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2023 से पहले की गाड़ियां खराब कर रहा इथेनॉल वाला पेट्रोल! सरकार की नीति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई याचिका

केंद्र सरकार की पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक इथेनॉल की मिलावट करने की नीति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है। इस याचिका में सरकार की इस नीति को वाहन मालिकों को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया गया है। इसके साथ ही कहा गया है कि यह पेट्रोल साल 2023 के अप्रैल से पहले बने वाहनों के लिए पूरी तरह से अनुकूल नही है। इससे गाड़ियों के पुर्जे खराब हो रहे हैं। वहीं, बीमा कंपनियां भी इसको कवर नहीं कर रही हैं।

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Written By: News24 हिंदी Updated: Aug 22, 2025 22:04
Petrol Diesel price today
Credit- pexels

केंद्र सरकार के पेट्रोल में 20% इथेनॉल (E20) मिलाने की नीति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए एक जनहित याचिका दायर की गई है। PIL में इस नीति को वाहन मालिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता ने मांग की है कि वाहन मालिकों को इथेनॉल-मुक्त पेट्रोल (E0) का विकल्प उपलब्ध कराया जाए और E20 पेट्रोल पर स्पष्ट लेबल लगाया जाए, जिससे ये पता चल सके कि वो क्या खरीद रहे है। यह मामला न केवल उपभोक्ताओं के अधिकारों से जुड़ा है, बल्कि पर्यावरण, ऑटोमोबाइल उद्योग और नीति कार्यान्वयन पर भी सवाल उठाता है।

उपभोक्ताओं के अधिकारों पर पड़ रहा है असर

याचिकाकर्ता एडवोकेट अक्षय मल्होत्रा ने तर्क दिया है कि बिना इथेनॉल-मुक्त पेट्रोल का विकल्प दिए केवल E20 पेट्रोल बेचना लाखों वाहन मालिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करता है। देश में कई वाहन जो अप्रैल 2023 से पहले के बने हुए हैं, E20 पेट्रोल के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं हैं। याचिका में कहा गया है कि उपभोक्ताओं को यह जानने का अधिकार है कि वे अपने वाहनों में किस तरह का ईंधन डाल रहे हैं। बिना जानकारी के E20 पेट्रोल बेचना उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत सूचित विकल्प के अधिकार का उल्लंघन करता है। यह नीति उन वाहन मालिकों के लिए परेशानी का कारण बन रही है, जिनके वाहन पुराने हैं या जिन्हें E20 के लिए अपग्रेड नहीं किया गया है।

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खराब हो रहे हैं वाहनों के पुर्जे

E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से वाहनों की ईंधन दक्षता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की बात याचिका में कही गई है। याचिका में कहा गया है कि इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल के कारण वाहनों का माइलेज कम हो रहा है, जिससे उपभोक्ताओं को अधिक ईंधन खरीदना पड़ रहा है। इसके अलावा इथेनॉल के रासायनिक गुणों के कारण वाहनों के पुर्जों, जैसे ईंधन लाइनों, रबर और प्लास्टिक के हिस्सों के खराब होने और अन्य पुर्जों में जंग लगने की समस्या सामने आ रही है। इससे वाहनों की मरम्मत का खर्च बढ़ रहा है और उनकी उम्र कम हो रही है। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि बीमा कंपनियां E20 के उपयोग से होने वाले नुकसान के दावों को खारिज कर रही हैं, जिससे वाहन मालिकों को दोहरा नुकसान हो रहा है।

ऑटोमोबाइल निर्माताओं को नहीं मिला पर्याप्त समय

याचिका में सरकार के इस फैसले को ‘मनमाना और अनुचित’ बताते हुए कहा गया है कि ऑटोमोबाइल निर्माताओं को E20 के अनुरूप वाहन डिजाइन करने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया। अप्रैल 2023 से पहले बने कई वाहन, भले ही वे BS-VI मानकों के अनुरूप हों, 20% इथेनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं। यह नीति निर्माताओं और उपभोक्ताओं दोनों के लिए चुनौतियां पैदा कर रही है। याचिकाकर्ता का कहना है कि सरकार को पहले एक व्यवस्थित रोडमैप तैयार करना चाहिए था, जिसमें निर्माताओं को तकनीकी बदलाव करने का अवसर मिलता, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। ऐसे में ऑटोमोबाइल निर्माताओं को पर्याप्त समय नहीं मिल पाया।

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इथेनॉल मुक्त पेट्रोल की बिक्री हो शुरू

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से कई राहतों की मांग की है ताकि उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा हो सके। पहली मांग है कि पेट्रोल पंपों पर इथेनॉल-मुक्त पेट्रोल (E0) की बिक्री फिर से शुरू की जाए, ताकि वाहन मालिकों को अपनी गाड़ियों के लिए उपयुक्त ईंधन चुनने का विकल्प मिले। दूसरी मांग यह है कि E20 पेट्रोल पर स्पष्ट लेबलिंग अनिवार्य की जाए, जिससे उपभोक्ताओं को पता चले कि वे क्या खरीद रहे हैं। इसके अलावा, याचिका में E20 पेट्रोल के दीर्घकालिक प्रभावों, विशेष रूप से गैर-अनुकूल वाहनों पर इसके असर और ईंधन दक्षता पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन कराने की मांग की गई है।

विदेशों में भी होती है लेबलिंग

याचिका में विदेशों का हवाला देते हुए बताया गया है कि अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे देशों में इथेनॉल-मुक्त पेट्रोल उपलब्ध है। वहां पेट्रोल पंपों पर मिश्रित ईंधन की स्पष्ट लेबलिंग की जाती है, जिससे उपभोक्ता सोच-समझकर निर्णय ले सकते हैं। भारत में, इसके विपरीत, उपभोक्ताओं को अक्सर इस बात की जानकारी नहीं होती कि उनके वाहनों में इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल डाला जा रहा है। याचिकाकर्ता ने इसे उपभोक्ता जागरूकता की कमी और सूचना के अधिकार का उल्लंघन बताया है।

क्यों लिया सरकार ने यह फैसला?

केंद्र सरकार का कहना है कि E20 पेट्रोल नीति पर्यावरण के लिए लाभकारी है। इथेनॉल मिश्रण से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होती है, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत होती है। साथ ही, यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है, क्योंकि इथेनॉल उत्पादन से किसानों को अतिरिक्त आय मिल रही है। सरकार के अनुसार, ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) और अन्य संस्थानों के परीक्षणों में E20 को पुराने वाहनों के लिए सुरक्षित पाया गया है। हालांकि, याचिकाकर्ता का तर्क है कि पर्यावरणीय लाभों के साथ-साथ उपभोक्ताओं की सुविधा और वाहनों की तकनीकी अनुकूलता पर भी ध्यान देना जरूरी है।

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First published on: Aug 22, 2025 09:58 PM

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