कहां है वर्जिन आइलैंड? 100 साल पहले डेनमार्क ने अमेरिका से किया था सौदा, ग्रीनलैंड से है कनेक्शन

ट्रंप प्रशासन का स्पष्ट मत है कि डेनमार्क का इस विशाल आर्कटिक क्षेत्र पर कोई स्वाभाविक अधिकार नहीं, खासकर तब जब डेनमार्क से ग्रीनलैंड से हजारों किलोमीटर दूर बसा हो.

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राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ग्रीनलैंड पर कब्जे की जिद ने न केवल डेनमार्क के साथ तनाव बढ़ा दिया है, बल्कि दुनिया में भी हलचल मचा दी है. एक तरफ जहां अमेरिका ने विरोध करने वाले देशों को अतिरिक्त टैरिफ की धमकी सुना दी है, वहीं दूसरी ओर डेनमार्क ने भी साफ शब्दों में कह दिया है कि वो किसी भी कीमत पर ग्रीनलैंड को अमेरिका के हाथ में नहीं जाने देंगे. ट्रंप का दावा है कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है.

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ट्रंप प्रशासन का स्पष्ट मत है कि डेनमार्क का इस विशाल आर्कटिक क्षेत्र पर कोई स्वाभाविक अधिकार नहीं, खासकर तब जब डेनमार्क से ग्रीनलैंड से हजारों किलोमीटर दूर बसा हो. अब आते हैं अपने 100 साल पुराने इतिहास के सफर पर, जहां कभी खुद डेनमार्क ने ही अमेरिका से अपने कई आईलैंड्स का सौदा किया था. ग्रीनलैंड आज से नहीं बल्कि हजारों साल पहले से अमेरिका और डेनमार्क के बीच व्यापारिक केंद्र रहा है. लगभग एक हजार वर्ष पूर्व डेनिश यात्रियों ने इसी मार्ग से होते हुए अमेरिकी महाद्वीप को छुआ था, जहां स्थानीय जनजातियों से संघर्ष भी हुआ था.

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​100 साल पहले हुआ था सौदा


आपको जानकर हैरानी होगी कि 100 साल पहले कैरिबियाई सागर में स्थित वर्जिन द्वीपों का सौदा अमेरिका और डेनमार्क के बीच हुई था. वर्जिन द्वीपों में मुख्य रूप से तीन बड़े द्वीप और 40 से अधिक छोटे टापू शामिल हैं. अब इन्हें अमेरिकी वर्जिन द्वीप के नाम से जाना जाता है. कुल मिलाकर करीब 90 हजार आबादी वाला यह समूह कभी डेनमार्क का उपनिवेश ‘डेनिश वेस्ट इंडीज’ कहलाता था. यहां की अधिकांश जनसंख्या अफ्रीकी मूल की है, जिन्हें यूरोपीय उपनिवेशवाद के दौर में गन्ना खेती के लिए लाया गया था.

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किस कीमत पर बिका था वर्जिन आईलैंड?


19वीं शताब्दी तक समुद्री लुटेरों और यूरोपीय शक्तियों के बीच इस क्षेत्र पर कब्जे की होड़ लगी रहती थी. अमेरिका ने जब महाशक्ति के रूप में उभरना शुरू किया, तो उसकी नजर इन रणनीतिक द्वीपों पर पड़ी. अमेरिकी महाद्वीप से यूरोपीय प्रभाव हटाने की नीति के तहत वुड्रो विल्सन प्रशासन ने डेनमार्क से सौदा किया. गन्ना उत्पादन से लाभ घटने और द्वीप बोझ बनने पर डेनमार्क ने पहली कोशिश में 7.5 मिलियन डॉलर का प्रस्ताव ठुकरा दिया, लेकिन प्रथम विश्व युद्ध के बाद 5 मिलियन डॉलर के सोने के बदले अमेरिका को इन द्वीपों पर मालिकाना हक मिला.

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लेखक के बारे में

Akarsh Shukla

Akarsh Shukla

आकर्ष शुक्ला न्यूज 24 के साथ बतौर चीफ सब एडिटर जुड़े हुए हैं. मूल रूप से नोएडा, उत्तर प्रदेश के रहने वाले आकर्ष ने पत्रकारिता का सफर 2016 में प्रिंट मीडिया से शुरू हुआ, बाद में उन्होंने डिजिटल मीडिया का रुख किया. आकर्ष शुक्ला ने गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUS&T) हिसार, हरियाणा से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन (MJMC) की डिग्री हासिल की. आकर्ष ने दिल्ली के अखबार वूमेन एक्सप्रेस में काम किया. इसके बाद नवोदय टाइम्स, ओपेरा न्यूज, वनइंडिया, इंडिया डॉट कॉम (जी मीडिया ग्रुप) में विभिन्न पदों पर कार्य किया. आकर्ष शुक्ला अक्टूबर, 2025 से न्यूज24 से जुड़े हुए हैं, जहां वो मुख्य रूप से राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय और राजनीति से जुड़ी खबरों को कवर करते हैं. इसके साथ ही आकर्ष शिफ्ट हेड के तौर पर टीम का नेतृत्व भी करते हैं. आकर्ष ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव के अलावा संसद से जुड़ी खबरों को कवर किया है. उनकी राजनीति में गहरी रुचि है, इस कारण वह राजनीति से जुड़ी खबरों को आसान शब्दों में लिखने में माहिर हैं. डिग्री और डिप्लोमा: आकर्ष शुक्ला ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक (BA) की डिग्री के बाद गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (GJUS&T) हिसार, हरियाणा से मास्टर ऑफ मास कम्युनिकेशन (MJMC) पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. आकर्ष शुक्ला ने DICS इंस्टीट्यूट से कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर में 2 साल का डिप्लोमा भी किया है. पत्रकारिता में अनुभव: 10 वर्ष से अधिक
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