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दुनिया

होर्मुज से तेल परिवहन में भारी गिरावट, दुनिया पर मंडराया 1973 जैसा तेल का महासंकट

अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर हमलों के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाजों का आवागमन लगभग ठप हो गया है. इससे दुनिया में 1973 के तेल संकट जैसी स्थिति बनने का डर सता रहा है, जब अरब देशों ने इजराइल समर्थक राष्ट्रों पर तेल निर्यात बंद कर दिया था. जानें, क्या हुआ था 53 साल पहले?

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Edited By : Vijay Jain Updated: Mar 12, 2026 17:58

अमेरिका-इजराइल के हमलों के बाद दुनिया के सबसे संवेदनशील ऊर्जा चोकपॉइंट होर्मुज जलडमरूमध्य पर ट्रैफिक में भारी कमी आई है. ईरान की ओर से चेतावनी दी गई है कि यह रास्ता बंद रह सकता है, जिससे वैश्विक तेल सप्लाई पर गहरा असर पड़ सकता है. पिछले साल यहां से प्रतिदिन करीब 15 मिलियन बैरल कच्चा तेल और 5 मिलियन बैरल पेट्रोलियम उत्पाद गुजरे थे. सामान्य दिनों में यहां रोजाना औसतन 138 कमर्शियल जहाज गुजरते हैं, लेकिन अमेरिका-इजराइल के हमलों के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जहाजों का आवागमन लगभग ठप हो गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह संकट 1973 से भी बड़ा हो सकता है, क्योंकि आज दुनिया की ऊर्जा जरूरतें कहीं ज्यादा हैं और यह महत्वपूर्ण जलमार्ग वैश्विक तेल का एक बड़ा हिस्सा सप्लाई करता है.

तेल की कीमतों में तेज उछाल

हमलों के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमत 70-80 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 100 डॉलर के पार चली गई है, यानी 20-40% की तेजी. कुछ रिपोर्टों में यह 120 डॉलर तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है. यह वृद्धि तब हो रही है जब अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) ने रणनीतिक भंडार से तेल छोड़ने का फैसला किया है, लेकिन बाजार में डर कायम है कि लंबे समय तक रुकावट बनी रही तो कीमतें और भी आसमान छू सकती हैं.

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क्या था 1973 का तेल संकट?

1973 के तेल संकट ने दुनिया को पहली बार यह एहसास कराया कि ‘काला सोना’ यानी कच्चा तेल किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को तबाह करने की ताकत रखता है. अक्टूबर 1973 में, मिस्र और सीरिया के नेतृत्व में अरब देशों ने इजरायल पर अचानक हमला कर दिया. इसे ‘योम किप्पुर युद्ध’ कहा गया. जब अमेरिका और कई पश्चिमी देशों ने इजरायल को सैन्य और आर्थिक मदद भेजी तो अरब देश भड़क गए, जिसके जवाब में अरब तेल उत्पादक देशों (OAPEC) ने 17 अक्टूबर 1973 को इजराइल समर्थक देशों (अमेरिका, नीदरलैंड, ब्रिटेन, जापान, कनाडा आदि) पर तेल एम्बार्गो लगा दिया. उत्पादन में हर महीने 5% कटौती की गई.

कीमतों में ऐतिहासिक उछाल

इस प्रतिबंध का असर इतना भयानक था कि कच्चे तेल की कीमतें रातों-रात आसमान छूने लगीं. अक्टूबर 1973 में तेल की कीमत लगभग 3 डॉलर प्रति बैरल थी. अमेरिका में पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लगीं, कई जगह ईंधन खत्म हो गया. सरकारों ने राशनिंग, स्पीड लिमिट कम करने और बिजली बचत जैसे कदम उठाए. यूरोप में भी ड्राइविंग पर प्रतिबंध लगे. यूरोप में भी ड्राइविंग पर प्रतिबंध लगे. इससे महंगाई बढ़ी, कई देशों में आर्थिक मंदी आई. मार्च 1974 तक तेल की कीमत बढ़कर करीब 12 डॉलर प्रति बैरल हो गई. एम्बार्गो मार्च 1974 में खत्म हुआ, लेकिन दुनिया ने ऊर्जा नीतियां बदल लीं. कुछ महीनों में दुनिया ने 300% से ज्यादा की महंगाई देखी.

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आज का संकट क्यों बड़ा लग रहा है?

आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था 1973 की तुलना में कहीं अधिक एक-दूसरे पर निर्भर है. परिवहन और निर्माण लागत बढ़ने से खाने-पीने की चीजों से लेकर हवाई यात्रा तक सब कुछ महंगा हो जाएगा. होर्मुज से 20% वैश्विक तेल गुजरता है. यदि हॉर्मुज का रास्ता लंबे समय तक बंद रहता है तो कुछ रिपोर्टों में तेल 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने की आशंका जताई गई है. अगर ईरान ने इस जलमार्ग को पूरी तरह ब्लॉक किया, तो यह एक वैश्विक आर्थिक युद्ध में तब्दील हो सकता है. यह स्थिति भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए भी चिंता का विषय है, जहां पेट्रोल-डीजल और LPG की कीमतें बढ़ सकती हैं.

First published on: Mar 12, 2026 05:58 PM

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