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विपक्ष में टूट, ‘चक्रव्यूह’ में परिसीमन बिल; मानसून सत्र में सरकार का बड़ा दांव!

Monsoon Session: केंद्र सरकार आगामी मानसून सत्र में परिसीमन बिल दोबारा पेश करने की तैयारी में है. दक्षिण भारत की चिंता दूर करने के लिए सीटों में 50% बढ़ोतरी का नया फॉर्मूला आ सकता है. इधर बंगाल में TMC और तमिलनाडु में DMK-कांग्रेस के बीच दरार से संसद का पूरा गणित बदलता दिख रहा है.

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Monsoon Session: केंद्र सरकार आगामी मानसून सत्र में लोकसभा सीटों के पुनर्गठन से जुड़े परिसीमन बिल को दोबारा संसद में पेश करने की तैयारी में है. महिला आरक्षण से जुड़े संविधान संशोधन बिल के पहले असफल होने के बाद अब सरकार का फोकस क्षेत्रीय दलों के बदलते राजनीतिक समीकरणों को साधकर अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने पर है. इस पूरे घटनाक्रम में एक तरफ बंगाल और तमिलनाडु की क्षेत्रीय राजनीति में हलचल तेज है, तो दूसरी तरफ दिल्ली में संसद के भीतर संख्या बल को मजबूत करने की रणनीति पर काम चल रहा है.

परिसीमन बिल: सरकार की नई रणनीतिक दिशा

सरकार इस बार परिसीमन बिल को ज्यादा स्वीकार्य बनाने के लिए कुछ बड़े बदलावों पर विचार कर रही है. प्रस्ताव के तहत हर राज्य की लोकसभा सीटों में लगभग 50% तक वृद्धि की संभावना का उल्लेख बिल में किया जा सकता है . इसका उद्देश्य दक्षिण भारतीय राज्यों की यह चिंता दूर करना है कि जनसंख्या आधारित परिसीमन से उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी घटेगी

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वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटें 1971 की जनगणना के आधार पर तय हैं,आखिरी बार परिसीमन प्रक्रिया 2002 में हुई थी.
इस फॉर्मूले को राजनीतिक रूप से एक “संतुलन मॉडल” के तौर पर पेश करने की कोशिश की जा रही है, ताकि दक्षिण और पूर्वी राज्यों का विरोध कम हो सके.

बंगाल में सियासी तूफान: TMC में अंदरूनी बगावत के संकेत

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर तनाव और गुटबाजी की स्थिति लगातार बढ़ती दिख रही है. चुनावी झटकों के बाद पार्टी संगठन में असंतोष खुलकर सामने आ रहा है. विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के चयन को लेकर पार्टी दो गुटों में बंटी हुई दिखी. लगभग 58–60 विधायकों के एक अलग गुट बनने की खबरें सामने आई हैं. स्पीकर द्वारा नए नेतृत्व को मान्यता मिलने के बाद विवाद और गहरा गया. संगठनात्मक स्तर पर कई वरिष्ठ नेताओं के इस्तीफे की स्थिति बनी है और पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी की नेतृत्व शैली पर सवाल उठ रहे हैं.

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सूत्रों के अनुसार, अगर यह असंतोष बढ़ता है तो इसका असर केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि लोकसभा में TMC के 20 से अधिक सांसदों के रुख पर भी असर पड़ सकता है.

तमिलनाडु: DMK और कांग्रेस के बीच बढ़ती दूरी

तमिलनाडु की राजनीति में भी चुनावी नतीजों के बाद समीकरण तेजी से बदल रहे हैं .चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस और DMK के बीच भरोसे में कमी देखी जा रही है. कांग्रेस द्वारा टीवीके (TVK) को समर्थन दिए जाने के बाद तनाव बढ़ा. DMK ने इस कदम को राजनीतिक असहमति और विश्वासघात के रूप में देखा, दोनों दल अब अलग-अलग राजनीतिक रणनीति अपनाते दिख रहे हैं. अब डीएमके इंडिया गठबंधन के भी बैठक से दूरी बना रही है . इसके अलावा डीएमके लोकसभा और राज्यसभा में भी अब कांग्रेस के साथ नहीं बल्कि विपक्षी एरिया में न्यूट्रल दलों के साथ अपना सीटिंग अरेंजमेंट चाहती है .
इस दूरी का सीधा असर आने वाले समय में गठबंधन राजनीति पर पड़ सकता है. साथ ही, केंद्र सरकार परिसीमन जैसे मुद्दों पर DMK को अलग तरीके से साधने की कोशिश कर सकती है.

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संसद का गणित: 362 का लक्ष्य और नया समीकरण

संविधान संशोधन जैसे बड़े विधेयकों को पास कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत यानी 362 सांसदों की जरूरत होती है. सरकार के पास मौजूदा समर्थन: लगभग 298 सांसदों का है ,संभावित TMC समर्थन/टूट: 20–22 सांसद,DMK के अलग रुख से संभावित बदलाव: 20 सांसद का होगा . इन बदलावों के बाद कुल समर्थन लगभग 345 सांसद तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है. इसके बावजूद सरकार को अभी भी करीब 17 सांसदों की कमी का सामना करना पड़ सकता है.

छोटे दलों पर फोकस: अंतिम संख्या जोड़ने की रणनीति

सरकार अब छोटे दलों और क्षेत्रीय समूहों को साधने की कोशिश में जुटी है. संभावित सहयोगी दलों में सरकार को वाईएसआरसीपी , जेएमएम, वीसीके, आरएलपी और कुछ निर्दलीय सांसद और छोटे क्षेत्रीय गुट हो सकते हैं .

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बीजेपी की व्यापक रणनीति

बीजेपी इस पूरे घटनाक्रम को केवल राज्यों की राजनीति नहीं, बल्कि एक बड़े राष्ट्रीय विधायी एजेंडे के हिस्से के रूप में देख रही है. जिसका मुख्य रणनीतिक लक्ष्य, परिसीमन बिल को पारित कराना,वन नेशन वन इलेक्शन जैसे प्रस्तावों की दिशा में आगे बढ़ना,चुनाव सुधारों से जुड़े अन्य विधेयकों के लिए मजबूत बहुमत तैयार करना है .

हालांकि इन सभी राजनीतिक दावों और समीकरणों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन बंगाल से लेकर तमिलनाडु और दिल्ली तक राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं. आने वाला मानसून सत्र न केवल विधायी दृष्टि से, बल्कि राजनीतिक गठबंधन और शक्ति संतुलन के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

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First published on: Jun 05, 2026 06:41 PM

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