हिंदी न्यूज़/भारत एक सोच/2029 का चुनावी मास्टरस्ट्रोक! 816 सीटों वाली नई लोकसभा और 273 महिला MPs की तैयारी; क्या बदलेगी देश की राजनीति?
भारत एक सोच
2029 का चुनावी मास्टरस्ट्रोक! 816 सीटों वाली नई लोकसभा और 273 महिला MPs की तैयारी; क्या बदलेगी देश की राजनीति?
नेता हमेशा वही सफल होता है, जो वक्त से आगे की सोच रखता हो और बड़ी चतुराई से लोगों के दिलों में जगह बनाने में माहिर होता है. संसद और विधानसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण भी एक ऐसा ही मुद्दा है. इस मुद्दे पर बहुत राजनीति हो चुकी है.
हाइलाइट्स
News24 AI द्वारा निर्मित • संपादकीय टीम द्वारा जांचा गया
महिला आरक्षण विधेयक पर मुख्य बातें
मोदी सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव और आगामी विधानसभा चुनावों में महिला आरक्षण विधेयक लागू करने की तैयारी कर रही है।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के तहत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित की जाएंगी।
यदि योजना सफल रही, तो लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर 816 हो सकती हैं, जिनमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
विधेयक के कार्यान्वयन में चुनौतियाँ
इस विधेयक को लागू करने के लिए कई संवैधानिक संशोधनों और कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जिसमें 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन भी शामिल है।
राजनीति और कूटनीति में नतीजों के हिसाब से तर्क गढ़ लिए जाते हैं. अभी लोग ये हिसाब लगाने में जुटे हैं कि असम में 85% प्लस वोटिंग के मायने क्या हैं? केरल में 78% वोटिंग से किसे फायदा होगा, पुडुचेरी में करीब 90 मतदान कर किस तरह की सरकार की उम्मीद कर रहे हैं? नतीजे एकतरफा रहेंगे या ज्यादातर सीटों पर जीत-हार का फैसला कम वोटों के अंतर से होगा? पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में अभी लोगों के फैसले का इंतजार है. लेकिन, एक बात तय है कि चुनावी नतीजे तय करने में सबसे दमदार भूमिका महिला वोटर निभा रही हैं. एक तरह से सत्ता की असली चाबी आधी आबादी के हाथों में है. लेकिन, एक सच ये भी है कि देशभर में विधानसभाओं में खड़ी महिलाओं की हिस्सेदारी पुरुष विधायकों की तुलना में आधी तो छोड़िए 10 फीसदी भी नहीं है. साल 2024 में सिर्फ 74 महिलाएं हीं चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंच पाईं. लेकिन, 2029 में तस्वीर बदलने की पूरी तैयारी हो चुकी है. बजट सत्र को तीन दिनों के लिए बढ़ाया गया है, जिससे 16, 17 और 18 अप्रैल को संसद सत्र में महिला आरक्षण विधेयक लागू कराने का रास्ता निकाला जा सके. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला आरक्षण विधेयक को महिलाओं की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब बताया है. वो अपने लेख में लिखते हैं कि 2029 के लोकसभा चुनाव और आगे के विधानसभा चुनावों में इसे लागू किया जाना चाहिए. मतलब , मोदी सरकार आधी आबादी को संसद और विधानसभा के भीतर प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए तैयार है । ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर दिक्कत कहां हैं? इसके लिए संविधान में कहां-कहां संशोधन करना पड़ेगा? आधी आबादी को आखिर संसद और विधानसभाओं के भीतर हक कौन नहीं देना चाहता है? क्या संसद और विधानसभाओं के भीतर महिलाओं की संख्या बढ़ने से देश की सामान्य बेटियों की स्थिति में सुधार होगा? हमारे देश का चुनावी सिस्टम मौजूदा समय में महिलाओं की भूमिका को किस तरह देखता है?
अगर सब कुछ मोदी सरकार की प्लानिंग के मुताबिक हुआ, तो साल 2029 में लोकसभा के लिए 816 सीटों पर चुनाव होगा. इसमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए रिजर्व होंगी. 31 मार्च, 2029 के बाद जितने भी राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे - उसमें महिलाओं के लिए 33% सीटें रिजर्व होंगी. मतलब, संसद से लेकर विधानसभाओं के भीतर महिला सांसदों और विधायकों की संख्या एकाएक बढ़ जाएगी. प्रधानमंत्री मोदी ने इस विधेयक पर सभी राजनीतिक दलों से समर्थन की अपील की है. मतलब, महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण देने की राह में खड़े स्पीड ब्रेकर्स को हटाना होगा. ऐसे में केंद्र सरकार नई जनगणना के आंकड़ों की जगह 2011 के आंकड़ों के इस्तेमाल की तैयारी में है. इसी आधार पर परिसीमन के जरिए सीटों को बढ़ाने का रास्ता निकालने की तैयारी है. ऐसे में सबसे पहले समझते हैं कि लोकसभा और विधानसभाओं के भीतर 2029 से महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटें आरक्षित करने के लिए सरकार की तैयारी क्या है?
नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन का ड्राफ्ट बिल तैयार है. पूरे देश को 16, 17 और 18 अप्रैल को होने वाली संसद की कार्यवाही का इंतजार है. अगर सब कुछ मोदी सरकार की प्लानिंग के मुताबिक हुआ - तो लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर 816 हो जाएंगी. बढ़ी हुई 273 सीटें महिलाओं के लिए रिजर्व होंगी. एक सच ये भी है कि हमारे देश में कानून बनाना तो आसान है, लेकिन कानून लागू कराना उतना आसान नहीं होता. नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 पास हो चुका है. जो देश की महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में 33% सीटें रिजर्व करने वाला ऐतिहासिक कानून है. लेकिन, ये कानून अभी कागजों पर ही हैं.
मोदी सरकार अब महिला आरक्षण का सिस्टम लागू कराने की पूरी तैयारी कर चुकी है. इसके लिए लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 816 की जा सकती है. इसी अनुपात में राज्यों में विधानसभा की सीटें भी बढ़ाने की बात हो रही है. ये सब साल 2011 की जनगणना के आधार पर करने की तैयारी है. ऐसे में ये समझना जरूरी है कि लोकसभा में सीटों के मामले में किस तरह का बदलाव दिख सकता है.
यूपी की 80 सीटें बढ़कर 120 हो सकती हैं. महाराष्ट्र की 48 सीटें बढ़कर 72 हो सकती हैं. पश्चिम बंगाल की 42 सीटें बढ़ कर 63 हो सकती हैं. बिहार की मौजूदा 40 सीटें 60 में बदल सकती हैं. एमपी की 29 सीटें 44 हो सकती हैं. राजस्थान की 25 सीटों के बढ़कर 38 होने की अटकलें लगाई जा रही हैं. अगर दक्षिण भारत के राज्यों की बात की जाए तो तमिलनाडु की मौजूदा 39 सीटें 59 तक जा सकती हैं. कर्नाटक में 28 की जगह 42 सीटें हो सकती हैं. आंध्र प्रदेश की 25 सीटें बढ़कर 38 हो सकती हैं. केरल का आंकड़ा 20 सीटों से 30 पर पहुंच सकता और तेलंगाना की 17 सीटें 26 में बदल सकती हैं.
मोदी सरकार को 2029 में महिलाओं के लिए संसद और विधानसभाओं में आरक्षण सिस्टम लागू करने के लिए कई संवैधानिक संशोधनों से गुजरना पड़ सकता है. कई कानूनी और संवैधानिक चुनौतियों से जूझना पड़ सकता है. संविधान का अनुच्छेद 81 एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य के सिद्धांत की बात करता है.
संविधान का अनुच्छेद 82 कहता है कि हर जनगणना के बाद संसद परिसीमन आयोग का गठन करेगी. परिसीमन आयोग का दो काम होता है. पहला, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को तय करना. दूसरा, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण करना.
परिसीमन पर रोक भी 1976 और 2001 के संवैधानिक संशोधनों की वजह से है. राज्यों के बीच सीटों के बंटवारे के लिए 1971 की जनगणना को आधार माना गया था और उस व्यवस्था को बढ़ाने के लिए 2001 में संशोधन किया गया था.
ऐसे में संसद और विधानसभा में सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए अगली जनसंख्या के आंकड़ों का इंतजार करना पड़ता. लेकिन, मोदी सरकार 2011 की जनसंख्या के आधार पर ही आगे बढ़ने का मन बना चुकी है. परिसीमन आयोग संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 से बंधा होता है. ऐसे में माना जा रहा है कि पिछली जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन आयोग के लिए 50% सीटें बढ़ाने का काम आसान नहीं होगा.
दलील ये दी जा रही है कि अगर नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन के जरिए महिला आरक्षण को अगली जनगणना और उसके बाद के परिसीमन से अलग कर दिया जाए तो परिसीमन आयोग की जरूरत नहीं पड़ेगी. लेकिन, इस व्यवस्था को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. संविधान में लोकसभा सदस्यों की संख्या 550 बताई गयी है. ऐसे में लोकसभा सदस्यों की संख्या बढ़ाने के लिए संविधान में संशोधन की दरकार होगी.
महिलाओं को संसद और विधानसभाओं के भीतर किस तरह एक तिहाई आरक्षण मिलेगा? इस मुद्दे पर अभी बहुत कुछ स्पष्ट होना बाकी है. लांकि, वर्टिकल आरक्षण की बात हो रही है.
माना जा रहा है कि महिलाओं को संसद और विधानसभाओं के भीतर आरक्षण रोटेशन सिस्टम के आधार पर दिया जा सकता है. यानी हर चुनाव में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें बदल सकती हैं.
मोदी सरकार ने महिलाओं के लिए संसद और विधानसभाओं के भीतर सीटें आरक्षित करने का कार्ड ऐसे समय चला है - जब देश के 4 राज्य और एक केंद्र शासित प्रदेश चुनावी प्रक्रिया से गुजर रहा है. महिलाएं एक बहुत मुखर और मजबूत वोट बैंक के रूप में सामने आईं हैं. खुद प्रधानमंत्री मोदी भी महिलाओं को बीजेपी का साइलेंट वोटर बता चुके हैं. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की भी बड़ी उम्मीद महिला वोटरों से है. ममता सरकार की महत्वाकांक्षी योजना लक्ष्मी भंडार के लाभार्थियों की संख्या सवा दो करोड़ से अधिक है. इस योजना के तहत 25 से 60 साल तक की महिलाओं को हर महीने डेढ़ हजार रुपये मिलते हैं. तमिलनाडु में मुख्यमंत्री स्टालिन भी महिलाओं को हर महीने दी जाने वाली कैश योजनाओं के सहारे सत्ता में वापसी का ख्वाब देख रहे हैं. पश्चिम बंगाल की विधानसभा में फिलहाल महिलाओं का प्रतिनिधित्व करीब 12 फीसदी है. वहीं, तमिलनाडु की विधानसभा में करीब 5 फीसदी. आज की तारीख में देशभर की विधानसभाओं में विधायकों की कुल संख्या 4000 से अधिक है. लेकिन, महिला विधायकों की संख्या 400 भी नहीं है. नया कानून संसद से विधानसभा तक महिलाओं का प्रतिनिधित्व एकाएक बढ़ा देगा. लेकिन, संसद और विधानसभा के भीतर किस पृष्ठभूमि की महिलाएं पहुंचेंगी और उससे देश की सामान्य महिलाओं को कितना फायदा होगा - इसे फिलहाल अलग-अलग लेंस से देखने और समझने की कोशिश हो रही है.
समाजवादी पार्टी की डिंपल यादव हों या एनसपी की सुप्रिया सुले, आरजेडी से मीसा भारती हों या अकाली दल की हरसिमत कौर बादल, बीजेपी की बांसुरी स्वराज या LJP(R) से शांभवी चौधरी इन सब सांसदों में एक चीज कॉमन है - वो ये कि इन सभी का ताल्लुक राजनीतिक परिवारों से है. आज की तारीख में सांसद या विधानसभा पहुंचने वाली ज्यादातर महिलाओं का कनेक्शन कहीं-न-कहीं राजनीतिक परिवारों से जुड़ता है. लेकिन, नारी शक्ति वंदन अधिनियम लागू होने के बाद तस्वीर बहुत हद तक बदलने की उम्मीद है. सामान्य परिवारों की महिलाओं की संसद और विधानसभा पहुंचने की राह आसान होगी.
आज की तारीख में कोई भी राजनीतिक दल संसद और विधानसभा के भीतर महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण देने का विरोध करने का जोखिम नहीं ले सकता. इस मुद्दे पर कांग्रेस बीजेपी से सीधे सवाल कर रही है. समाजवादी पार्टी और आरजेडी जैसे कुछ राजनीतिक दलों की मांग है कि प्रस्तावित संशोधन में पिछड़ी जाति की महिलाओं के लिए आरक्षण होना चाहिए. मतलब, महिला आरक्षण में कोटा के भीतर कोटा के मुद्दे पर विपक्ष पेंच फंसा सकता है.
माना जा रहा है कि लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को रोटेशन सिस्टम के आधार पर आरक्षण दिया जा सकता है. ऐसे में जो भी सीट महिलाओं के लिए रिजर्व होगी या रोटेशन सिस्टम में आएगी. वहां घरेलू दावेदारी दिख सकती है. ऐसे में संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई आरक्षण से देश की सामान्य महिलाओं की तस्वीर कितनी बदलेगी. इसे अपने-अपने लेंस से देखने और समझने की कोशिश हो रही है.
पंचायत में जब महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण का रास्ता खोला गया, तब भी इस तरह की बातें हुईं. कई मामले ऐसे भी सामने आए कि महिला के प्रधान बनने के बाद फैसले परिवार के लोग ही लेते हैं. लेकिन, एक सच ये भी है कि पिछले तीन दशकों में तस्वीर बहुत हद तक बदली है. पंचायत में पढ़ी-लिखी महिलाएं अपने हिसाब से स्वतंत्र होकर फैसला ले रही हैं. लोकतंत्र की मजबूती के साथ भारत निर्माण में दमदार भूमिका निभा रही हैं. ऐसे में जब सामान्य पृष्ठभूमि की महिलाओं की संसद और विधानसभाओं में संख्या बढ़ने लगेगी. तो आधी आबादी की आवाज को ताकत और सपनों को परवाज मिलनी तय है.
इस सत्र में महिला आरक्षण कानून लागू होने की राह में खड़े स्पीड ब्रेकर्स हट भी गए तो भी अगले साल यूपी, उत्तराखंड और पंजाब विधानसभा चुनाव में इसका फायदा महिलाओं को नहीं मिल पाएगा. इसके लिए 2032 के विधानसभा चुनाव का इंतजार करना होगा. राजनीति में महिलाओं को आरक्षण का मुद्दा अंग्रेजों के जमाने में उठा, नतीजा ये रहा कि भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत महिलाओं को Legislative में आरक्षण का रास्ता खुला. तब के यूनाइटेड प्रोविंस और आज के उत्तर प्रदेश में 6 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित थीं. आजादी मिलने के बाद महिला आरक्षण का सिस्टम खत्म कर दिया गया. आजाद भारत के पहले आम चुनाव में सिर्फ 22 महिलाएं लोकसभा चुनाव जीतने में कामयाब रहीं. आधी आबादी का आजाद भारत की पहली लोकसभा में प्रतिनिधित्व करीब 5 फीसदी रहा. 2024 के लोकसभा चुनावों में कुल 8,360 उम्मीदवार मैदान में थे, जिसमें महिला उम्मीदवारों की संख्या 797 थीं.
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर ममता बनर्जी हैं. एक महिला मुख्यमंत्री, उन्हें सत्ता में बनाए रखने में M यानि महिला फैक्टर ने बड़ी भूमिका निभाई है. महिला वोटरों को साधने के लिए ममता सरकार कई योजनाएं चला रही हैं. ममता बनर्जी ने बंगाल चुनाव में TMC के निशान से 52 महिलाओं को मैदान में उतारा है. ममता बनर्जी ने 18% टिकट महिला उम्मीदवारों को दिया है. बीजेपी ने बंगाल में एक तिहाई सीटों पर महिलाओं को टिकट नहीं दिया है. राजनीतिक दल भले ही महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा चुनाव में एक तिहाई आरक्षण की बात जोर-शोर से करते हों. लेकिन, टिकट देने में हिचक दिखाते रहे हैं.
आजादी के बाद से ही अगर लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व देखें तो 1952 में 22, 1957 में 22, 1961 में 31, 1967 में 29, 1971 में 28, 1977 में 19, 1980 में 28, 1984 में 43, 1989 में 29, 1991 में 39, 1996 में 40, 1998 में 43, 1999 में 49, 2004 में 45, 2009 में 59, 2014 में 66, 2019 में 78 तो 2024 में 74 महिलाएं लोकसभा पहुंचने में कामयाब रहीं.
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां महिला वोटरों की संख्या सबसे ज्यादा है. भारतीय महिलाओं की स्थिति इस मामले में बेहतर मानी जाएगी कि आजादी के बाद पुरूषों के साथ-साथ महिलाओं को भी बराबरी के आधार पर एक साथ वोटिंग का अधिकार मिला. लेकिन, आधी आबादी को टिकट देने में राजनीतिक पार्टियों ने हिचक दिखाई है. इसकी गवाही एक रिसर्च रिपोर्ट में लोकसभा चुनाव के दौरान अखाड़े में उतरी महिलाओं की संख्या बता रही है.
साल 1957 में सिर्फ 45 महिलाओं ने लोकसभा चुनाव में उतरीं. साल 1977 में ये संख्या 70 पर पहुंची. 1996 के लोकसभा चुनाव के महिलाओं के लिहाज कई मायनों में अहम माना जा सकता है. इस चुनाव के दौरान महिला उम्मीदवारों की संख्या में गजब की बढ़ोत्तरी दिखी. 599 महिला उम्मीदवार लोकसभा के चुनावी समर में उतरीं. वहीं, साल 2009 में ये संख्या 566 ही रहीं. 2014 में 668 और 2019 में 716 महिला उम्मीदवारों ने संसद के निचले सदन के लिए वोट मांगा. तो 2024 के आम चुनाव में 797 महिला उम्मीदवारों ने किस्मत आजमाया.
राजनीतिक पार्टियां आधी आबादी को एक मजबूत वोट बैंक के तौर पर तो देखती हैं. लेकिन, चुनाव में टिकट देने के मामले में हिचकती रही हैं. संभवत: इसीलिए संसद से विधानसभाओं के भीतर महिलाओं की मौजूदगी कम दिखती है.
आजादी के बाद महिलाओं की राजनीति में हिस्सेदारी दिलाने की बातें बहुत हुईं. लेकिन, राजनीतिक दलों ने महिलाओं को टिकट देने में हिचक दिखाई. इतिहास गवाह है कि लोकसभा और विधानसभा पहुंचने वाली ज्यादातर महिलाएं राजनीतिक परिवारों वाली पृष्ठभूमि से रहीं. किसी बड़े राजनेता की पत्नी, बेटी, बहन, बहू या फिर मां. वो साल 1975 का था. तब देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर थीं - इंदिरा गांधी. उस दौर में एक रिपोर्ट आईं - Towards Equality. इसमें हर क्षेत्र में महिलाओं की जमीनी स्थिति का लेखा-जोखा था. इस रिपोर्ट में महिलाओं के लिए आरक्षण की बात भी कही गई थीं. हालांकि, रिपोर्ट तैयार करने वाले ज्यादातर सदस्य महिलाओं के लिए आरक्षण के खिलाफ थे. इंदिरा गांधी के निधन के बाद देश की कमान उनके पुत्र राजीव गांधी के हाथों में आईं. वो भारत को विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़ाते हुए 21वीं सदी में ले जाने का सपना देख रहे थे. तो पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण दिलाने की कोशिश की थी. मतलब, राजीव गांधी ने राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने का सपना लोकतंत्र की पहली सीढ़ी से देखा. जो नरसिम्हा राव के दौर में 72वें संविधान संशोधन के तौर पर लागू हुआ. संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को आरक्षण दिलाने के लिए पहली बार विधेयक एचडी देवेगौड़ा की सरकार में पेश हुआ - वो साल था 1996 का, महीना सितंबर का. गठबंधन के पायों पर खड़ी देवगौड़ा सरकार के बिल का सरकार में शामिल कई पार्टियों ने विरोध किया. नतीजा ये रहा कि उस बिल को स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजा गया.
वो साल 1998 का था. तब प्रधानमंत्री की कुर्सी पर थे अटल बिहारी वाजपेयी. संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को आरक्षण के लिए विधेयक लाने की तैयारी हो चुकी थी. लेकिन, इस मुद्दे पर सबको साथ लाना बहुत मुश्किल था. महिला आरक्षण बिल पर सर्वसम्मति बनाने की बहुत कोशिश हुई. लेकिन, कामयाबी नहीं मिली. एसपी और आरजेडी जैसे कई दल महिला आरक्षण बिल का विरोध कर रहे थे. बिहार के जहानाबाद से लोकसभा सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव ने तो लालकृष्ण आडवाणी से छीनकर बिल की कॉपी फाड़ दी.
वाजपेयी सरकार ने 1999, 2002 और 2003-2004 में भी महिला आरक्षण विधेयक पास कराने की कोशिश की. लेकिन, कामयाबी नहीं मिली. साल 2004 में केंद्र में सत्ता का मिजाज बदला. यूपीए की सरकार बनी और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे डॉक्टर मनमोहन सिंह. मनमोहन सरकार ने साल 2008 में महिला आरक्षण बिल को 108वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में राज्यसभा में पेश किया. जमकर हंगामा हुआ, जिसके बाद विधेयक स्टैंटिंग कमेटी को भेजा गया.
एक जमाने में राजीव गांधी की पहल पर महिलाओं को पंचायत में आरक्षण मिल चुका था. इसे सोनिया गांधी और आगे बढ़ाना चाहती थीं. यूपीए सरकार भी गठबंधन के पायों पर खड़ी थी. ऐसे में सोनिया गांधी ने गठबंधन के साझीदारों को किसी तरह मनाकर राज्यसभा से महिला आरक्षण बिल पास करवाया, जिससे देश की महिलाओं को सत्ता में हिस्सेदारी मिल सके.
लेकिन, विधेयक लोकसभा में अटक गया. बिल का विरोध करने वालों में UPA सरकार में गठबंधन साझीदार RJD और SP शामिल थे. इन दलों की दलील थी कि वो महिला आरक्षण के विरोधी नहीं हैं - लेकिन, तत्कालीन बिल के मसौदे के पक्ष में नहीं थे. साल 2014 में फिर केंद्र में सत्ता का मिजाज बदला. पीएम की कुर्सी पर नरेंद्र मोदी आ गए. बीजेपी के 2014 और 2019 के चुनावी घोषणा पत्र में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का वादा था. कांग्रेस की ओर से इस मुद्दे पर समर्थन देने का भरोसा दिया गया.
साल 2023 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पेश किया. जो संसद के दोनों सदनों में पास हुआ और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद कानून बना. लेकिन, ये कानून अभी तक जमीन पर लागू नहीं हो पाया है. अब मोदी सरकार महिला आरक्षण कानून को 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले लागू कराने का मन बना चुकी है. इसके लिए सांसद 16, 17 और 19 अप्रैल को संसद भवन की नई बिल्डिंग में नई सोच के साथ जुटेंगे. जिससे महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में आरक्षण का फायदा मिलने की राह में पड़े स्पीडब्रेकर्स हटाए जा सकें.
नेता हमेशा वही सफल होता है, जो वक्त से आगे की सोच रखता हो और बड़ी चतुराई से लोगों के दिलों में जगह बनाने में माहिर होता है. संसद और विधानसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण भी एक ऐसा ही मुद्दा है. इस मुद्दे पर बहुत राजनीति हो चुकी है. बीजेपी चाहेगी कि महिला आरक्षण बिल किसी भी तरह पास हो जाए. वहीं, विपक्ष चाहेगा कि इस कानून को लागू करने का क्रेडिट बैठे-बिठाए बीजेपी को क्यों दिया जाए? ऐसे में इस बार के बहुत हद तक चांस हैं कि महिला आरक्षण कानून में कोटा के भीतर कोटा जैसे सुर तेज किए जाए. विपक्ष बिल की टाइमिंग पर सवाल उठाए? कोई भी सियासी पार्टी या नेता. अपने ऊपर महिला आरक्षण विरोधी का टैग नहीं लगने देना चाहेगा? ऐसे में इस मुद्दे पर विपक्ष भी बहुत फूंक-फूंक कर कदम रखेगा? भारतीय लोकतंत्र और चुनावी राजनीति उस दौर से बहुत आगे निकल चुकी है. जिसमें कभी महिलाओं की पहचान किसी की पत्नी, किसी की बेटी, किसी की बहू, किसी की मां के रूप में होती थी. महिलाओं का वोट उसी को जाता है, जहां परिवार के पुरुष चाहते थे. लेकिन, आज की तारीख में महिलाएं दबाव और प्रभाव से मुक्त होकर अपनी वोट की ताकत का इस्तेमाल कर रही हैं. खुद को संसद और विधानसभा के भीतर देखना चाहती हैं. अपनी आवाज बुलंद करना चाहती हैं. घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियां संभालते हुए संसद और विधानसभा में नए विधान बनाने से देश और राज्य चलाने तक की जिम्मेदारी पूरी शिद्दत से निभाना चाहती हैं. अब देखना है कि सियासतदां कितनी ईमानदारी के साथ संसद और विधानसभा के भीतर आधी आबादी को उनका हक देने के लिए ईमानदारी से कोशिश करते हैं?
https://www.youtube.com/watch?v=EkL5j_d-e9w
राजनीति और कूटनीति में नतीजों के हिसाब से तर्क गढ़ लिए जाते हैं. अभी लोग ये हिसाब लगाने में जुटे हैं कि असम में 85% प्लस वोटिंग के मायने क्या हैं? केरल में 78% वोटिंग से किसे फायदा होगा, पुडुचेरी में करीब 90 मतदान कर किस तरह की सरकार की उम्मीद कर रहे हैं? नतीजे एकतरफा रहेंगे या ज्यादातर सीटों पर जीत-हार का फैसला कम वोटों के अंतर से होगा? पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में अभी लोगों के फैसले का इंतजार है. लेकिन, एक बात तय है कि चुनावी नतीजे तय करने में सबसे दमदार भूमिका महिला वोटर निभा रही हैं. एक तरह से सत्ता की असली चाबी आधी आबादी के हाथों में है. लेकिन, एक सच ये भी है कि देशभर में विधानसभाओं में खड़ी महिलाओं की हिस्सेदारी पुरुष विधायकों की तुलना में आधी तो छोड़िए 10 फीसदी भी नहीं है. साल 2024 में सिर्फ 74 महिलाएं हीं चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंच पाईं. लेकिन, 2029 में तस्वीर बदलने की पूरी तैयारी हो चुकी है. बजट सत्र को तीन दिनों के लिए बढ़ाया गया है, जिससे 16, 17 और 18 अप्रैल को संसद सत्र में महिला आरक्षण विधेयक लागू कराने का रास्ता निकाला जा सके. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला आरक्षण विधेयक को महिलाओं की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब बताया है. वो अपने लेख में लिखते हैं कि 2029 के लोकसभा चुनाव और आगे के विधानसभा चुनावों में इसे लागू किया जाना चाहिए. मतलब , मोदी सरकार आधी आबादी को संसद और विधानसभा के भीतर प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए तैयार है । ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर दिक्कत कहां हैं? इसके लिए संविधान में कहां-कहां संशोधन करना पड़ेगा? आधी आबादी को आखिर संसद और विधानसभाओं के भीतर हक कौन नहीं देना चाहता है? क्या संसद और विधानसभाओं के भीतर महिलाओं की संख्या बढ़ने से देश की सामान्य बेटियों की स्थिति में सुधार होगा? हमारे देश का चुनावी सिस्टम मौजूदा समय में महिलाओं की भूमिका को किस तरह देखता है?
अगर सब कुछ मोदी सरकार की प्लानिंग के मुताबिक हुआ, तो साल 2029 में लोकसभा के लिए 816 सीटों पर चुनाव होगा. इसमें से 273 सीटें महिलाओं के लिए रिजर्व होंगी. 31 मार्च, 2029 के बाद जितने भी राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे – उसमें महिलाओं के लिए 33% सीटें रिजर्व होंगी. मतलब, संसद से लेकर विधानसभाओं के भीतर महिला सांसदों और विधायकों की संख्या एकाएक बढ़ जाएगी. प्रधानमंत्री मोदी ने इस विधेयक पर सभी राजनीतिक दलों से समर्थन की अपील की है. मतलब, महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण देने की राह में खड़े स्पीड ब्रेकर्स को हटाना होगा. ऐसे में केंद्र सरकार नई जनगणना के आंकड़ों की जगह 2011 के आंकड़ों के इस्तेमाल की तैयारी में है. इसी आधार पर परिसीमन के जरिए सीटों को बढ़ाने का रास्ता निकालने की तैयारी है. ऐसे में सबसे पहले समझते हैं कि लोकसभा और विधानसभाओं के भीतर 2029 से महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटें आरक्षित करने के लिए सरकार की तैयारी क्या है?
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नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन का ड्राफ्ट बिल तैयार है. पूरे देश को 16, 17 और 18 अप्रैल को होने वाली संसद की कार्यवाही का इंतजार है. अगर सब कुछ मोदी सरकार की प्लानिंग के मुताबिक हुआ – तो लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर 816 हो जाएंगी. बढ़ी हुई 273 सीटें महिलाओं के लिए रिजर्व होंगी. एक सच ये भी है कि हमारे देश में कानून बनाना तो आसान है, लेकिन कानून लागू कराना उतना आसान नहीं होता. नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 पास हो चुका है. जो देश की महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में 33% सीटें रिजर्व करने वाला ऐतिहासिक कानून है. लेकिन, ये कानून अभी कागजों पर ही हैं.
मोदी सरकार अब महिला आरक्षण का सिस्टम लागू कराने की पूरी तैयारी कर चुकी है. इसके लिए लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 816 की जा सकती है. इसी अनुपात में राज्यों में विधानसभा की सीटें भी बढ़ाने की बात हो रही है. ये सब साल 2011 की जनगणना के आधार पर करने की तैयारी है. ऐसे में ये समझना जरूरी है कि लोकसभा में सीटों के मामले में किस तरह का बदलाव दिख सकता है.
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यूपी की 80 सीटें बढ़कर 120 हो सकती हैं. महाराष्ट्र की 48 सीटें बढ़कर 72 हो सकती हैं. पश्चिम बंगाल की 42 सीटें बढ़ कर 63 हो सकती हैं. बिहार की मौजूदा 40 सीटें 60 में बदल सकती हैं. एमपी की 29 सीटें 44 हो सकती हैं. राजस्थान की 25 सीटों के बढ़कर 38 होने की अटकलें लगाई जा रही हैं. अगर दक्षिण भारत के राज्यों की बात की जाए तो तमिलनाडु की मौजूदा 39 सीटें 59 तक जा सकती हैं. कर्नाटक में 28 की जगह 42 सीटें हो सकती हैं. आंध्र प्रदेश की 25 सीटें बढ़कर 38 हो सकती हैं. केरल का आंकड़ा 20 सीटों से 30 पर पहुंच सकता और तेलंगाना की 17 सीटें 26 में बदल सकती हैं.
मोदी सरकार को 2029 में महिलाओं के लिए संसद और विधानसभाओं में आरक्षण सिस्टम लागू करने के लिए कई संवैधानिक संशोधनों से गुजरना पड़ सकता है. कई कानूनी और संवैधानिक चुनौतियों से जूझना पड़ सकता है. संविधान का अनुच्छेद 81 एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य के सिद्धांत की बात करता है.
संविधान का अनुच्छेद 82 कहता है कि हर जनगणना के बाद संसद परिसीमन आयोग का गठन करेगी. परिसीमन आयोग का दो काम होता है. पहला, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को तय करना. दूसरा, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण करना.
परिसीमन पर रोक भी 1976 और 2001 के संवैधानिक संशोधनों की वजह से है. राज्यों के बीच सीटों के बंटवारे के लिए 1971 की जनगणना को आधार माना गया था और उस व्यवस्था को बढ़ाने के लिए 2001 में संशोधन किया गया था.
ऐसे में संसद और विधानसभा में सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए अगली जनसंख्या के आंकड़ों का इंतजार करना पड़ता. लेकिन, मोदी सरकार 2011 की जनसंख्या के आधार पर ही आगे बढ़ने का मन बना चुकी है. परिसीमन आयोग संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 से बंधा होता है. ऐसे में माना जा रहा है कि पिछली जनगणना के आंकड़ों के आधार पर परिसीमन आयोग के लिए 50% सीटें बढ़ाने का काम आसान नहीं होगा.
दलील ये दी जा रही है कि अगर नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन के जरिए महिला आरक्षण को अगली जनगणना और उसके बाद के परिसीमन से अलग कर दिया जाए तो परिसीमन आयोग की जरूरत नहीं पड़ेगी. लेकिन, इस व्यवस्था को कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. संविधान में लोकसभा सदस्यों की संख्या 550 बताई गयी है. ऐसे में लोकसभा सदस्यों की संख्या बढ़ाने के लिए संविधान में संशोधन की दरकार होगी.
महिलाओं को संसद और विधानसभाओं के भीतर किस तरह एक तिहाई आरक्षण मिलेगा? इस मुद्दे पर अभी बहुत कुछ स्पष्ट होना बाकी है. लांकि, वर्टिकल आरक्षण की बात हो रही है.
माना जा रहा है कि महिलाओं को संसद और विधानसभाओं के भीतर आरक्षण रोटेशन सिस्टम के आधार पर दिया जा सकता है. यानी हर चुनाव में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें बदल सकती हैं.
मोदी सरकार ने महिलाओं के लिए संसद और विधानसभाओं के भीतर सीटें आरक्षित करने का कार्ड ऐसे समय चला है – जब देश के 4 राज्य और एक केंद्र शासित प्रदेश चुनावी प्रक्रिया से गुजर रहा है. महिलाएं एक बहुत मुखर और मजबूत वोट बैंक के रूप में सामने आईं हैं. खुद प्रधानमंत्री मोदी भी महिलाओं को बीजेपी का साइलेंट वोटर बता चुके हैं. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की भी बड़ी उम्मीद महिला वोटरों से है. ममता सरकार की महत्वाकांक्षी योजना लक्ष्मी भंडार के लाभार्थियों की संख्या सवा दो करोड़ से अधिक है. इस योजना के तहत 25 से 60 साल तक की महिलाओं को हर महीने डेढ़ हजार रुपये मिलते हैं. तमिलनाडु में मुख्यमंत्री स्टालिन भी महिलाओं को हर महीने दी जाने वाली कैश योजनाओं के सहारे सत्ता में वापसी का ख्वाब देख रहे हैं. पश्चिम बंगाल की विधानसभा में फिलहाल महिलाओं का प्रतिनिधित्व करीब 12 फीसदी है. वहीं, तमिलनाडु की विधानसभा में करीब 5 फीसदी. आज की तारीख में देशभर की विधानसभाओं में विधायकों की कुल संख्या 4000 से अधिक है. लेकिन, महिला विधायकों की संख्या 400 भी नहीं है. नया कानून संसद से विधानसभा तक महिलाओं का प्रतिनिधित्व एकाएक बढ़ा देगा. लेकिन, संसद और विधानसभा के भीतर किस पृष्ठभूमि की महिलाएं पहुंचेंगी और उससे देश की सामान्य महिलाओं को कितना फायदा होगा – इसे फिलहाल अलग-अलग लेंस से देखने और समझने की कोशिश हो रही है.
समाजवादी पार्टी की डिंपल यादव हों या एनसपी की सुप्रिया सुले, आरजेडी से मीसा भारती हों या अकाली दल की हरसिमत कौर बादल, बीजेपी की बांसुरी स्वराज या LJP(R) से शांभवी चौधरी इन सब सांसदों में एक चीज कॉमन है – वो ये कि इन सभी का ताल्लुक राजनीतिक परिवारों से है. आज की तारीख में सांसद या विधानसभा पहुंचने वाली ज्यादातर महिलाओं का कनेक्शन कहीं-न-कहीं राजनीतिक परिवारों से जुड़ता है. लेकिन, नारी शक्ति वंदन अधिनियम लागू होने के बाद तस्वीर बहुत हद तक बदलने की उम्मीद है. सामान्य परिवारों की महिलाओं की संसद और विधानसभा पहुंचने की राह आसान होगी.
आज की तारीख में कोई भी राजनीतिक दल संसद और विधानसभा के भीतर महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण देने का विरोध करने का जोखिम नहीं ले सकता. इस मुद्दे पर कांग्रेस बीजेपी से सीधे सवाल कर रही है. समाजवादी पार्टी और आरजेडी जैसे कुछ राजनीतिक दलों की मांग है कि प्रस्तावित संशोधन में पिछड़ी जाति की महिलाओं के लिए आरक्षण होना चाहिए. मतलब, महिला आरक्षण में कोटा के भीतर कोटा के मुद्दे पर विपक्ष पेंच फंसा सकता है.
माना जा रहा है कि लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को रोटेशन सिस्टम के आधार पर आरक्षण दिया जा सकता है. ऐसे में जो भी सीट महिलाओं के लिए रिजर्व होगी या रोटेशन सिस्टम में आएगी. वहां घरेलू दावेदारी दिख सकती है. ऐसे में संसद और विधानसभाओं में एक तिहाई आरक्षण से देश की सामान्य महिलाओं की तस्वीर कितनी बदलेगी. इसे अपने-अपने लेंस से देखने और समझने की कोशिश हो रही है.
पंचायत में जब महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण का रास्ता खोला गया, तब भी इस तरह की बातें हुईं. कई मामले ऐसे भी सामने आए कि महिला के प्रधान बनने के बाद फैसले परिवार के लोग ही लेते हैं. लेकिन, एक सच ये भी है कि पिछले तीन दशकों में तस्वीर बहुत हद तक बदली है. पंचायत में पढ़ी-लिखी महिलाएं अपने हिसाब से स्वतंत्र होकर फैसला ले रही हैं. लोकतंत्र की मजबूती के साथ भारत निर्माण में दमदार भूमिका निभा रही हैं. ऐसे में जब सामान्य पृष्ठभूमि की महिलाओं की संसद और विधानसभाओं में संख्या बढ़ने लगेगी. तो आधी आबादी की आवाज को ताकत और सपनों को परवाज मिलनी तय है.
इस सत्र में महिला आरक्षण कानून लागू होने की राह में खड़े स्पीड ब्रेकर्स हट भी गए तो भी अगले साल यूपी, उत्तराखंड और पंजाब विधानसभा चुनाव में इसका फायदा महिलाओं को नहीं मिल पाएगा. इसके लिए 2032 के विधानसभा चुनाव का इंतजार करना होगा. राजनीति में महिलाओं को आरक्षण का मुद्दा अंग्रेजों के जमाने में उठा, नतीजा ये रहा कि भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत महिलाओं को Legislative में आरक्षण का रास्ता खुला. तब के यूनाइटेड प्रोविंस और आज के उत्तर प्रदेश में 6 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित थीं. आजादी मिलने के बाद महिला आरक्षण का सिस्टम खत्म कर दिया गया. आजाद भारत के पहले आम चुनाव में सिर्फ 22 महिलाएं लोकसभा चुनाव जीतने में कामयाब रहीं. आधी आबादी का आजाद भारत की पहली लोकसभा में प्रतिनिधित्व करीब 5 फीसदी रहा. 2024 के लोकसभा चुनावों में कुल 8,360 उम्मीदवार मैदान में थे, जिसमें महिला उम्मीदवारों की संख्या 797 थीं.
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर ममता बनर्जी हैं. एक महिला मुख्यमंत्री, उन्हें सत्ता में बनाए रखने में M यानि महिला फैक्टर ने बड़ी भूमिका निभाई है. महिला वोटरों को साधने के लिए ममता सरकार कई योजनाएं चला रही हैं. ममता बनर्जी ने बंगाल चुनाव में TMC के निशान से 52 महिलाओं को मैदान में उतारा है. ममता बनर्जी ने 18% टिकट महिला उम्मीदवारों को दिया है. बीजेपी ने बंगाल में एक तिहाई सीटों पर महिलाओं को टिकट नहीं दिया है. राजनीतिक दल भले ही महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा चुनाव में एक तिहाई आरक्षण की बात जोर-शोर से करते हों. लेकिन, टिकट देने में हिचक दिखाते रहे हैं.
आजादी के बाद से ही अगर लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व देखें तो 1952 में 22, 1957 में 22, 1961 में 31, 1967 में 29, 1971 में 28, 1977 में 19, 1980 में 28, 1984 में 43, 1989 में 29, 1991 में 39, 1996 में 40, 1998 में 43, 1999 में 49, 2004 में 45, 2009 में 59, 2014 में 66, 2019 में 78 तो 2024 में 74 महिलाएं लोकसभा पहुंचने में कामयाब रहीं.
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां महिला वोटरों की संख्या सबसे ज्यादा है. भारतीय महिलाओं की स्थिति इस मामले में बेहतर मानी जाएगी कि आजादी के बाद पुरूषों के साथ-साथ महिलाओं को भी बराबरी के आधार पर एक साथ वोटिंग का अधिकार मिला. लेकिन, आधी आबादी को टिकट देने में राजनीतिक पार्टियों ने हिचक दिखाई है. इसकी गवाही एक रिसर्च रिपोर्ट में लोकसभा चुनाव के दौरान अखाड़े में उतरी महिलाओं की संख्या बता रही है.
साल 1957 में सिर्फ 45 महिलाओं ने लोकसभा चुनाव में उतरीं. साल 1977 में ये संख्या 70 पर पहुंची. 1996 के लोकसभा चुनाव के महिलाओं के लिहाज कई मायनों में अहम माना जा सकता है. इस चुनाव के दौरान महिला उम्मीदवारों की संख्या में गजब की बढ़ोत्तरी दिखी. 599 महिला उम्मीदवार लोकसभा के चुनावी समर में उतरीं. वहीं, साल 2009 में ये संख्या 566 ही रहीं. 2014 में 668 और 2019 में 716 महिला उम्मीदवारों ने संसद के निचले सदन के लिए वोट मांगा. तो 2024 के आम चुनाव में 797 महिला उम्मीदवारों ने किस्मत आजमाया.
राजनीतिक पार्टियां आधी आबादी को एक मजबूत वोट बैंक के तौर पर तो देखती हैं. लेकिन, चुनाव में टिकट देने के मामले में हिचकती रही हैं. संभवत: इसीलिए संसद से विधानसभाओं के भीतर महिलाओं की मौजूदगी कम दिखती है.
आजादी के बाद महिलाओं की राजनीति में हिस्सेदारी दिलाने की बातें बहुत हुईं. लेकिन, राजनीतिक दलों ने महिलाओं को टिकट देने में हिचक दिखाई. इतिहास गवाह है कि लोकसभा और विधानसभा पहुंचने वाली ज्यादातर महिलाएं राजनीतिक परिवारों वाली पृष्ठभूमि से रहीं. किसी बड़े राजनेता की पत्नी, बेटी, बहन, बहू या फिर मां. वो साल 1975 का था. तब देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर थीं – इंदिरा गांधी. उस दौर में एक रिपोर्ट आईं – Towards Equality. इसमें हर क्षेत्र में महिलाओं की जमीनी स्थिति का लेखा-जोखा था. इस रिपोर्ट में महिलाओं के लिए आरक्षण की बात भी कही गई थीं. हालांकि, रिपोर्ट तैयार करने वाले ज्यादातर सदस्य महिलाओं के लिए आरक्षण के खिलाफ थे. इंदिरा गांधी के निधन के बाद देश की कमान उनके पुत्र राजीव गांधी के हाथों में आईं. वो भारत को विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में आगे बढ़ाते हुए 21वीं सदी में ले जाने का सपना देख रहे थे. तो पंचायत और स्थानीय निकाय चुनाव में महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण दिलाने की कोशिश की थी. मतलब, राजीव गांधी ने राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने का सपना लोकतंत्र की पहली सीढ़ी से देखा. जो नरसिम्हा राव के दौर में 72वें संविधान संशोधन के तौर पर लागू हुआ. संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को आरक्षण दिलाने के लिए पहली बार विधेयक एचडी देवेगौड़ा की सरकार में पेश हुआ – वो साल था 1996 का, महीना सितंबर का. गठबंधन के पायों पर खड़ी देवगौड़ा सरकार के बिल का सरकार में शामिल कई पार्टियों ने विरोध किया. नतीजा ये रहा कि उस बिल को स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजा गया.
वो साल 1998 का था. तब प्रधानमंत्री की कुर्सी पर थे अटल बिहारी वाजपेयी. संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को आरक्षण के लिए विधेयक लाने की तैयारी हो चुकी थी. लेकिन, इस मुद्दे पर सबको साथ लाना बहुत मुश्किल था. महिला आरक्षण बिल पर सर्वसम्मति बनाने की बहुत कोशिश हुई. लेकिन, कामयाबी नहीं मिली. एसपी और आरजेडी जैसे कई दल महिला आरक्षण बिल का विरोध कर रहे थे. बिहार के जहानाबाद से लोकसभा सांसद सुरेंद्र प्रसाद यादव ने तो लालकृष्ण आडवाणी से छीनकर बिल की कॉपी फाड़ दी.
वाजपेयी सरकार ने 1999, 2002 और 2003-2004 में भी महिला आरक्षण विधेयक पास कराने की कोशिश की. लेकिन, कामयाबी नहीं मिली. साल 2004 में केंद्र में सत्ता का मिजाज बदला. यूपीए की सरकार बनी और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे डॉक्टर मनमोहन सिंह. मनमोहन सरकार ने साल 2008 में महिला आरक्षण बिल को 108वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में राज्यसभा में पेश किया. जमकर हंगामा हुआ, जिसके बाद विधेयक स्टैंटिंग कमेटी को भेजा गया.
एक जमाने में राजीव गांधी की पहल पर महिलाओं को पंचायत में आरक्षण मिल चुका था. इसे सोनिया गांधी और आगे बढ़ाना चाहती थीं. यूपीए सरकार भी गठबंधन के पायों पर खड़ी थी. ऐसे में सोनिया गांधी ने गठबंधन के साझीदारों को किसी तरह मनाकर राज्यसभा से महिला आरक्षण बिल पास करवाया, जिससे देश की महिलाओं को सत्ता में हिस्सेदारी मिल सके.
लेकिन, विधेयक लोकसभा में अटक गया. बिल का विरोध करने वालों में UPA सरकार में गठबंधन साझीदार RJD और SP शामिल थे. इन दलों की दलील थी कि वो महिला आरक्षण के विरोधी नहीं हैं – लेकिन, तत्कालीन बिल के मसौदे के पक्ष में नहीं थे. साल 2014 में फिर केंद्र में सत्ता का मिजाज बदला. पीएम की कुर्सी पर नरेंद्र मोदी आ गए. बीजेपी के 2014 और 2019 के चुनावी घोषणा पत्र में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का वादा था. कांग्रेस की ओर से इस मुद्दे पर समर्थन देने का भरोसा दिया गया.
साल 2023 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पेश किया. जो संसद के दोनों सदनों में पास हुआ और राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद कानून बना. लेकिन, ये कानून अभी तक जमीन पर लागू नहीं हो पाया है. अब मोदी सरकार महिला आरक्षण कानून को 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले लागू कराने का मन बना चुकी है. इसके लिए सांसद 16, 17 और 19 अप्रैल को संसद भवन की नई बिल्डिंग में नई सोच के साथ जुटेंगे. जिससे महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में आरक्षण का फायदा मिलने की राह में पड़े स्पीडब्रेकर्स हटाए जा सकें.
नेता हमेशा वही सफल होता है, जो वक्त से आगे की सोच रखता हो और बड़ी चतुराई से लोगों के दिलों में जगह बनाने में माहिर होता है. संसद और विधानसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण भी एक ऐसा ही मुद्दा है. इस मुद्दे पर बहुत राजनीति हो चुकी है. बीजेपी चाहेगी कि महिला आरक्षण बिल किसी भी तरह पास हो जाए. वहीं, विपक्ष चाहेगा कि इस कानून को लागू करने का क्रेडिट बैठे-बिठाए बीजेपी को क्यों दिया जाए? ऐसे में इस बार के बहुत हद तक चांस हैं कि महिला आरक्षण कानून में कोटा के भीतर कोटा जैसे सुर तेज किए जाए. विपक्ष बिल की टाइमिंग पर सवाल उठाए? कोई भी सियासी पार्टी या नेता. अपने ऊपर महिला आरक्षण विरोधी का टैग नहीं लगने देना चाहेगा? ऐसे में इस मुद्दे पर विपक्ष भी बहुत फूंक-फूंक कर कदम रखेगा? भारतीय लोकतंत्र और चुनावी राजनीति उस दौर से बहुत आगे निकल चुकी है. जिसमें कभी महिलाओं की पहचान किसी की पत्नी, किसी की बेटी, किसी की बहू, किसी की मां के रूप में होती थी. महिलाओं का वोट उसी को जाता है, जहां परिवार के पुरुष चाहते थे. लेकिन, आज की तारीख में महिलाएं दबाव और प्रभाव से मुक्त होकर अपनी वोट की ताकत का इस्तेमाल कर रही हैं. खुद को संसद और विधानसभा के भीतर देखना चाहती हैं. अपनी आवाज बुलंद करना चाहती हैं. घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियां संभालते हुए संसद और विधानसभा में नए विधान बनाने से देश और राज्य चलाने तक की जिम्मेदारी पूरी शिद्दत से निभाना चाहती हैं. अब देखना है कि सियासतदां कितनी ईमानदारी के साथ संसद और विधानसभा के भीतर आधी आबादी को उनका हक देने के लिए ईमानदारी से कोशिश करते हैं?