RBI New Rule: अब बैंक नहीं बेच पाएंगे आपकी मर्जी के बिना कोई भी फालतू प्रोडक्ट, नियमों में हुए बड़े बदलाव
1 जनवरी, 2027 से भारतीय बैंकिंग व्यवस्था ग्राहकों के लिए बेहद सुरक्षित होने जा रही है। अब गेंद बैंकों के पाले में है, जिन्हें 31 दिसंबर, 2026 तक अपने पूरे डिजिटल सिस्टम, फॉर्म्स और स्टाफ की कार्यशैली को इस नए कानून के मुताबिक बदलना होगा।
अगर आप कभी बैंक में होम लोन लेने गए हों और आपको जबरन बीमा (Insurance) थमा दिया गया हो, या बैंकिंग ऐप खोलते ही लोन के फालतू 'पॉप-अप' आपको परेशान करते हों, तो आपके लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) से एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर आई है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 15 जून 2026 को एक ऐतिहासिक आदेश जारी करते हुए बैंकों द्वारा की जाने वाली जबरन बंडलिंग (एक के साथ दूसरा प्रोडक्ट थोपना), गलत जानकारी देकर प्रोडक्ट बेचना (Mis-selling) और डिजिटल ऐप्स पर चालाकी से ग्राहकों को फंसाने वाले तरीकों पर पूरी तरह से बैन लगा दिया है।
यह नया नियम 1 जनवरी 2027 से पूरी तरह लागू हो जाएगा, जिससे बैंकों को अपना सिस्टम सुधारने के लिए करीब साढ़े छह महीने का समय मिला है। आइए आम जनता के लिहाज से बेहद आसान भाषा में समझते हैं कि आरबीआई के इस फैसले से आपकी बैंकिंग कितनी बदलने वाली है।
अगर बैंक की यह गड़बड़ी साबित हो जाती है, तो बैंक को ग्राहक का पूरा पैसा वापस (Full Refund) करना होगा और साथ ही हुए नुकसान का हर्जाना भी देना होगा। ग्राहक बैंक से एग्रीमेंट मिलने के 30 दिनों के भीतर इसकी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
लोन के साथ इंश्योरेंस थोपना अब पूरी तरह गैरकानूनी
अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि होम लोन पास करने के लिए बैंक कर्मचारी अपनी ही पार्टनर कंपनी का इंश्योरेंस खरीदने का दबाव बनाते हैं। आरबीआई ने इस जबरन बंडलिंग को पूरी तरह बैन कर दिया है। अगर बैंक को सुरक्षा के लिहाज से होम लोन पर 'लोन प्रोटेक्शन प्लान' चाहिए, तो वह इसके लिए कह सकता है। लेकिन, ग्राहक यह इंश्योरेंस किसी भी कंपनी से खरीदने के लिए पूरी तरह आजाद है, बैंक उसे अपने पार्टनर से खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।
अभी तक डिजिटल ऐप्स या फॉर्म पर मैं सहमत हूं (I Agree) का बॉक्स पहले से ही टिक (Pre-ticked) होता था, जिससे ग्राहक अनजाने में हामी भर देते थे। अब डिजिटल स्क्रीन पर डिफॉल्ट रूप से No या I do not agree (मैं सहमत नहीं हूँ) का विकल्प सेट रहेगा। जब तक ग्राहक खुद सोच-समझकर Yes नहीं दबाएगा, तब तक कोई सर्विस चालू नहीं होगी। बैंक को हर एक प्रोडक्ट के लिए अलग से मंजूरी लेनी होगी। लोन के लिए ली गई मंजूरी को इंश्योरेंस बेचने की मंजूरी नहीं माना जाएगा।
बैंक के एजेंटों (DSAs) पर कड़ा पहरा: 9 से 7 के बाद नो कॉल
अक्सर बैंक के सीधे कर्मचारी न होकर, कमीशन पर काम करने वाले एजेंट (Direct Selling Agents) ग्राहकों को परेशान करते थे। अब वे सीधे आरबीआई की रडार पर हैं। ये एजेंट ग्राहकों को केवल सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे के बीच ही फोन कर सकते हैं। बिना अनुमति के वे आपके घर या ऑफिस नहीं आ सकते।
बैंक को अपनी वेबसाइट पर सभी अधिकृत एजेंटों की लिस्ट डालनी होगी। अगर वे बैंक ब्रांच के अंदर बैठते हैं, तो उनकी ड्रेस या आईडी कार्ड बैंक कर्मियों से बिल्कुल अलग होना चाहिए ताकि ग्राहक भ्रमित न हों।
ऐप्स और वेबसाइटों के इन 11 डिजिटल हथकंडों (Dark Patterns) पर लगा बैन
आरबीआई ने साफ तौर पर उन 11 डिजिटल चालों की लिस्ट जारी की है, जिनका इस्तेमाल बैंक अपने ऐप्स या वेबसाइट पर ग्राहकों को फंसाने के लिए नहीं कर सकते:
झूठी जल्दबाजी (False Urgency): लोन ऑफर के नीचे "जल्दी करें", "ऑफर खत्म होने वाला है" जैसे टाइमर लगाना ताकि ग्राहक बिना सोचे-समझे हां कर दे।
चुपके से सामान डालना (Basket Sneaking): लोन अप्लाई करते समय चुपके से लोन प्रोटेक्शन या फ्रॉड कवर का चार्ज जोड़ देना।
शर्मिंदा करना (Confirm Shaming): अगर ग्राहक ऑफर ठुकराए, तो बटन पर लिखना- "नहीं, मुझे अपने अकाउंट की सुरक्षा नहीं चाहिए", ताकि ग्राहक को अपनी ही पसंद पर हिचक हो।
जबरन रीडायरेक्ट करना (Forced Action): पॉप-अप विज्ञापन के क्लोज (X) बटन को दबाने पर भी लोन वाले पेज पर भेज देना।
सब्सक्रिप्शन का जाल (Subscription Trap): क्रेडिट कार्ड या प्लान चालू करना तो आसान रखना, लेकिन उसे बंद करने का ऑप्शन ऐप में ढूंढना नामुमकिन बना देना।
इंटरफेस की चालाकी (Interface Interference): बैंक के फायदे वाले ऑप्शन को चमकदार रंगों में दिखाना और 'अकाउंट बंद करने' जैसे ऑप्शन को छुपाकर रखना।
दिखाना कुछ, देना कुछ (Bait and Switch): विज्ञापन में कम ब्याज दर दिखाना और अप्लाई करते समय बढ़ा देना; या 'लाइफटाइम फ्री' कहकर बाद में छिपे हुए चार्ज लगा देना।
किश्तों में कीमत बताना (Drip Pricing): प्रोसेसिंग फीस और अन्य चार्ज को शुरुआत में न बताकर बिल्कुल आखिरी में दिखाना।
छिपा हुआ विज्ञापन (Disguised Advertisement): ऐसे नोटिफिकेशन भेजना जो बैंक का जरूरी अलर्ट लगें, लेकिन अंदर कोई नया लोन प्रोडक्ट बिक रहा हो।
बार-बार परेशान करना (Nagging): ग्राहक द्वारा एक बार 'No' कहने के बाद भी बार-बार डेटा या कुकीज की परमिशन मांगना।
उलझाऊ शब्द (Trick Wording): कन्फ्यूज करने वाले शब्दों का इस्तेमाल करना, जैसे- "अगर आप ऑफर नहीं चाहते तो इस बॉक्स को अनचेक करें।"
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी जता चुकी हैं चिंता
यह सख्त कदम अचानक नहीं आया है। पिछले साल नवंबर में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के एक कार्यक्रम में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने साफ कहा था कि बैंकों द्वारा जबरन बीमा बेचने से ग्राहकों के लिए लोन की लागत अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ जाती है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत वित्तीय उत्पादों की गलत तरीके से बिक्री (Mis-selling) को अब एक अपराध के रूप में देखा जाएगा।
अगर आप कभी बैंक में होम लोन लेने गए हों और आपको जबरन बीमा (Insurance) थमा दिया गया हो, या बैंकिंग ऐप खोलते ही लोन के फालतू ‘पॉप-अप’ आपको परेशान करते हों, तो आपके लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) से एक बहुत बड़ी और राहत भरी खबर आई है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने 15 जून 2026 को एक ऐतिहासिक आदेश जारी करते हुए बैंकों द्वारा की जाने वाली जबरन बंडलिंग (एक के साथ दूसरा प्रोडक्ट थोपना), गलत जानकारी देकर प्रोडक्ट बेचना (Mis-selling) और डिजिटल ऐप्स पर चालाकी से ग्राहकों को फंसाने वाले तरीकों पर पूरी तरह से बैन लगा दिया है।
यह नया नियम 1 जनवरी 2027 से पूरी तरह लागू हो जाएगा, जिससे बैंकों को अपना सिस्टम सुधारने के लिए करीब साढ़े छह महीने का समय मिला है। आइए आम जनता के लिहाज से बेहद आसान भाषा में समझते हैं कि आरबीआई के इस फैसले से आपकी बैंकिंग कितनी बदलने वाली है।
अगर बैंक की यह गड़बड़ी साबित हो जाती है, तो बैंक को ग्राहक का पूरा पैसा वापस (Full Refund) करना होगा और साथ ही हुए नुकसान का हर्जाना भी देना होगा। ग्राहक बैंक से एग्रीमेंट मिलने के 30 दिनों के भीतर इसकी शिकायत दर्ज करा सकते हैं।
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लोन के साथ इंश्योरेंस थोपना अब पूरी तरह गैरकानूनी
अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि होम लोन पास करने के लिए बैंक कर्मचारी अपनी ही पार्टनर कंपनी का इंश्योरेंस खरीदने का दबाव बनाते हैं। आरबीआई ने इस जबरन बंडलिंग को पूरी तरह बैन कर दिया है। अगर बैंक को सुरक्षा के लिहाज से होम लोन पर ‘लोन प्रोटेक्शन प्लान’ चाहिए, तो वह इसके लिए कह सकता है। लेकिन, ग्राहक यह इंश्योरेंस किसी भी कंपनी से खरीदने के लिए पूरी तरह आजाद है, बैंक उसे अपने पार्टनर से खरीदने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।
अभी तक डिजिटल ऐप्स या फॉर्म पर मैं सहमत हूं (I Agree) का बॉक्स पहले से ही टिक (Pre-ticked) होता था, जिससे ग्राहक अनजाने में हामी भर देते थे। अब डिजिटल स्क्रीन पर डिफॉल्ट रूप से No या I do not agree (मैं सहमत नहीं हूँ) का विकल्प सेट रहेगा। जब तक ग्राहक खुद सोच-समझकर Yes नहीं दबाएगा, तब तक कोई सर्विस चालू नहीं होगी। बैंक को हर एक प्रोडक्ट के लिए अलग से मंजूरी लेनी होगी। लोन के लिए ली गई मंजूरी को इंश्योरेंस बेचने की मंजूरी नहीं माना जाएगा।
बैंक के एजेंटों (DSAs) पर कड़ा पहरा: 9 से 7 के बाद नो कॉल
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अक्सर बैंक के सीधे कर्मचारी न होकर, कमीशन पर काम करने वाले एजेंट (Direct Selling Agents) ग्राहकों को परेशान करते थे। अब वे सीधे आरबीआई की रडार पर हैं। ये एजेंट ग्राहकों को केवल सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे के बीच ही फोन कर सकते हैं। बिना अनुमति के वे आपके घर या ऑफिस नहीं आ सकते।
बैंक को अपनी वेबसाइट पर सभी अधिकृत एजेंटों की लिस्ट डालनी होगी। अगर वे बैंक ब्रांच के अंदर बैठते हैं, तो उनकी ड्रेस या आईडी कार्ड बैंक कर्मियों से बिल्कुल अलग होना चाहिए ताकि ग्राहक भ्रमित न हों।
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ऐप्स और वेबसाइटों के इन 11 डिजिटल हथकंडों (Dark Patterns) पर लगा बैन
आरबीआई ने साफ तौर पर उन 11 डिजिटल चालों की लिस्ट जारी की है, जिनका इस्तेमाल बैंक अपने ऐप्स या वेबसाइट पर ग्राहकों को फंसाने के लिए नहीं कर सकते:
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झूठी जल्दबाजी (False Urgency): लोन ऑफर के नीचे “जल्दी करें”, “ऑफर खत्म होने वाला है” जैसे टाइमर लगाना ताकि ग्राहक बिना सोचे-समझे हां कर दे।
चुपके से सामान डालना (Basket Sneaking): लोन अप्लाई करते समय चुपके से लोन प्रोटेक्शन या फ्रॉड कवर का चार्ज जोड़ देना।
शर्मिंदा करना (Confirm Shaming): अगर ग्राहक ऑफर ठुकराए, तो बटन पर लिखना- “नहीं, मुझे अपने अकाउंट की सुरक्षा नहीं चाहिए”, ताकि ग्राहक को अपनी ही पसंद पर हिचक हो।
जबरन रीडायरेक्ट करना (Forced Action): पॉप-अप विज्ञापन के क्लोज (X) बटन को दबाने पर भी लोन वाले पेज पर भेज देना।
सब्सक्रिप्शन का जाल (Subscription Trap): क्रेडिट कार्ड या प्लान चालू करना तो आसान रखना, लेकिन उसे बंद करने का ऑप्शन ऐप में ढूंढना नामुमकिन बना देना।
इंटरफेस की चालाकी (Interface Interference): बैंक के फायदे वाले ऑप्शन को चमकदार रंगों में दिखाना और ‘अकाउंट बंद करने’ जैसे ऑप्शन को छुपाकर रखना।
दिखाना कुछ, देना कुछ (Bait and Switch): विज्ञापन में कम ब्याज दर दिखाना और अप्लाई करते समय बढ़ा देना; या ‘लाइफटाइम फ्री’ कहकर बाद में छिपे हुए चार्ज लगा देना।
किश्तों में कीमत बताना (Drip Pricing): प्रोसेसिंग फीस और अन्य चार्ज को शुरुआत में न बताकर बिल्कुल आखिरी में दिखाना।
छिपा हुआ विज्ञापन (Disguised Advertisement): ऐसे नोटिफिकेशन भेजना जो बैंक का जरूरी अलर्ट लगें, लेकिन अंदर कोई नया लोन प्रोडक्ट बिक रहा हो।
बार-बार परेशान करना (Nagging): ग्राहक द्वारा एक बार ‘No’ कहने के बाद भी बार-बार डेटा या कुकीज की परमिशन मांगना।
उलझाऊ शब्द (Trick Wording): कन्फ्यूज करने वाले शब्दों का इस्तेमाल करना, जैसे- “अगर आप ऑफर नहीं चाहते तो इस बॉक्स को अनचेक करें।”
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी जता चुकी हैं चिंता
यह सख्त कदम अचानक नहीं आया है। पिछले साल नवंबर में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के एक कार्यक्रम में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने साफ कहा था कि बैंकों द्वारा जबरन बीमा बेचने से ग्राहकों के लिए लोन की लागत अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ जाती है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत वित्तीय उत्पादों की गलत तरीके से बिक्री (Mis-selling) को अब एक अपराध के रूप में देखा जाएगा।