केंद्र की एनडीए सरकार लोकसभा की कुल सीटों को मौजूदा 543 से बढ़ाकर 850 करने की दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी कर रही है. इसके साथ ही परिसीमन (Delimitation) और महिला आरक्षण को जल्द लागू करने की योजना पर भी काम किया जा रहा है. हालांकि ये प्रक्रिया जितनी बड़ी है, उतनी ही मुश्किल भी है. सरकार को संवैधानिक नियमों, जनगणना और संसद में जरूरी समर्थन जैसी कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. सबसे बड़ी चुनौती संसद में बहुमत जुटाने की है. संविधान संशोधन के लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों में मौजूद और वोटिंग करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होती है. मौजूदा संख्या बल के आधार पर एनडीए अभी भी इस लक्ष्य से कुछ दूरी पर है. ऐसे में सरकार को सहयोगी दलों के साथ-साथ कुछ विपक्षी दलों का भी समर्थन हासिल करना होगा.
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किसकी है अहम भूमिका?
इस पूरे मामले में संविधान का अनुच्छेद 81 अहम भूमिका निभाता है. इसके मुताबिक राज्यों को लोकसभा सीटें उनकी आबादी के अनुपात में दी जाती हैं. लेकिन साल 1976 से राज्यों के बीच सीटों का बंटवारा स्थिर रखा गया है. बाद में इस व्यवस्था को आगे भी बढ़ाया गया, ताकि जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को नुकसान न हो. ये व्यवस्था पहली जनगणना के बाद खत्म होने की स्थिति में है, जो 2026 के बाद होगी. यहीं सबसे बड़ा विवाद भी खड़ा होता है. अगर नई सीटों का निर्धारण 2011 की जनगणना के आधार पर किया जाता है तो उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे ज्यादा आबादी वाले राज्यों की सीटों में बड़ी बढ़ोतरी हो सकती है. वहीं तमिलनाडु, केरल और बाकी दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन के बावजूद उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी कम हो सकती है. इसी वजह से दक्षिण भारत के कई राजनीतिक दल इस मुद्दे पर अपनी चिंता पहले ही जता चुके हैं.
क्या है चुनौती?
सरकार के सामने दूसरी चुनौती सभी दलों को विश्वास में लेने की है. माना जा रहा है कि अगर संवैधानिक प्रावधानों में ऐसा बदलाव किया जाए जिससे राज्यों के मौजूदा अनुपात को कुछ समय तक सुरक्षित रखा जा सके, तो विपक्ष का समर्थन मिलना आसान हो सकता है. हालांकि इस पर अंतिम फैसला संसद में होने वाली चर्चा और राजनीतिक सहमति के बाद ही होगा. लोकसभा सीटों में बढ़ोतरी का मकसद केवल सांसदों की संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि बढ़ती आबादी के अनुरूप प्रतिनिधित्व को मजबूत करना भी है. साथ ही महिला आरक्षण कानून को लागू करने की प्रक्रिया भी परिसीमन से जुड़ी हुई है. इसलिए आने वाले समय में ये मुद्दा भारतीय राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण विषय बन सकता है.
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केंद्र की एनडीए सरकार लोकसभा की कुल सीटों को मौजूदा 543 से बढ़ाकर 850 करने की दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी कर रही है. इसके साथ ही परिसीमन (Delimitation) और महिला आरक्षण को जल्द लागू करने की योजना पर भी काम किया जा रहा है. हालांकि ये प्रक्रिया जितनी बड़ी है, उतनी ही मुश्किल भी है. सरकार को संवैधानिक नियमों, जनगणना और संसद में जरूरी समर्थन जैसी कई बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. सबसे बड़ी चुनौती संसद में बहुमत जुटाने की है. संविधान संशोधन के लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों में मौजूद और वोटिंग करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होती है. मौजूदा संख्या बल के आधार पर एनडीए अभी भी इस लक्ष्य से कुछ दूरी पर है. ऐसे में सरकार को सहयोगी दलों के साथ-साथ कुछ विपक्षी दलों का भी समर्थन हासिल करना होगा.
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किसकी है अहम भूमिका?
इस पूरे मामले में संविधान का अनुच्छेद 81 अहम भूमिका निभाता है. इसके मुताबिक राज्यों को लोकसभा सीटें उनकी आबादी के अनुपात में दी जाती हैं. लेकिन साल 1976 से राज्यों के बीच सीटों का बंटवारा स्थिर रखा गया है. बाद में इस व्यवस्था को आगे भी बढ़ाया गया, ताकि जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को नुकसान न हो. ये व्यवस्था पहली जनगणना के बाद खत्म होने की स्थिति में है, जो 2026 के बाद होगी. यहीं सबसे बड़ा विवाद भी खड़ा होता है. अगर नई सीटों का निर्धारण 2011 की जनगणना के आधार पर किया जाता है तो उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे ज्यादा आबादी वाले राज्यों की सीटों में बड़ी बढ़ोतरी हो सकती है. वहीं तमिलनाडु, केरल और बाकी दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन के बावजूद उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी कम हो सकती है. इसी वजह से दक्षिण भारत के कई राजनीतिक दल इस मुद्दे पर अपनी चिंता पहले ही जता चुके हैं.
क्या है चुनौती?
सरकार के सामने दूसरी चुनौती सभी दलों को विश्वास में लेने की है. माना जा रहा है कि अगर संवैधानिक प्रावधानों में ऐसा बदलाव किया जाए जिससे राज्यों के मौजूदा अनुपात को कुछ समय तक सुरक्षित रखा जा सके, तो विपक्ष का समर्थन मिलना आसान हो सकता है. हालांकि इस पर अंतिम फैसला संसद में होने वाली चर्चा और राजनीतिक सहमति के बाद ही होगा. लोकसभा सीटों में बढ़ोतरी का मकसद केवल सांसदों की संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि बढ़ती आबादी के अनुरूप प्रतिनिधित्व को मजबूत करना भी है. साथ ही महिला आरक्षण कानून को लागू करने की प्रक्रिया भी परिसीमन से जुड़ी हुई है. इसलिए आने वाले समय में ये मुद्दा भारतीय राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण विषय बन सकता है.
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