रतीक है, लेकिन आजादी का वास्तविक अर्थ केवल तिरंगे के तीन रंगों और राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान से कहीं अधिक है। यह सिर्फ एक प्रतीक नहीं, बल्कि एक गहरी और व्यापक स्वतंत्रता की भावना है, जिसे समझने की आवश्यकता है।
जब हम आज़ादी के बारे में सोचते हैं, तो अक्सर हमारे मन में यह सवाल उठता है कि क्या आज़ादी सिर्फ तीन रंगों का नाम है, जो एक पहिये के सहारे चलते हैं, या इसका कोई और गहरा मतलब है? यह सवाल हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि आज़ादी का असली मतलब क्या है और हम उसे किस तरह से समझ सकते हैं।
आज़ादी का सबसे पहला और महत्वपूर्ण मतलब है कि हम अपने अतीत से पूरी तरह से मुक्त हो जाएं। जब हम अतीत के बोझ तले जीते हैं, तो हम आज़ादी को सही मायने में नहीं जी पाते। हमारा अतीत हम पर इतना हावी हो जाता है कि हम उसी के अनुसार अपना वर्तमान और भविष्य तय करने लगते हैं। आज़ादी की सच्ची भावना हमें तभी समझ में आती है जब हम अपने अतीत के गलतियों, घावों और पुरानी पहचान से बाहर निकलते हैं। हमें यह समझना होगा कि हमारा भविष्य हमारे अतीत से नहीं, बल्कि हमारे वर्तमान से निर्मित होता है। हमें अपने अतीत को एक डेटा की तरह देखना चाहिए, न कि उसे अपने जीवन की स्क्रिप्ट मानकर जीना चाहिए।
भारत को आज़ादी की पहली आवश्यकता “अतीत से मुक्ति” है। हम अतीत की गौरव गाथाओं या दुखों को अपने वर्तमान पर हावी नहीं होने दे सकते। अगर हम अतीत से पूरी तरह से मुक्त नहीं होते, तो हम अपने जीवन की वास्तविक चुनौतियों का सही तरीके से सामना नहीं कर सकते। जैसे पुराने फोन का उपयोग करके हम नई तकनीकी सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं, वैसे ही अगर हम अतीत के भ्रम में जीते हुए अपने वर्तमान और भविष्य को नहीं समझ पाते।
कैसे होगा सच्ची आजादी का अहसास
आज़ादी का असली मतलब यह नहीं है कि हम अतीत को दोहराएं, बल्कि यह है कि हम अतीत से मिले ज्ञान को वर्तमान में लागू करें। हम उस समय के महापुरुषों से प्रेरणा ले सकते हैं, लेकिन उनका जीवन और उनके विचारों का अनुसरण करते हुए हमें यह समझना चाहिए कि उनका उद्देश्य क्या था। अगर हम अतीत को दोहराने की बजाय उसके मूल्य और उद्देश्य को समझते हुए, अपने वर्तमान को संवारते हैं, तो तभी सच्ची आज़ादी का अहसास होगा।
गणतंत्र दिवस के अवसर पर यह समझने की जरूरत है कि आज़ादी का मतलब केवल प्रतीकों और समारोहों से नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन की दिशा, सोच और समझ में गहरी स्वतंत्रता से है। हमें अतीत से सीखा हुआ ज्ञान वर्तमान में लागू करना चाहिए, ताकि हम अपने जीवन को स्वतंत्रता और समझ से जी सकें।
कहते हो ना, सत्यम शिवम सुंदरम? मानते हो ना कि सच ऊँचा है? और जो सच है, अगर वही शिव है, तो शिव भी ऊँचा है? और ये भी मानते हो कि उसी में सौंदर्य है, सौंदर्य में भी ऊँचाई है? तो भारत की महानता सत्य में है। भारत महान है, अगर जो अपने आप को भारतवासी कहता है, वह सच की ही तरफ़ खड़ा होता है, चाहे जो कीमत देना पड़ती हो, झूठ की तरफ़ नहीं। भारत महान है, अगर जो अपने आप को ‘भारतवासी’ कहता है, ‘भारतीय’ कहता है, वह शिवत्व का पुजारी है; माया का नहीं, अंधकार का नहीं, अज्ञान का नहीं। और भारत महान है, अगर जो अपने आप को ‘भारतीय’ कहता है, वह सौंदर्य का रचयिता है, विकृति और कुरूपता का नहीं।
भारत महान तभी है जब भारतीयों में महानता की कद्र हो, और इसी कारण इतिहास में भारत की महानता रही है। सच का पालना रहा है भारत, इसलिए महान रहा है, और कोई वजह नहीं; बाकी आप कितनी वजहें गिनते रहो। कवियों ने बहुत वजहें बताई हैं। कवि कहते हैं “देखो, हिमालय मुकुट की तरह है और सागर हमारे चरण पखारता है, इसलिए भारत महान है।” ये सब कोई बात नहीं हुई, इस तरह की भौगोलिक रचनाएँ आपको और जगहों पर भी मिल जाएँगी।
कोई आकर कहता है कि – “भारत में इतनी भाषाएँ हैं, इतनी बोलियाँ हैं, इतनी विविधताएँ हैं, इसलिए भारत महान है।” रूस जाकर देख लीजिए, चीन जाकर देख लीजिए, और भी जगहें हैं जहाँ क्षेत्रीय और भाषाई विविधता भारत जितनी ही है, भारत से ज़्यादा भी है। तो ये विविधता भी कोई बहुत महानता की बात नहीं हो गई। ये सब उच्च कोटि के लक्षण हैं। ये सब किसी भी जगह से संबंधित सद्गुण हैं, लेकिन महानता की बात नहीं है।
जब सभ्यता और संस्कृति घुटनों पर ही चल रहे थे, तब भारत ने अस्तित्व को लेकर गहरे प्रश्न पूछने शुरू किए, इसलिए भारत महान है। ऋग्वेद का नासदीय–सूक्त याद है ना: “सृष्टि से पहले क्या था?” बाकी दुनिया अभी ये भी नहीं पूछ रही थी कि – “सृष्टि माने क्या,” और यहाँ कोई था, वह ये पूछ रहा था कि – “सृष्टि से पहले क्या था?” और उसके सवाल का जोर देखिए, वह पूछता है, “जल भी था क्या? और सब कुछ कहाँ छिपा हुआ था जो आज आ गया है इतना सारा सामने? ये अचानक कहाँ से प्रकट हो गया? और अगर आज सामने आ गया है, तो पहले छिपा कहाँ था?” फिर यही श्लोक आगे कहता है कि – “ये बातें लगता है सिर्फ़ परमात्मा को पता होंगी,” और आगे पूछता है – “लेकिन उसको भी पता है क्या?”
जब बहुत आसान था डर के कारण, अज्ञान के कारण, विश्वास कर लेना—भारत ने सवाल उठाए। भारत जानना चाहता था, बोध की तरफ़ बड़ा गहरा झुकाव था, इसलिए भारत महान है। मानवता के जो ऊँचे–से–ऊँचे गुण हो सकते थे, वो भारतीयों ने दर्शाए, इसलिए भारत महान है।
कुछ भी ऐसा नहीं है जिसके बारे में पूछा नहीं, जिस पर सवाल नहीं खड़ा किया। कुछ भी ऐसा नहीं जिस पर आँख मूंदकर विश्वास कर लिया। संवाद हो रहे हैं, बहसें हो रही हैं, वार्ताएँ हैं, बात–चीत हैं, शास्त्रार्थ हैं। भारत जानना चाहता है, समझना चाहता है, किसी भी क़ीमत पर वह उलझे नहीं रहना चाहता। किसी भी क़ीमत पर वह अज्ञानी नहीं रहना चाहता। ये महानता है। और फिर भगवद्गीता, और फिर महावीर, और फिर बुद्ध, कि ज़रा–सा वेदों की परंपरा धूमिल पड़ी नहीं कि भारतीय खड़े हो गए सुधार करने के लिए। ज़रा–सी विकृति आई नहीं, ज़रा–सा मामला भ्रष्ट हुआ नहीं, कि भारत के भीतर से ही लोग खड़े हो गए, आंदोलन खड़ा हो गया कि – “नहीं नहीं नहीं, सुधार करना है।”
फिर सुधार करने जो आया था बौद्ध धर्म, वह ख़ुद जब अपने आप में मलिन और विकृत हो गया, तो आचार्य शंकर खड़े हो गए। बोले, “वेदांत को पुनर्जीवित करना है।” और ये सब कुछ किसी को मारपीट करके नहीं किया जा रहा था; ये सब कुछ बस मानसिक शक्तियों के उपयोग से किया जा रहा था, बड़ी सफ़ाई से, बड़ी ईमानदारी से। और फिर ज्ञान की और बोध की ये जो परंपरा थी, यही आचार्य शंकर के जाते–जाते बस कुछ 100 साल बाद ही प्रेम मार्ग में परिवर्तित हो गई। और प्रेम में फिर भारत जितनी गहराई से डूबा, उतना अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता।इसलिए भारत महान है। महानता बड़ी मेहनत और साधना लेती है; आध्यात्मिक तौर पर साधना और भौतिक तौर पर श्रम, जज़्बा और जुनून छोटी चीज़ें नहीं हैं। अथक श्रम करना पड़ता है और लंबी साधना, फिर महानता उतरती है। भारत को महान अगर कहने में रुचि रखते हो, तो खुद महान बनो, तुमसे ही है भारत की महानता। भारतीय अगर महान नहीं तो भारत महान कैसे हो सकता है?
आचार्य प्रशांत, (राष्ट्रीय बेस्टसेलिंग लेखक, वेदांत मर्मज्ञ और सामाजिक सुधारक)
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