डिजिटल इंडिया का नया ट्रैफिक जाम! कॉल ड्रॉप और UPI पेमेंट ने बढ़ाई लोगों की मुसीबत, रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा
TRAI Report: मेट्रो और नमो भारत में सफर के दौरान कॉल ड्रॉप और फेल होते यूपीआई पेमेंट नए ट्रैफिक जाम बन चुके हैं. ट्राई की रिपोर्ट के मुताबिक, इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी से कनेक्टिविटी आज भी बड़ा चैलेंज है.
आज के समय में भारतीय शहरों के मुसाफिरों के लिए मोबाइल सिर्फ बात करने का जरिया नहीं है, बल्कि उनका पूरा ऑफिस, बैंक अकाउंट और मनोरंजन इसी डिवाइस में सिमट चुका है. लेकिन भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली-एनसीआर की मेट्रो और नमो भारत कॉरिडोर में सफर के दौरान बिना रुकावट नेटवर्क मिलना आज भी एक बड़ा चैलेंज है. रिलायंस जियो डाउनलोड स्पीड और एयरटेल अपलोड स्पीड में आगे तो निकले हैं, पर असल कहानी यह है कि सफर में कनेक्टिविटी अब भी गायब हो जाती है. आज कॉल ड्रॉप, अटकी हुई वीडियो बफरिंग और फेल होते यूपीआई पेमेंट डिजिटल इंडिया के नए ट्रैफिक जाम बन चुके हैं, जो लाखों लोगों के सफर को मुश्किल बना रहे हैं.
टनल और तेज रफ्तार ट्रेनें क्यों बनीं नेटवर्क की सबसे बड़ी दुश्मन?
आम तौर पर लोग सोचते हैं कि 5G आने के बाद नेटवर्क की सारी दिक्कतें खत्म हो जानी चाहिए थीं, लेकिन जमीनी हकीकत बहुत अलग है. मोबाइल नेटवर्क खुली जगहों पर सबसे अच्छा काम करते हैं, जबकि मेट्रो के अंडरग्राउंड हिस्से बिल्कुल इसके उलट होते हैं. कंक्रीट की मोटी दीवारें, लोहे के बड़े स्ट्रक्चर और बंद टनल रेडियो सिग्नल को कमजोर कर देते हैं. इसके अलावा, जब ट्रेनें तेज रफ्तार से दौड़ती हैं, तो मोबाइल को एक टावर से दूसरे टावर के नेटवर्क जोन में लगातार स्विच करना पड़ता है, जिसे नेटवर्क की भाषा में हैंडओवर कहते हैं. नमो भारत जैसी हाई-स्पीड ट्रेनों में यह रफ्तार इतनी ज्यादा होती है कि सिग्नल टूटने का खतरा हर पल बना रहता है, जिससे चलते हुए काम बीच में ही रुक जाते हैं.
नेटवर्क की यह बड़ी समस्या सिर्फ देश की राजधानी दिल्ली तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य मेट्रो शहरों का भी यही हाल है. दुनिया के सबसे व्यस्त लोकल रेल नेटवर्क में से एक, मुंबई उपनगरीय रेलवे में पीक आवर्स के दौरान भारी भीड़ की वजह से नेटवर्क जाम की शिकायतें आम हैं. इसी तरह बेंगलुरु के तेजी से फैलते मेट्रो रूट पर नई लाइनें तो शुरू हो जाती हैं, लेकिन वहां का टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर उतनी तेजी से अपग्रेड नहीं हो पाता है. हैदराबाद, चेन्नई और कोलकाता की भूमिगत मेट्रो लाइनों में भी लोगों को अक्सर कमजोर सिग्नल और नेटवर्क गायब होने की दिक्कत का सामना करना पड़ता है. यह दिखाता है कि देश के शहरी ट्रांसपोर्ट में टेलीकॉम प्लानिंग की कितनी बड़ी कमी है.
कब सुधरेगी डिजिटल सफर की सेहत?
इस डिजिटल संकट से निपटने के लिए अब बड़े टावरों के बजाय स्मॉल सेल्स तकनीक पर फोकस किया जा रहा है. ये छोटे रेडियो यूनिट होते हैं जिन्हें खंभों, पिलर्स और मेट्रो स्टेशनों पर आसानी से लगाया जा सकता है, जिससे भारी भीड़ वाले इलाकों में भी लगातार नेटवर्क मिलता रहे. दिल्ली मेट्रो ने कुछ जगहों पर इसे आजमाना भी शुरू कर दिया है. अगर हम लंदन, सियोल और सिंगापुर जैसे वैश्विक शहरों को देखें, तो वहां ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट के डिजाइन के समय ही टनल एंटीना और फाइबर नेटवर्क की प्लानिंग कर ली जाती है. भारत को भी अब मोबाइल कनेक्टिविटी को सिर्फ एक सुविधा नहीं, बल्कि पानी और बिजली की तरह बुनियादी जरूरत मानकर अपने शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर में शामिल करना होगा.
आज के समय में भारतीय शहरों के मुसाफिरों के लिए मोबाइल सिर्फ बात करने का जरिया नहीं है, बल्कि उनका पूरा ऑफिस, बैंक अकाउंट और मनोरंजन इसी डिवाइस में सिमट चुका है. लेकिन भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली-एनसीआर की मेट्रो और नमो भारत कॉरिडोर में सफर के दौरान बिना रुकावट नेटवर्क मिलना आज भी एक बड़ा चैलेंज है. रिलायंस जियो डाउनलोड स्पीड और एयरटेल अपलोड स्पीड में आगे तो निकले हैं, पर असल कहानी यह है कि सफर में कनेक्टिविटी अब भी गायब हो जाती है. आज कॉल ड्रॉप, अटकी हुई वीडियो बफरिंग और फेल होते यूपीआई पेमेंट डिजिटल इंडिया के नए ट्रैफिक जाम बन चुके हैं, जो लाखों लोगों के सफर को मुश्किल बना रहे हैं.
टनल और तेज रफ्तार ट्रेनें क्यों बनीं नेटवर्क की सबसे बड़ी दुश्मन?
आम तौर पर लोग सोचते हैं कि 5G आने के बाद नेटवर्क की सारी दिक्कतें खत्म हो जानी चाहिए थीं, लेकिन जमीनी हकीकत बहुत अलग है. मोबाइल नेटवर्क खुली जगहों पर सबसे अच्छा काम करते हैं, जबकि मेट्रो के अंडरग्राउंड हिस्से बिल्कुल इसके उलट होते हैं. कंक्रीट की मोटी दीवारें, लोहे के बड़े स्ट्रक्चर और बंद टनल रेडियो सिग्नल को कमजोर कर देते हैं. इसके अलावा, जब ट्रेनें तेज रफ्तार से दौड़ती हैं, तो मोबाइल को एक टावर से दूसरे टावर के नेटवर्क जोन में लगातार स्विच करना पड़ता है, जिसे नेटवर्क की भाषा में हैंडओवर कहते हैं. नमो भारत जैसी हाई-स्पीड ट्रेनों में यह रफ्तार इतनी ज्यादा होती है कि सिग्नल टूटने का खतरा हर पल बना रहता है, जिससे चलते हुए काम बीच में ही रुक जाते हैं.
नेटवर्क की यह बड़ी समस्या सिर्फ देश की राजधानी दिल्ली तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश के अन्य मेट्रो शहरों का भी यही हाल है. दुनिया के सबसे व्यस्त लोकल रेल नेटवर्क में से एक, मुंबई उपनगरीय रेलवे में पीक आवर्स के दौरान भारी भीड़ की वजह से नेटवर्क जाम की शिकायतें आम हैं. इसी तरह बेंगलुरु के तेजी से फैलते मेट्रो रूट पर नई लाइनें तो शुरू हो जाती हैं, लेकिन वहां का टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर उतनी तेजी से अपग्रेड नहीं हो पाता है. हैदराबाद, चेन्नई और कोलकाता की भूमिगत मेट्रो लाइनों में भी लोगों को अक्सर कमजोर सिग्नल और नेटवर्क गायब होने की दिक्कत का सामना करना पड़ता है. यह दिखाता है कि देश के शहरी ट्रांसपोर्ट में टेलीकॉम प्लानिंग की कितनी बड़ी कमी है.
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कब सुधरेगी डिजिटल सफर की सेहत?
इस डिजिटल संकट से निपटने के लिए अब बड़े टावरों के बजाय स्मॉल सेल्स तकनीक पर फोकस किया जा रहा है. ये छोटे रेडियो यूनिट होते हैं जिन्हें खंभों, पिलर्स और मेट्रो स्टेशनों पर आसानी से लगाया जा सकता है, जिससे भारी भीड़ वाले इलाकों में भी लगातार नेटवर्क मिलता रहे. दिल्ली मेट्रो ने कुछ जगहों पर इसे आजमाना भी शुरू कर दिया है. अगर हम लंदन, सियोल और सिंगापुर जैसे वैश्विक शहरों को देखें, तो वहां ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट के डिजाइन के समय ही टनल एंटीना और फाइबर नेटवर्क की प्लानिंग कर ली जाती है. भारत को भी अब मोबाइल कनेक्टिविटी को सिर्फ एक सुविधा नहीं, बल्कि पानी और बिजली की तरह बुनियादी जरूरत मानकर अपने शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर में शामिल करना होगा.