राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' को लेकर छिड़े सियासी संग्राम के बीच कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने अपने ऐतिहासिक रुख को दोहराया है. बुधवार को हुई CWC की बैठक में तय किया गया कि पार्टी के कार्यक्रमों में 'वंदे मातरम' के केवल पहले दो छंद ही गाए जाएंगे. कांग्रेस ने साफ किया कि उसका यह फैसला अक्टूबर 1937 में पारित CWC के आधिकारिक प्रस्ताव पर आधारित है.

कब शुरू हुआ विवाद?

यह विवाद तब शुरू हुआ जब हाल ही में दक्षिण गोवा में कांग्रेस के एक सम्मेलन के दौरान पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की मौजूदगी में 'वंदे मातरम' के पहले दो छंद गाए गए. इसके बाद भाजपा ने कांग्रेस पर 'अधूरा' राष्ट्रीय गीत गाने का आरोप लगाते हुए निशाना साधा था.

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खरगे का पलटवार

भाजपा पर पलटवार करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि उन्होंने वही वंदे मातरम गाया जो दशकों से देश के बड़े नेता गाते आए हैं. खरगे ने कहा, 'मैंने वही 'वंदे मातरम' गाया जो महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और अटल बिहारी वाजपेयी गाते थे. अगर यह कोई अपराध है, तो गांधीजी, नेहरू और सरदार पटेल के खिलाफ केस दर्ज कराइए. भाजपा को राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान पर कांग्रेस द्वारा लिए गए ऐतिहासिक फैसलों की जानकारी नहीं है. उनके जन्म से पहले ही कांग्रेस ने इस पर प्रस्ताव पारित कर दिया था. मैं वही कर रहा हूं जो पिछले 80 सालों से होता आ रहा है.'

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कांग्रेस सिर्फ पहले दो छंद ही क्यों गाती है?

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1875 में रचित और बाद में उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल किए गए 'वंदे मातरम' के पूरे स्वरूप पर 1930 के दशक में व्यापक बहस हुई थी. गीत के शुरुआती दो छंदों में केवल मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता और वंदना का जिक्र है. बाद के छंदों में विशिष्ट धार्मिक और पौराणिक संदर्भ शामिल हैं.

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कांग्रेस का कहना है कि अक्टूबर 1937 में इस मुद्दे पर पंडित जवाहरलाल नेहरू ने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर से सलाह ली थी. टैगोर ने राय दी थी कि पहले दो छंद एक समावेशी राष्ट्रीय गान के रूप में आदर्श हैं, जबकि बाद के हिस्से सभी समुदायों के संयुक्त राष्ट्रीय सम्मेलनों के लिए उपयुक्त नहीं हो सकते. इसके बाद 1937 में CWC ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर सार्वजनिक और राष्ट्रीय मंचों पर केवल पहले दो छंद गाने की सिफारिश की थी.

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