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खोमेनेई के अंतिम संस्कार के बहाने ईरान ने दुनिया को दिए कई संदेश, जानें भारत के लिए मुस्लिम देश ने क्या कहा?

ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक करने की रस्में जारी हैं. 4 जुलाई 2026 को तेहरान में आयोजित इस जनाजे में जब 30 से ज्यादा देशों और गैर-राज्य संस्थाओं के प्रतिनिधिमंडल खामेनेई को आखिरी विदाई देने पहुंचे और वहां कुरान की अलग-अलग आयतों को पढ़ा गया.

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ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक करने की रस्में जारी हैं. 4 जुलाई 2026 को तेहरान में आयोजित इस जनाजे में जब 30 से ज्यादा देशों और गैर-राज्य संस्थाओं के प्रतिनिधिमंडल खामेनेई को आखिरी विदाई देने पहुंचे और वहां कुरान की अलग-अलग आयतों को पढ़ा गया.

विशेषज्ञों का मानना है कि कुरान की इन आयतों का सिलेक्शन सिर्फ धार्मिक नहीं था, बल्कि इनके जरिए ईरान ने दुनिया को एक बेहद नपा-तुला कूटनीतिक संदेश देने की कोशिश की है.

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जब कई देशों के प्रतिनिधि खामेनेई के ताबूत के पास से गुजर रहे थे, तो हर देश के हिसाब से आयतें बदल रही थीं. हालांकि ईरान सरकार ने इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि ये सब पहले से तय और सोची-समझी रणनीति का एक हिस्सा था.

भारत के लिया क्या पढ़ा गया?

रूस और चीन के लिए नरम कूटनीति रूस, चीन और भारत जैसे मित्र देशों के लिए युद्ध की नहीं, बल्कि धार्मिकता और सांत्वना से जुड़ी आयतें चुनी गईं. चीन के लिए पढ़ी गई आयत में नरम लहजे में कहा गया कि जीत सिर्फ अल्लाह से मिलती है. रूस के लिए कहा गया कि आखिर में नेक लोगों के हक में फैसला होता है.

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भारत के लिए ‘कमजोर न पड़ें और शोक न मनाएं’ वाले हिस्से का एक छोटा और सौम्य अंश पढ़ा गया.

सोमवार को ईरान ने खामेनेई के राजकीय अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए भारत का आभार भी जताया. तेहरान ने भारत की इस मौजूदगी को दोनों देशों के स्थायी संबंधों का ‘अनमोल सबूत’ बताया और कहा कि ईरानी लोग भारत की इस एकजुटता को कभी नहीं भूलेंगे.

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सऊदी अरब को याद दिलाई ‘बद्र की जंग’

अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषक शाहीन मोदारेस के मुताबिक, ‘इस जनाजे में सबसे अहम बातें किसी अधिकारी ने मुंह से नहीं कहीं, बल्कि वो आयतें थीं जो पढ़ी जा रही थीं.’ उन्होंने इसे ‘आयतों के जरिए शीतयुद्ध कालीन क्रेमलिनोलॉजी’ करार दिया.

सबसे हैरान करने वाली बात ये थी कि जब सऊदी अरब का डेलीगेश ताबूत के सामने पहुंचा, उस समय सूरह अल इमरान (3:13) की आयत पढ़ी गई. ये आयत ‘बद्र की जंग’ की याद दिलाती है, जो इस्लाम की पहली बड़ी लड़ाई थी. इसमें एक छोटी मुस्लिम सेना ने अपने से बहुत बड़ी दुश्मन सेना को हराया था. बद्र की लड़ाई 624 ईस्वी में सऊदी अरब की धरती पर ही लड़ी गई थी, इसलिए इस आयत के चयन ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा.

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यह भी पढ़ें- खामेनेई के अंतिम संस्कार से दूर रहे 13 देश, न प्रतिनिधि भेजे और न बुलावे का दिया जवाब, जानें क्यों अपनाया ऐसा रवैया?

ईरान पहले भी देता रहा है आयतों से संदेश

ईरान का तनाव के समय कुरान की आयतों का इस्तेमाल करना कोई नया नहीं है. इससे पहले भी इसी साल अप्रैल में ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों का जवाब सूरह अल-मुजादिला की आयतों से दिया था, ताकि ईरान के रुख को अल्लाह के इंसाफ और अंतिम जीत के तौर पर पेश किया जा सके.

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‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ को भी दी हिम्मत

ईरान के वैचारिक और सैन्य सहयोगियों को एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस कहा जाता है, उन्हें ईरान ने खामेनेई को विदाई देते समय शहादत, वफादारी और जीत की संदेश वाली आयतें पढ़कर सुनाई. वहीं, हमास के प्रतिनिधियों को उन पुरुषों के बारे में लिखी आयतें पढ़कर सुनाई गईं जिन्होंने अल्लाह के साथ अपने वादे को निभाया.

जबकि हिज्बुल्लाह के लिए वो आयत पढ़ी गई जिसमें अल्लाह पर यकीन रखने वालों से कहा गया है कि वो कमजोर न पड़ें और शोक न मनाएं, क्योंकि जीत उन्हीं की होगी.

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First published on: Jul 07, 2026 07:44 AM

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