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दुनिया कई तरह की गंभीर समस्याओं से जूझ रही है . युद्ध की आग में जल रहे मिडिल ईस्ट देशों के साइड-इफेक्ट्स को लेकर दुनिया सहमी हुई है, डरी हुई है . अपने नफा-नुकसान का हिसाब लगा रही है. दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में चल रही जंग, तनाव और उथल-पुथल के बीच भारत के सामने भी कई चुनौतियां हैं, उसमें कुछ तो खुली आंखों से दिखाई दे रही हैं और कुछ शायद नहीं. एक अरब पैंतालीस करोड़ आबादी वाले विशालकाय भारत में उत्तर से दक्षिण तक आते-आते समस्याओं का स्वरूप बदल जाता है. ऐसी ही एक समस्या है–कम पैदा हो रहे बच्चों की. एक जमाना था- जब टीवी पर विज्ञापन चला करता था– हम दो हमारे दो. सरकार लोगों से कहती थी कि दो से ज्यादा बच्चे मत पैदा कीजिए . लेकिन, घटती आबादी ने चिंता बढ़ा दी है. अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त होने और राजनीतिक समीकरण बदलने का खतरा पैदा कर दिया है . ऐसे में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने दूसरा बच्चा पैदा होने पर 25 हजार रुपये देने का ऐलान किया है .

तमिलनाडु के सीएम एम के स्टालिन पहले ही सूबे के लोगों से जल्दी-जल्दी बच्चा पैदा करने की अपील कर चुके हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत भी देशहित के लिए तीन बच्चा जरूरी बता रहे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर अधिक बच्चा पैदा करने की बातें क्यों हो रही है ? दक्षिण भारत के राज्य आबादी बढ़ाने की बातें जोर-शोर से क्यों कर रहे हैं? जनसंख्या बढ़ोतरी के मुद्दे पर दक्षिण भारत के राज्यों की चुनौतियां चीन जैसी हैं या उससे अलग ? आबादी में बढ़ोत्तरी के मोर्चे पर उत्तर और दक्षिण भारत दोनों अलग ध्रुवों पर खड़े क्यों दिख रहे हैं? क्या भविष्य में जनसंख्या के मामले में भारत की स्थिति भी चीन, जापान और यूरोपीय देशों जैसी हो सकती है … जो युवा आबादी के लिए तरस रहे हैं? कुछ अपनी बुजुर्ग आबादी के बोझ से बेहाल तो कुछ युवा बेरोजगारों से परेशान…आखिर इस Demographic Imbalance का इलाज क्या है?

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तेजी से बदलती दुनिया में शादी-ब्याह, परिवार और बच्चों की संख्या को लेकर सोच में बड़ा बदलाव आया है. पढ़े-लिखे ज्यादातर शहरी मिडिल और अपर मिडिल क्लास परिवारों में दो की बात छोड़िए एक बच्चा बहुत माना जा रहा है . कुछ ऐसी ही सोच का नतीजा है कि आंध्र प्रदेश की आबादी तेजी से घट रही है. सूबे की Total Fertility Rate यानी TFR 1.5 पर आ गई है…किसी भी क्षेत्र या राज्य में आबादी को ज्यों का त्यों बनाए रखने के लिए TFR 2.1 माना जाता है. अगर इसे दूसरी तरह से कहें तो आंध्र प्रदेश में जितने पैदा हो रहे हैं – उसकी तुलना में अधिक मर रहे हैं . सूबे के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू इस तस्वीर बदलना चाहते हैं . इसके लिए उनकी सरकार खास नीति लेकर आई है. दूसरा-तीसरा बच्चा पैदा करने पर 25 हजार रुपये कैश देने का ऐलान किया गया है. लेकिन, बड़ा सवाल ये है कि क्या 25 हजार रुपये के लिए लोग दूसरा या तीसरा बच्चा पैदा करेंगे? संघ प्रमुख भी कई मौकों पर दो से अधिक बच्चों की वकालत कर चुके हैं .

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू सूबे की लगातार कम होती आबादी से परेशान हैं . वो हिसाब लगा चुके हैं कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो अंजाम क्या होगा? आंध्र प्रदेश में गिरती जन्मदर रोकने के लिए मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने बड़ा फैसला लिया…दूसरा बच्चा पैदा करने पर आंध्र प्रदेश में माता-पिता को 25,000 रुपये देने का ऐलान किया गया है . नई पॉपुलेशन केयर नीति का मकसद सूबे में युवाओं की आबादी बढ़ाना है .

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चंद्रबाबू नायडू की सरकार हम दो हमारे दो की नीति के किनारे रखते हुए नई जनसंख्या नीति आगे बढ़ाने में लगी है . आंध्र में करीब 58% परिवारों में सिर्फ एक बच्चा है… सूबे में प्रजनन दर यानी TFR गिरकर 1.5 पर आ गई है…जिसे बढ़ा कर 2.1 पर ले जाने का टारगेट सेट किया गया है. आंध्र प्रदेश में तरक्की की रफ्तार बनाए रखने के लिए युवा आबादी की कमी बड़ी शिद्दत से महसूस की जा रही है . आंध्र प्रदेश में आबादी बढ़ाने के प्लान यानी पॉपुलेशन केयर को कई स्तंभों पर खड़ा करने की कोशिश हो रही है . मसलन कामकाजी महिलाओं के लिए ऑफिस में बेहतर सुविधाएं, महिला और पुरूष दोनों के लिए एक महीना की पेरेंटल लीव. सरकारी और प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिए IVF की सुविधा, रिटायर हो चुके प्रोफेशनल्स यानी बुजुर्गों को मेंटर के तौर पर जोड़ने की तैयारी, युवाओं को स्किल ट्रेनिंग, जिससे भविष्य में राज्य में आने वाले निवेश के लिए वर्कफोर्स तैयार किया जा सके .

एक जमाने में चंद्रबाबू नायडू ने कानून के जरिए दो से अधिक बच्चे वाले व्यक्तियों को लोकल बॉडी चुनाव लड़ने से रोका था .आबादी को लेकर पुरानी नीति से यूटर्न लेते हुए…ऐसा रास्ता निकालने में लगे हैं – जिससे सूबे के लोग अधिक से अधिक बच्चे पैदा करें . चंद्रबाबू नायडू जैसी ही चिंता दक्षिण भारत के दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों की भी है . क्योंकि, आबादी तेजी से घट रही है. तमिलनाडु में प्रजनन दर 1.30 पर आ गई है . महाराष्ट्र में 1.40, कर्नाटक में 1.50, केरल में 1.50 और तेलंगाना में 1.50. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन भी युवाओं से अधिक बच्चा पैदा करने की अपील कर चुके हैं .

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एम. के. स्टालिन तो यहां तक कह चुके हैं कि पहले बुजुर्ग नवविवाहित दंपति को 16 तरह की संपत्ति प्राप्त करने का आशीर्वाद देते थे…लेकिन, अब समय आ गया कि 16 तरह की संपत्ति की जगह 16 बच्चे पैदा किए जाएं . सिर्फ दक्षिण ही नहीं पूरे देश में आबादी बढ़ने की रफ्तार घट रही है… जिसे अलग-अलग लेंस से देखने की कोशिश हो रही है . संघ प्रमख मोहन भागवत भी राष्ट्र हित में दो से अधिक बच्चे पैदा करने की वकालत कर रहे हैं . मोहन भागवत ने कहा था, ‘देश हित के लिए तीन बच्चे जरूरी हैं. ऐसा कई शोधों में भी साबित हो चुका है. उन्होंने कहा कि हमारे लोगों के बच्चों की संख्या कम हो रही है और वो बढ़ रहे हैं. जो चिंता का विषय हे. उन्होंने कहा कि तीन बच्चे सर्वोत्तम, दो बच्चे खराब और एक बच्चा पैदा करना बेहद खराब है.’

अब सवाल उठता है कि क्या बच्चा पैदा करने जैसे विषय पर पति-पत्नी नेताओं की बात मानेंगे ? क्या दो या दो से अधिक बच्चा पैदा करने के मुद्दे को देश सामान्य मिडिल क्लास परिवार भी उसी तरह देख रहे हैं -जिस तरह राजनेता देखने की कोशिश कर रहे हैं. तमिलनाडु विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़ा है . एन. चंद्रबाबू नायडू जैसी ही चिंता तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन भी जता चुके हैं . सूबे के लोगों से अधिक बच्चा पैदा करने की अपील कर चुके हैं . लेकिन, दक्षिण भारत के राज्यों के मुख्यमंत्री ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं . दरअसल, आजादी के बाद बड़ी आबादी को बोझ की तरह देखा गया और परिवार नियोजन पर जोर दिया गया.

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इमरजेंसी के दौर को अपवाद की तरह लिया जाए तो परिवार नियोजन को लेकर हमारे देश में कभी जोर-जबरदस्ती नहीं हुई . बाद में नारा दिया गया – छोटा परिवार, सुखी परिवार…हम दो, हमारे दो . मिडिल क्लास और अपर मिडिल क्लास ने छोटे परिवार में अपनी खुशहाली देखी . दक्षिण भारत के राज्यों ने परिवार नियंत्रण के मुद्दे पर पूरी शिद्दत के साथ काम किया – जिसका नतीजा रहा है कि दक्षिण भारत के राज्यों में जन्म दर राष्ट्रीय औसत से नीचे आ गई. इससे दक्षिण में एक नए तरह के संकट की आहट महसूस की जा रही है. अगले साल परिसीमन यानी Delimitation होना है..जिसमें बड़ा आधार आबादी रहती है . Delimitation के बाद संसद में दक्षिण भारत का पलड़ा हल्का और उत्तर भारत का पलड़ा बहुत भारी होने की भविष्यवाणी की जा रही है . अब ये समझना जरूरी है कि दक्षिण भारत के राज्यों को जन्म दर में गिरावट की वजह से कहां-कहां नुकसान महसूस हो रहा है.

संसद की नई बिल्डिंग में लोकसभा में 888 और राज्यसभा में 384 सीटें हैं . अगले साल परिसीमन भी तय माना जा रहा है.. जिसमें लोकसभा में सीटें बढ़नी तय हैं. फिलहाल, लोकसभा में जितनी सीटें हैं- वो 1976 के परिसीमन के दौरान तय हुई थी- जिसका आधार 1971 की जनगणना थी, तब से अब तक देश की आबादी ढाई गुना से ज्यादा बढ़ चुकी है लेकिन, लोकसभा में सीटें नहीं बढ़ीं . एक अनुमान के मुताबिक अगर परिसीमन आयोग लोकसभा में 78 सीटें बढ़ाता है तो आबादी के आधार पर यूपी की 80 सीटों में 14 सीटें जुड़ सकती है, बिहार की 40 सीटें बढ़कर 51 हो सकती है. राजस्थान में 7 सीटें और मध्य प्रदेश में 5 सीटें बढ़ने का अनुमान है . हरियाणा और महाराष्ट्र में दो-दो सीट जुड़ने की भविष्यवाणी की जा रही है . तो झारखंड और छत्तीसगढ़ में एक-एक सीट बढ़ का हिसाब लगाया जा रहा है . वहीं, तमिलनाडु को 9, केरल को 6, गुजरात को 6 सीटों के नुकसान की आशंका जताई जा रही . आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा का पलड़ा हल्का होने की भविष्यवाणी की जा रही है . इसी तरह अगर परिसीमन के बाद लोकसभा में सीटें बढकर 884 हो जाती हैं .

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तमिलनाडु की 39 सीटें बढ़कर 49 हो जाएंगी . लेकिन, यूपी की 80 सीटें बढ़कर 143 हो जाएंगी . आंध्र और तेलंगाना को मिलाकर अभी 42 सीटें हैं…जो बढ़कर 54 तक पहुंच जाएंगी . लेकिन, बिहार की 40 सीटें बढकर 79 तक पहुंच जाएंगी . मतलब, दक्षिण भारत के जिन राज्यों ने आबादी कंट्रोल करने के मोर्चे पर बेहतर काम किया…जहां आज की तारीख में जन्म दर जनसंख्या के रिप्लेसमेंट लेबल से नीचे हैं…उन राज्यों को लोकसभा में अपनी सीटें कम होती दिख रही हैं . दक्षिण भारत के राज्यों को केंद्रीय फंड में हिस्सेदारी भी कम होने का डर सता रहा है. वित्त आयोग की सिफारिशों आधार पर राज्यों को जो हिस्सेदारी मिलती है-उसमें आबादी एक बड़ा पैमाना है . इस मोर्चे पर भी दक्षिण भारत के राज्य उत्तर भारत के राज्यों से खुद को पीछे पाते हैं .

भले ही दक्षिण भारतीय राज्यों के नेता दलील दे रहे हों कि जनसंख्या कंट्रोल की वजह से उनके प्रदेशों में युवा कम और बुजुर्ग बढ़ रहे हैं..वहीं, भविष्य में कामकाजी आबादी घटने की भविष्यवाणी की जा रही है. अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग अधिक बच्चा पैदा करने की चंद्रबाबू नायडू और एम.के. स्टालिन की दलील को व्यहारिक कम और राजनीतिक ज्यादा बता रहा है . भले ही छोटा परिवार और कम आबादी को अर्थशास्त्री खुशहाली की गारंटी मानते हों… लेकिन, लोकतांत्रिक राजनीति में सत्ता संतुलन बनाए रखने में कम आबादी को एक कमजोरी की तरह देखा जाता है… 543 सीटों वाली लोकसभा में दक्षिण भारत से सिर्फ 131 सांसद आते हैं . वहीं, यूपी, बिहार और झारखंड तीन राज्यों की लोकसभा सीटों को जोड़ दें – तो 134 हो जाता है . अनुमान लगाया जा रहा है कि Delimitation के बाद हिंदी पट्टी के राज्यों की सीटों में भारी इजाफा होगा..तो दक्षिण भारत का संसद में राजनीतिक वर्चस्व कम . हमारे देश में आखिरी जनगणना 2011 में हुई थी . जनसंख्या बढ़ोत्तरी का जो ट्रेंड है– उसके हिसाब से 25 वर्षो यानी 2011 से 2036 के बीच देश की आबादी में 31 करोड़ से अधिक लोग जुड़ने का अनुमान है, जिसमें से 17 करोड़ सिर्फ 5 राज्य यूपी, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश से होंगे. वहीं, दक्षिण के पांच राज्य आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तेलंगाना और तमिलनाडु मिल कर आबादी में 3 करोड़ भी नहीं जोड़ पाएंगे …ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि कहीं आबादी कंट्रोल करने वाले दक्षिण भारत के राज्यों की स्थिति चाइना या जापान जैसी न हो जाए…जहां युवा कम और बुर्जुग बढ़ते जा रहे हैं .

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दक्षिण भारत के राज्यों ने सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ आबादी कंट्रोल करने के रास्ते को तेजी से अपनाया…जिसका नतीजा ये रहा कि प्रजनन दर घटने लगी. चाहे तमिनाडु हो या तेलंगाना, कर्नाटक हो या केरल…आंध्र प्रदेश हो या महाराष्ट्र . दक्षिण भारत के राज्यों में एक जैसी तस्वीर दिखने लगी . हिंदी पट्टी के बिहार और यूपी जैसे राज्य आबादी कंट्रोल करने में मामले बहुत पीछे हैं… आज भी बिहार में प्रजनन दर 3 है तो आबादी के मामले में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में भी प्रजनन दर राष्ट्रीय औसत से ऊपर है . लेकिन, 1980 के दशक में आबादी कंट्रोल करने के लक्ष्य के हासिल करने वाले केरल के केस को भी समझना जरूरी है .

2011 में केरल की आबादी में 60 साल से ऊपर के लोगों की हिस्सेदारी 13 फीसदी थी, जो 2036 में बढकर 23 फीसदी हो जाएगी. यानी केरल में हर चौथा शख्स 60 प्लस उम्र का होगा .इसी तरह आंध्र में 2011 में 60 साल से अधिक उम्र के लोगों की संख्या 10.1 प्रतिशत था…जो 2036 में बढकर 19 फीसदी तक पहुंच जाएगा यानी आंध्र में हर पांचवां व्यक्ति बुजुर्गों की कैटगरी में होगा . जिन राज्यों ने आबादी को तेजी से कंट्रोल किया, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की वजह से Life expectency बढ़ी..वहां दिनों-दिन बुजुर्ग बढ़ रहे हैं और युवा कम होते जा रहे हैं . मौजूदा ट्रेंड जारी रहा तो उत्तर भारत के राज्यों में दक्षिण की तुलना में युवा आबादी अधिक दिखेगी. यूपी को देखा जाए तो 2011 में 60 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों की संख्या 7.3 % रही..जो 2036 में बढ़कर 11.9 % तक पहुंचने का अनुमान है.

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आबादी बढ़ने का मौजूदा ट्रेंड इशारा कर रहा है कि आने वाले दिनों में भारत में युवा आबादी कम होती और बुर्जुगों की बढ़ेगी.जिसके नफा-नुकसान को हर एंगल से देखने और समझने की कोशिश हो रही है . दुनिया में सबसे अधिक युवा भारत में हैं . एक अरब पैंतालीस करोड़ की आबादी में करीब 50 करोड़ युवा हैं. लेकिन, दुनिया के विकसित देशों की तरह भारतीय युवा शक्ति Skilled नहीं हैं…कम Skilled होने की वजह से युवा आबादी का पूरा फायदा यानी Democratic Dividend भारत को नहीं मिल पा रहा है . आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में तो युवा आबादी को नए सिरे से Skilled करना और जरूरी हो गया है . पिछले कुछ दशकों में भारत ने जो रास्ता चुना है- उसमें लोगों का जीवन स्तर सुधरा और Life expectancy बढ़ी है. ऐसे में धीरे-धीरे युवाओं की संख्या कम और बुजुर्गों की बढ़ने का ट्रेंड दिखने लगा है. संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक, आज की तारीख में 60 साल से ऊपर के बुर्जुगों की संख्या करीब 15 करोड़ 30 लाख है…जो 2050 तक बढ़कर 34 करोड़ 70 लाख तक पहुंचने का अनुमान है. इस हिसाब से देखा जाए तो भारत जब आजादी की 100वीं सालगिरह की ओर बढ़ रहा होगा…तब देश में हर पांचवां व्यक्ति बुजुर्ग होगा . उसमें बढ़ी तादाद ऐसे बुर्जुगों की हो सकती है – जिनके पास सोशल सिक्युरिटी के नाम पर कुछ खास नहीं होगा…जिनके सामने अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए 70 -75 साल की उम्र में भी काम करने की मजबूरी होगी .

एक अरब 45 करोड़ आबादी वाले विशालकाय भारत में हर दूसरा व्यक्ति किसानी से जुड़ा है…दूसरे छोटे-मोटे काम-धंधों के जरिए जिंदगी की गाड़ी खींचने वालों की भी लाइन बहुत लंबी है . देश के 80 करोड़ से अधिक लोगों को भूख मिटाने के लिए हर महीने सरकार की ओर मुफ्त अनाज मिलता है…एक स्टडी के मुताबिक 90 से 94 करोड़ लोग किसी न किसी सरकारी सामाजिक सुरक्षा योजना के दायरे में हैं . ऐसे में देश के भीतर एक बड़ा वर्ग तैयार हो रहा है-जिनके पास बुढ़ापे में सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के नाम पर कुछ खास होने की उम्मीद नहीं है . ऐसे में सवाल उठता है कि अगले 15 या 25 वर्षों में देश के बुजुर्गों के पास सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा के नाम पर क्या होगा?

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हमारे देश में सरकारी नौकरियों और पेंशन का सिस्टम दिनों-दिन सिकुड़ता जा रहा है..ऐसे में पेंशनवाले की गिनती दिनों-दिन कम होती जा रही है . दुनिया के ज्यादातर देशों ने पेंशन के बोझ को कम करने के लिए रिटायरमेंट की उम्र बढ़ा दी है . यूरोप के ज्यादातर देशों में रिटायरमेंट की उम्र अधिक है. ऐसे में लोगों को अपनी जरूरत के खर्चों के लिए 70 से 75 साल की उम्र तक कमाना पड़ता है . जापान हो या चीन सभी इसी राह पर हैं . यूरोपीय संघ के 27 देशों में पेंशन पानेवाले एक शख्स का बोझ औसतन चार कामकाजी लोग उठा रहे हैं…भविष्यवाणी की जा रही है कि अगर यही हालात रहे तो 2050 तक यह बोझ सिर्फ दो लोगों पर आ जाएगा…ऐसे में भले ही अभी भारत में बुर्जुगों के लिए यूरोपीय देशों जैसी पेंशन या सामाजिक सुरक्षा स्कीम नहीं हैं..लेकिन, अब इस दिशा में काम शुरू हो चुका है . आबादी के अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और राजनीति शास्त्र में अभी बहुत कुछ सीखना, समझना और करना बाकी है. चीन-जापान और यूरोपीय देशों से ये भी सीखने की जरूरत है कि आबादी के मोर्चे पर उन देशों ने कहां बेहतर किया और कहां गलतियां की ?

दुनिया के नक्शे पर कई ऐसे देश हैं- जो युवा आबादी के लिए तरस रहे हैं . दुनिया के दूसरे हिस्सों के युवाओं को अपने यहां बुला रहे हैं . तरह-तरह के Incentive ऑफर करते हैं. चाइना ने भी कभी बहुत सख्ती से वन चाइल्ड पॉलिसी लागू लागू किया था…नतीजा सामने है . जापान बुर्जुगों का देश बन चुका है. यूरोप के कई देश युवा आबादी के लिए तरस रहे हैं? हमारा पड़ोसी देश नेपाल भी युवाओं से अधिक बच्चे पैदा करने के लिए कर रहा है. ऐसे में दुनिया भर के अलग-अलग देशों में कम आबादी के साइड इफेक्ट्स को भी समझना जरूरी है . तेजी से घटती जन्म दर और कम होती आबादी विकसित देशों के सामने बड़ी चुनौती है … जापान की आबादी में हर तीसरा शख्स 65 साल से ऊपर का है . यूरोप के कई देशों में 65 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों की भरमार है . इटली की आबादी में ऐसे बुजुर्गों की हिस्सेदारी 22.8% है. ग्रीस और पुर्तगाल की जनसंख्या में बुजुर्गों की तादाद 21.8% है . जर्मनी में 21.4%..तो फ्रांस में 20.3%..ब्रिटेन में भी 18% से अधिक महिला या पुरुष 65 साल से अधिक उम्र के हैं .

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यूरोप के कुछ शहरों में बुजुर्गों की देखभाल के लिए युवा नहीं मिल रहे हैं … फैक्ट्रियों में भले ही इंसान की जगह ह्यूमनॉइड रोबोट ले रहे हों..लेकिन,शायद ही मशीने पूरी तरह इंसान का विकल्प बन पाएं … ऐसे में युवा आबादी के लिए तरसते कुछ मुल्क दुनिया के दूसरे देशों के युवाओं अपने यहां बुलाने के लिए बेहतर जिंदगी का ऑफर दे रहे हैं… ग्लोब पर कई ऐसे हिस्से हैं-जहां बसने के लिए लोगों को वहां की सरकारे जमीन, घर, पैसा और दूसरी सहूलियतें दे रही हैं. दुनिया के कुछ हिस्सों में बेरोजगारों की भीड़ और कहीं बुजुर्गों की भरमार वाली स्थिति से निपटने का एक रास्ता माइग्रेशन भी हो सकता है . दुनिया के जिन हिस्सों में युवा शक्ति अधिक है, उनके लिए सरहद की दीवारों को छोटा करना होगा . इसी में विकसित और विकासशील दोनों तरह के देशों की बेहतरी है.

कम होती प्रजनन दर…घटते युवा और बढ़ते बुजुर्गों की बहस के बीच Fertility Rate बढ़ाने से ज्यादा जरूरी है राज्य में…देश में..दुनिया में Balance Migration यानी संतुलित प्रवास के जरिए आबादी में असंतुलन से जुड़ी कमियों को पूरा करना . ये सौ फीसदी सच है कि पिछले कुछ वर्षों में विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में गजब की तरक्की हुई है. इंसान के काम को मशीन ने बहुत आसान कर दिया है..लेकिन, मशीन को चलाने के लिए भी इंसानी दिमाग और कमांड की जरूरत पड़ती है. जेनरेटिव AI बहुत हद तक इंसानी दिमाग जैसा काम करने लगा है . लेकिन, इसके बावजूद विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अच्छा दखल रखने वाले जापान को युवा कामगारों की जरूरत महसूस हो रही है … क्योंकि, उसकी आबादी का बड़ा हिस्सा बूढ़ा हो चुका है . चीन की सेना से लेकर उद्योग तक एक ओर युवा Workforce की कमी से जूझ रहे हैं तो दूसरी ओर युवा बेरोजगारों की भी लंबी कतार है.

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यूरोपीय देशों में बच्चा पैदा करने को लेकर अलग सोच है. वहां, कमाई की तुलना में खर्च अधिक है…ज्यादातर युवा कमाई से सिर्फ अपना ही खर्च मुश्किल से चला पाते हैं . ऐसे में बच्चों पर होने वाले खर्च का खौफ उन्हें परिवार बढ़ाने से रोकता है . दरअसल, परिवार बढ़ाने जैसा मसला पति-पत्नी अपने तरीके से देखते हैं…रिश्तेदार दूसरे तरीके से..अर्थशास्त्री अलग चश्मे से और राजनेता अलग नजरिए से . उत्तर भारत में अगर आबादी बढ़ने की रफ्तार अधिक है और दक्षिण भारत के राज्यों में कम..तो आबादी बढ़ाने की जगह Internal Migration को बढ़ावा देकर Demographic Imbalance ठीक किया जा सकता है . संभवत:, ये बहस बेमानी है कि किसी परिवार, किसी प्रदेश, किसी मुल्क के बेहतर भविष्य के लिए एक बच्चा बेहतर रहेगा या दो बच्चा या उससे अधिक? बच्चा कितना काबिल बनेगा – उसकी भागीदारी पर ही परिवार और देश का भविष्य निर्भर करेगा? लेकिन, किसे कितना बच्चा पैदा करना चाहिए – इस मुद्दे को सियासी नफा-नुकसान से चश्मे से देखना ठीक नहीं है. आज की तारीख में शायद ही ऐसे पति-पत्नी मिलेंगे…जो सरकार की ओर से मिलने वाले कुछ हजार रुपयों के लिए परिवार बढ़ाने जैसा फैसला लें.

First published on: Mar 07, 2026 09:13 PM

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Anurradha Prasad

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Akarsh Shukla

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