Arif Khan
आरिफ खान मंसूरी को डिजिटल मीडिया में करीब 15 वर्षों का अनुभव है . वर्तमान में न्यूज24 की डिजिटल विंग में कार्यरत हैं. इससे पहले देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं.
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श्चिम बंगाल की राजनीति आज एक बार फिर उसी चौराहे पर आ खड़ी हुई है, जिसने 1990 के दशक के उत्तरार्ध में राज्य की सियासत को हमेशा के लिए बदल दिया था. आज तृणमूल कांग्रेस के भीतर जो बगावत और आंतरिक कलह मची है, वह ठीक वैसी ही है जैसी परिस्थितियों में ममता बनर्जी ने कभी कांग्रेस से नाता तोड़कर टीएमसी की नींव रखी थी.
तृणमूल कांग्रेस के जन्म से पहले, 1990 के दशक में ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल कांग्रेस संगठन के भीतर पूरी तरह अलग-थलग पड़ चुकी थीं. साल 1997 में स्थिति इतनी बिगड़ गई कि उन्हें कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया. अगस्त 1997 में कोलकाता में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का एक बड़ा सत्र आयोजित हुआ. उस समय सीताराम केसरी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और सोमेन मित्रा बंगाल कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे. कांग्रेस का एक धड़ा चाहता था कि ममता को किसी तरह पार्टी में रोक लिया जाए, लेकिन ममता बनर्जी का मानना था कि कांग्रेस आलाकमान जानबूझकर बंगाल में उनके वामपंथ विरोधी आंदोलन को दबा रहा है.
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उस दौर में राष्ट्रीय राजनीति और संसद में टिके रहने के लिए कांग्रेस पूरी तरह से वामपंथ के समर्थन पर निर्भर थी. ममता बनर्जी को लगता था कि इसी राजनीतिक मजबूरी के कारण दिल्ली में बैठी कांग्रेस लीडरशिप बंगाल में माकपा के खिलाफ आक्रामक रुख नहीं अपना रही है. इसी हताशा के बीच ममता बनर्जी के खेमे ने कांग्रेस नेताओं पर हमला करने के लिए एक राजनीतिक मुहावरा गढ़ा, जिसे ‘वॉटरमेलन थ्योरी’ कहा गया. ममता के समर्थकों का आरोप था कि कांग्रेस के ये नेता तरबूज की तरह हैं – ‘जो बाहर से तो हरे (कांग्रेस के रंग में) दिखते हैं, लेकिन अंदर से पूरी तरह लाल (CPM की विचारधारा के प्रति नरम) हैं’. यानी वे जनता के सामने तो वामपंथ का विरोध करते हैं, लेकिन अंदरखाने उनकी सत्ता बचाए रखने में मदद करते हैं.
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1997 के उसी कोलकाता सत्र के दौरान एक ऐसी घटना हुई जिसने इतिहास बदल दिया. कांग्रेस नेतृत्व ने अंदर एक हॉल में कार्यक्रम आयोजित किया था, जबकि ममता बनर्जी ने उसी वेन्यू के ठीक बाहर एक समानांतर जनसभा बुला ली. हैरान करने वाली बात यह रही कि हॉल के अंदर की आधिकारिक बैठक से कई गुना ज्यादा भीड़ बाहर ममता बनर्जी की रैली में उमड़ पड़ी. आम कार्यकर्ता और समर्थक चुपचाप आधिकारिक कार्यक्रम से निकलकर ममता के चारों ओर जमा हो गए. यह इस बात का साफ संकेत था कि ममता बनर्जी का जनाधार अब कांग्रेस संगठन का मोहताज नहीं रहा. इसके बाद ही तृणमूल कांग्रेस का जन्म हुआ.
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भारतीय राजनीति में कांग्रेस से अलग होकर कई पार्टियां बनीं, जैसे मुलायम सिंह की सपा या लालू प्रसाद की राजद, लेकिन टीएमसी का प्रयोग सबसे अलग रहा क्योंकि इसने न सिर्फ अस्तित्व बचाए रखा बल्कि लगातार तीन बार से बंगाल की सत्ता पर काबिज है. जिस टीएमसी का जन्म खुद बगावत और सांगठनिक असंतोष से हुआ था, आज वह खुद आंतरिक बिखराव से जूझ रही है. ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में बागी गुट आज ठीक वैसे ही आरोप टीएमसी के वर्तमान नेतृत्व पर लगा रहा है, जैसे कभी ममता ने कांग्रेस पर लगाए थे.
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