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राघव चड्ढा को AAP से क्यों नहीं निकाल पा रहे केजरीवाल, किन नियमों से बंधे हैं हाथ?

आम आदमी पार्टी में मचे घमासान के बीच हर कोई यह सोच रहा है कि अगर अरविंद केजरीवाल और राघव चड्ढा के बीच इतनी ही खटास आ गई है, तो केजरीवाल उन्हें सीधे पार्टी से बाहर क्यों नहीं कर देते? दरअसल, यह मामला सिर्फ 'इच्छाशक्ति' का नहीं, बल्कि संसद के उन जटिल नियमों का है जिन्होंने केजरीवाल के हाथ बांध रखे हैं.

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Edited By : Vijay Jain Updated: Apr 4, 2026 10:54
Raghav Chadha

आम आदमी पार्टी (AAP) के भीतर पिछले कुछ दिनों से जो सियासी घमासान चल रहा है, उसने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. राघव चड्ढा को राज्यसभा में उपनेता के पद से हटाना और फिर राज्यसभा सचिवालय को पत्र लिखकर उन्हें बोलने से रोकने की कोशिश करना, इस बात का साफ संकेत है कि ‘ऑल इज नॉट वेल’. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अगर अरविंद केजरीवाल उनसे इतने ही नाराज हैं, तो उन्हें सीधे तौर पर पार्टी से बाहर का रास्ता क्यों नहीं दिखा पा रहे? इसके पीछे कई गहरे राजनीतिक और कानूनी कारण माने जा रहे हैं.

पार्टी से निष्कासन बनाम सांसद की सदस्यता

संसद का नियम बड़ा दिलचस्प है. अगर कोई पार्टी अपने किसी सांसद को ‘अनुशासनहीनता’ के आधार पर पार्टी से निकालती है, तो भी वह व्यक्ति सदन में सांसद बना रहता है. वह सदन में ‘अनअटैच्ड’ सदस्य कहलाएगा. यानी, केजरीवाल अगर राघव को निकालते हैं, तो राघव की राज्यसभा सदस्यता नहीं जाएगी. वे संसद में बैठकर ‘आप’ की नीतियों के खिलाफ बोल सकेंगे और पार्टी उनके खिलाफ ‘व्हिप’ भी जारी नहीं कर पाएगी.

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सदस्यता कब जाती है?

नियम के मुताबिक, किसी सांसद की सदस्यता केवल दो ही स्थितियों में जा सकती है. जब वह खुद स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता से इस्तीफा दे दे या जब वह सदन में पार्टी के व्हिप का उल्लंघन करते हुए वोटिंग करे या गैरहाजिर रहे. केजरीवाल चाहते हैं कि राघव खुद इस्तीफा दें ताकि उनकी सदस्यता चली जाए, लेकिन राघव ने साफ कर दिया है कि वे पार्टी नहीं छोड़ेंगे.

‘व्हिप’ का डर और बोलने की पाबंदी

आम आदमी पार्टी ने हाल ही में राज्यसभा सचिवालय को पत्र लिखकर राघव चड्ढा को ‘आप’ के कोटे से बोलने का समय न देने का अनुरोध किया है. यह एक सोची-समझी रणनीति है. पार्टी उन्हें निकाल नहीं रही, बल्कि उन्हें ‘बेअसर’ कर रही है. अगर वे पार्टी में रहते हुए किसी महत्वपूर्ण बिल पर पार्टी के खिलाफ वोट करते हैं, तभी केजरीवाल उन्हें अयोग्य घोषित करवा पाएंगे.

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केजरीवाल की क्या मजबूरियां?

  • निष्कासित सदस्य का ‘फ्री हैंड’: अगर केजरीवाल उन्हें आज निकाल देते हैं, तो राघव चड्ढा किसी भी दूसरी पार्टी में शामिल होने के लिए स्वतंत्र हो सकते हैं केजरीवाल कभी नहीं चाहेंगे कि उनका एक ‘इनसाइडर’ और पूर्व रणनीतिकार विपक्षी खेमे में जाकर उनके ही राज खोले. यही कारण है कि केजरीवाल ‘निकालने’ के बजाय ‘किनारे’ करने की नीति पर चल रहे हैं. वे चाहते हैं कि राघव चड्ढा हाशिए पर रहकर खुद कोई ऐसी गलती करें जिससे उनकी सदस्यता कानूनी रूप से खत्म हो सके.
  • पंजाब की राजनीति और ‘नंबर गेम’: राघव चड्ढा पंजाब से राज्यसभा सांसद हैं. पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनाने में राघव की रणनीतियों की बड़ी भूमिका रही है. उन्हें पार्टी से निकालने का मतलब होगा पंजाब यूनिट में एक नई दरार पैदा करना. इसके अलावा, राज्यसभा में पार्टी के पास 10 सांसद हैं. स्वाति मालीवाल के साथ पहले ही पार्टी के रिश्ते खराब हैं, ऐसे में राघव को खोना सदन में पार्टी की ताकत और एकजुटता को कमजोर कर सकता है.
  • ‘विक्टिम कार्ड’ और युवा छवि: राघव चड्ढा पार्टी का एक पढ़ा-लिखा, सौम्य और युवा चेहरा हैं. अगर केजरीवाल उन्हें निकालते हैं, तो राघव आसानी से ‘विक्टिम कार्ड’ खेल सकते हैं. बीजेपी पहले ही केजरीवाल पर ‘योग्यता से डरने’ का आरोप लगा रही है. प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव के बाद यदि एक और बड़े चेहरे को निकाला गया, तो जनता के बीच ‘तानाशाही’ का संदेश जाएगा, जो आगामी चुनावों के लिए आत्मघाती हो सकता है.
  • ‘सीक्रेट्स’ और करीबी रणनीतियां: राघव चड्ढा सालों तक केजरीवाल के सबसे करीबी रहे हैं. वे पार्टी के फंड्स, कानूनी रणनीतियों और अंदरूनी फैसलों के गवाह रहे हैं. राजनीति में कहा जाता है कि जो जितना करीब होता है, वह उतना ही ‘खतरनाक’ भी हो सकता है. उन्हें पार्टी से बाहर निकालकर ‘दुश्मन’ बनाने के बजाय, नेतृत्व उन्हें किनारे करके उनकी ताकत कम करने की रणनीति अपना रहा है.

क्यों नाराज हैं केजरीवाल?

सूत्रों और हालिया घटनाक्रमों की मानें तो राघव चड्ढा और पार्टी नेतृत्व के बीच दूरियां पिछले कई महीनों से बढ़ रही थीं. इसके पीछे तीन मुख्य कारण बताए जा रहे हैं:

  • जरूरी मौकों पर खामोशी: जब शराब नीति मामले में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को बड़ी राहत मिली, तो पूरी पार्टी जश्न मना रही थी. लेकिन राघव चड्ढा की सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर चुप्पी ने नेतृत्व को असहज कर दिया.
  • पार्टी से ज्यादा ‘पर्सनल ब्रांड’ पर जोर: पार्टी के भीतर यह धारणा बन रही थी कि राघव संगठन के मुद्दों के बजाय अपनी व्यक्तिगत छवि चमकाने और ‘ग्लोबल’ मुद्दों (जैसे एयरपोर्ट पर खाने के दाम, गिग वर्कर्स के हक) पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं.
  • अनुशासनहीनता का आरोप: केजरीवाल की गिरफ्तारी के समय भी राघव चड्ढा लंदन में अपनी आंख की सर्जरी का हवाला देकर काफी समय तक दूर रहे थे, जिसे पार्टी के कुछ नेताओं ने ‘मुसीबत में साथ छोड़ना’ माना.

फिलहाल, राघव चड्ढा ने इस पर भावुक प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि वे “हारे नहीं हैं.” वहीं बीजेपी ने इस मुद्दे पर चुटकी लेते हुए केजरीवाल को ‘योग्य लोगों से डरने वाला नेता’ बताया है. यह देखना दिलचस्प होगा कि आम आदमी पार्टी का यह ‘आंतरिक युद्ध’ आने वाले दिनों में क्या मोड़ लेता है.

First published on: Apr 04, 2026 10:54 AM

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