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Jeevan Ya Bheema Con Review: मजेदार है ‘जीवन या भीमा कॉन’, अरशद के साथ ही संजीदा-विजय और बृजेन्द्र ने बांधा समां

Jeevan Ya Bheema Con Review: अरशद वारसी और संजीदा शेख स्टारर ‘जीवन या भीमा कॉन?’ सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है. फिल्म में कॉमेडी के साथ-साथ मिस्ट्री से भरे सीन्स देखने को मिलेंगे. फिल्म देखने से पहले आप ये रिव्यू जरूर पढ़ लें.

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Jeevan Ya Bheema Con Review: क्या होगा अगर आपको अपना हमशक्ल मिल जाए और आप उसी का इस्तेमाल अपनी जिंदगी बदलने के लिए करने लगें? सुनने में यह आइडिया जितना आसान लगता है, ‘जीवन या भीमा कॉन?’ में हालात उतने ही पेचीदा होते जाते हैं. फिल्म एक साधारण कपल की कहानी को क्राइम, कॉमेडी, धोखे और गलत पहचान के खेल में बदल देती है.

कहानी

जीवन और योजना आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हैं. कर्ज से निकलने के लिए दोनों एक ऐसा प्लान बनाते हैं, जो उन्हें बेहद आसान और सुरक्षित लगता है. उन्हें भीमा मिलता है, जो हूबहू जीवन जैसा दिखता है. इसके बाद जीवन की नकली मौत और बीमा की रकम का प्लान बनाया जाता है. लेकिन मामला तब हाथ से निकल जाता है, जब पता चलता है कि भीमा कोई आम आदमी नहीं, बल्कि डायमंड स्मगलिंग से जुड़ा हुआ है. यहीं से फिल्म का असली खेल शुरू होता है.

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अरशद वारसी के लिए यह फिल्म खास है क्योंकि वह डबल रोल में नजर आ रहे हैं. जीवन और भीमा के बीच सिर्फ लुक का फर्क नहीं, बल्कि दोनों के स्वभाव में भी बड़ा अंतर है. जीवन जहां परेशान और घबराया हुआ आम आदमी है, वहीं भीमा की मौजूदगी में खतरा महसूस होता है. अरशद दोनों किरदारों के बीच यह अंतर अच्छी तरह बनाए रखते हैं और उनकी कॉमिक टाइमिंग फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनती है. संजीदा शेख योजना के किरदार में अच्छी लगती हैं. वह कहानी में सिर्फ जीवन की पत्नी बनकर नहीं रहतीं, बल्कि मुश्किल हालात में फैसले लेने वाली अहम कड़ी बनती हैं. वहीं विजय राज का किरदार कहानी में रहस्य और क्राइम वाला एंगल मजबूत करता है. फिल्म में बृजेंद्र काला, पूजा चोपड़ा भी अहम भूमिकाओं में हैं.

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फिल्म की खासियत

फिल्म की खासियत यह है कि इसका कंफ्यूजन ही इसका एंटरटेनमेंट है. एक झूठ छिपाने के लिए दूसरा झूठ बोलना पड़ता है और फिर वही झूठ नई मुसीबत खड़ी कर देता है. जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, जीवन और योजना अपने ही बनाए जाल में फंसते चले जाते हैं. हालांकि यही हिस्सा फिल्म की कमजोरी भी बनता है. कुछ जगहों पर कहानी जरूरत से ज्यादा उलझती हुई महसूस होती है और कुछ घटनाएं थोड़ी प्रेडिक्टेबल लग सकती हैं. अगर स्क्रीनप्ले थोड़ा ज्यादा टाइट होता, तो फिल्म का असर और बेहतर हो सकता था. फिर भी अभिषेक डोगरा फिल्म का टोन हल्का रखते हैं. यह कोई गंभीर क्राइम थ्रिलर बनने की कोशिश नहीं करती. इसका फोकस एक ऐसे कपल की कहानी पर है, जिसकी जिंदगी एक गलत फैसले के बाद लगातार बड़ी मुसीबत में बदलती जाती है. यही वजह है कि फिल्म में क्राइम के बावजूद एक हल्का-फुल्का और क्वर्की अंदाज बना रहता है.

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फाइनल वर्डिक्ट

‘जीवन या भीमा कॉन?’ का कॉन्सेप्ट दिलचस्प है और अरशद वारसी का डबल रोल फिल्म को देखने की सबसे बड़ी वजह देता है. कहानी में कंफ्यूजन, क्राइम और कॉमेडी का अच्छा मिश्रण है, हालांकि स्क्रीनप्ले कुछ जगहों पर और मजबूत हो सकता था. फिर भी अगर आप अरशद वारसी की कॉमेडी, डबल रोल और क्राइम-कॉमेडी पसंद करते हैं, तो यह फिल्म एक मजेदार वन-टाइम वॉच बन सकती है.

First published on: Sep 04, 2026 12:29 PM

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