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Prasanna Tantri on Bank Mergers: अर्थशास्त्री एवं इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (ISB) के प्रोफेसर प्रसन्ना तंत्री ने भारत की बैंकिंग क्रेडिट फैसिलिटीज पर चिंता जाहिर की है। उन्होंने छोटे बैंकों के विलय के लिए केंद्र सरकार के प्रयास की आलोचना करते हुए कहा है कि यह दृष्टिकोण क्रेडिट एक्सेसिबिलिटी को कमजोर कर सकता है और उद्यमिता को नुकसान पहुंचा सकता है।
एक पॉडकास्ट में प्रोफेसर प्रसन्ना तंत्री ने बचत तक पहुंच में सुधार के लिए सरकार के प्रयासों को स्वीकार करते हुए तंत्री ने कहा कि मैं मोदी 2.0 का बहुत बड़ा प्रशंसक नहीं रहा हूं। मोदी सरकार ने बचत तक पहुंच की दिशा में अच्छा काम किया है, लेकिन सरकार क्रेडिट तक पहुंच की दिशा में कुछ खास नहीं कर पाई है। ये दोनों बहुत अलग बातें हैं।
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उन्होंने भारत के मौजूदा बैंकिंग बुनियादी ढांचे की चुनौतियों के बारे में विस्तार से बात करते हुए कहा कि बचत तक पहुंच (Access to Savings) है- बचतकर्ता को बैंक पर भरोसा करना होगा और यह आसान है। लोग सरकार और बैंकों पर भरोसा करते हैं। जबकि एक्सेस टू क्रेडिट इसके विपरीत है। इस मामले में बैंक को उधार लेने वाले पर भरोसा करना होता है और आप ‘मुद्रा’ जैसी योजना के माध्यम से ऐसा नहीं कर सकते।
पीजी रेडियो से बात करते हुए तंत्री ने छोटे व्यवसायों की फाइनेंस संबंधी जरूरतों को पूरा करने में बड़े बैंकों की अक्षमता पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यदि आपके पास एसबीआई जैसा एक बड़ा मोनोलिथिक बैंक है, तो वे यह समझने में समय बर्बाद नहीं करेंगे कि आप कौन हैं, आपका व्यवसाय क्या है, आदि। आपको स्पेशलाइज्ड छोटे बैंकों और नकदी प्रवाह के आधार पर ऋण देने की क्षमता की आवश्यकता है।
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अर्थशास्त्री प्रसन्ना तंत्री ने रिलेशनशिप बैंकिंग को बढ़ावा देने के महत्व पर जोर दिया, जहां लेंडर्स केवल कोलैटरल पर निर्भर रहने के बजाय उधारकर्ताओं के नकदी प्रवाह को समझने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। उन्होंने कहा कि छोटे लेंडर्स को उधारकर्ता को समझने और फिर नकदी प्रवाह के आधार पर ऋण देने में सक्षम होना चाहिए। हमें नकदी प्रवाह-आधारित ऋण को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
तंत्री ने मौजूदा व्यवस्था में कोलैटरल के मूल्यांकन में खामियों की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा कि आरबीआई और अन्य में कई लोग इस बात को नहीं समझते। उन्हें लगता है कि आपने 100 रुपये की सिक्योरिटी दी है और मैंने आपको 80 रुपये का लोन दिया है। तो मैं सुरक्षित हूं। लेकिन वे यह नहीं समझते कि जब आप डिफॉल्ट करते हैं, तो 100 रुपये की सिक्योरिटी 100 रुपये में नहीं बिकेगी। यह 50 या 40 रुपये में बिकेगी, यानी आप बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं हैं।
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उन्होंने कहा कि बैंकों का विलय और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) का बंद होना समस्या को और बढ़ा देता है। दो दिन पहले, एक NBFC बंद हो गई थी। क्या हम एनबीएफसी को बंद करने की कोशिश कर रहे हैं? सरकार बैंकों का विलय कर उन्हें बड़ा बना रही है। ऐसे में ऋण तक पहुंच मुश्किल होगी और यह बैंकिंग सिस्टम को लेकर मेरी सबसे बड़ी शिकायतों में से एक है।
तंत्री के अनुसार, प्रभावी ऋण ढांचे की कमी से भारत की वृद्धि और इनोवेशन क्षमता पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। अगर हम इसमें सुधार नहीं करते हैं, तो हम विकास नहीं कर पाएंगे, हमें मोनोपॉली का सामना करना होगा। बता दें कि सरकार पिछले कुछ समय से बैंकों के मर्जर पर फोकस कर रही है। कई सरकारी बैंकों का मर्जर पहले ही हो चुका है।
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