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Procedure To Introduce Bill: केंद्र सरकार संसद के मानसून सत्र 2025 में 15 से ज्यादा बिल पेश करेगी। इन 15 बिलों में 8 नए बिल और 7 पुराने बिल होंगे। केंद्र सरकार की कोशिश सभी 15 बिलों को पारित कराने की होगी, लेकिन क्या आप जानते हैं कि संसद में किसी बिल को पेश करने और उसे कानून बनाने की प्रक्रिया काफी लंबी, सुनियोजित और व्यवस्थित होती है। एक बिल कई फेज पार करके कानून बनता है। आइए जानते हैं कि किसी बिल को संसद में पेश करने और उसे कानून बनाने की प्रक्रिया क्या होती है?
सबसे पहले सरकार, मंत्रालय, सांसद, विशेषज्ञ समितियों, नागरिक समूहों द्वारा बिल का विचार दिया जाता है और फिर बिल का मसौदा तैयार किया जाता है। बिल का मसौदा सरकार की ओर से संबंधित मंत्रालय तैयार करता है। वहीं मसौदा तैयार करने से पहले बिल के विषय से संबंधित मंत्रालय कानूनी विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और अन्य मंत्रालयों से सलाह लेता है। अकसर बिल को लेकर जनता से भी सुझाव मांगे जाते हैं। गैर-सरकारी बिल (प्राइवेट मेंबर बिल) का मसौदा सांसद स्वयं तैयार करते हैं।
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बिल का मसौदा (ड्राफ्ट) तैयार करने के बाद संबंधित विषय की कानूनी और संवैधानिक वैधता की जांच की जाती है।
संवैधानिक वैधता की जांच होने के बाद बिल के मसौदे को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के लिए भेजा जाता है।
कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद बिल को संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा में पेश किया जाता है। बिल पेश करने से पहले संबंधित सांसद या मंत्री को लोकसभा या राज्यसभा के सचिवालय को नोटिस देना पड़ता है। प्राइवेट बिल के मामले में एक महीना पहले नोटिस दिया जाता है। बिल को पेश करने से पहले गजट में भी प्रकाशित किया जाता है।
बिल को जब औपचारिक तरीके से सदन में पेश किया जाता है तो इसकी फर्स्ट रीडिंग की जाती है, जिसमें बिल का टाइटल और उद्देश्य पढ़कर सदन को सुनाया जाता है। बिल पर कोई चर्चा नहीं होती, लेकिन पेश करने के लिए अनुमति मांगी जाती है। अगर कोई सांसद टाइटल और उद्देश्य सुनकर बिल का विरोध करता है तो बिल पर मतदान कराया जा सकता है।
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संसद में बिल पेश करने के बाद सेकंड रीडिंग में पहले बिल पर सामान्य चर्चा होती है। इसमें बिल के सिद्धांतों और प्रावधानों पर विचार-विमर्श किया जाता है। सांसद बिल के पक्ष या विपक्ष में बोलते हैं। बिल में किए गए एक-एक प्रावधान पर विस्तृत चर्चा की जाती है।
अगर चाहें तो सांसद बिल पर संशोधन प्रस्ताव रख सकते हैं, जिसे स्टैंडिंग कमेटी या जॉइंट कमेटी को भेजा जा सकता है। कमेटी बिल पर सुझाव लेती है और अपनी रिपोर्ट सदन में पेश करती है। कमेटी या सांसदों के सुझावों के आधार पर बिल में संशोधन किए जा सकते हैं।
चर्चा और संशोधन के बाद बिल के फाइनल ड्राफ्ट पर पहले चर्चा होती है। फिर मतदान कराया जाता है। बिल को स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए सांसदों की वोटिंग कराई जाती है। अगर बिल पहले लोकसभा में पारित हो जाता है तो इसे राज्यसभा में भेज दिया जाता है, जहां पूरी प्रक्रिया फिर से दोहराई जाती है। अगर राज्यसभा में बिल में संशोधन होता है तो बिल वापस लोकसभा में आता है।
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संसद में पास होने के बाद बिल को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाता है। इस मामले में राष्ट्रपति के 3 विकल्प हैं। अगर राष्ट्रपति बिल को मंजूरी देते हैं तो बिल कानून बन जाता है। फिर इसे गजट में प्रकाशित किया जाता है। अगर बिल को मंजूरी नहीं दी जाती है तो राष्ट्रपति बिल को पुनर्विचार के लिए वापस भेज सकते हैं। अगर बिल पर राष्ट्रपति कोई फैसला नहीं लेते हैं तो इस प्रक्रिया को पॉकेट वीटो कहते हैं।
राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद बिल कानून बन जाता है। इसे गजट में प्रकाशित करके सरकार अधिसूचना जारी करके देश में लागू कर दिया जाता है।
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