Ritabrata Banerjee: तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट से गुजर रही है. 1998 में ममता बनर्जी द्वारा बनाई गई इस पार्टी में पहली बार इतना गहरा विद्रोह देखने को मिल रहा है. इस विद्रोह के केंद्र में हैं ऋतब्रत बनर्जी, जो कभी CPI(M) के युवा चेहरों में सबसे चहेते माने जाते थे. अब वे अपनी ही पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं और राजनीतिक गलियारों में उन्हें बंगाल का 'एकनाथ शिंदे' कहा जा रहा है.
वामपंथ से TMC तक का सफर

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ऋतब्रत बनर्जी की राजनीतिक शुरुआत 1990 के दशक के मध्य में Students’ Federation of India (SFI) से हुई. उन्होंने असुतोष कॉलेज छात्र संघ के महासचिव के रूप में काम किया और बाद में SFI के अखिल भारतीय महासचिव बने.
34 की उम्र में बनाए गए राज्यसभा सांसद

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2011 में कोलकाता दक्षिण लोकसभा उपचुनाव लड़े, हालांकि हार गए, लेकिन 2014 में मात्र 34 वर्ष की आयु में CPI(M) की ओर से राज्यसभा सांसद बनाए गए. 2017 में पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में उन्हें CPI(M) से निकाल दिया गया, जिसके बाद 2018 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस का रुख किया.
TMC में तेजी से मिली पॉपुलैरिटी

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TMC में शामिल होने के बाद ऋतब्रत बनर्जी ने पार्टी की ट्रेड यूनियन wing INTTUC के राज्य अध्यक्ष पद संभाला. दिसंबर 2024 में उन्हें TMC की ओर से राज्यसभा भेजा गया. 2026 के विधानसभा चुनाव में भारी BJP लहर के बावजूद उन्होंने हावड़ा जिले की उलुबेड़िया पूर्व सीट से जीत हासिल की. पार्टी के अंदर उन्हें वामपंथी वोट बैंक और ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं से जुड़ने का श्रेय दिया जाता रहा.
2017 में CPI(M) से हुई विदाई

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CPI(M) में रहते हुए ऋतब्रत पर लग्जरी लाइफस्टाइल का आरोप लगा. सोशल मीडिया पर उनके एप्पल वॉच और मॉन्टब्लैंक पेन की तस्वीरें वायरल हुईं, जो कम्युनिस्ट विचारधारा से मेल नहीं खाती थीं. इसके अलावा उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं प्रकाश करात और ब्रिंदा करात की सार्वजनिक आलोचना की. उसी वर्ष एक शोध छात्रा ने उनके खिलाफ बलात्कार का आरोप लगाया, जिसके बाद CPI(M) पोलितब्यूरो ने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया.
ममता के खिलाफ विद्रोह

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2026 के चुनाव में TMC की करारी हार के बाद ऋतब्रत बनर्जी ने खुलकर असंतोष जताना शुरू कर दिया. उन्होंने अभिषेक बनर्जी की नेतृत्व शैली, I-PAC पर अत्यधिक निर्भरता और पार्टी की जड़ों से दूरी का मुद्दा उठाया. दूसरे बागी विधायक संदीपन साहा के साथ उन्होंने विधानसभा स्पीकर के पास शिकायत दायर की कि उनके हस्ताक्षर जालसाजी से लिए गए. इसके बाद TMC ने उन्हें और संदीपन साहा को पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए निष्कासित कर दिया.
60 विधायकों के साथ बने बागी

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ऋतब्रत बनर्जी ने दावा किया है कि TMC के 80 विधायकों में से 60 उनके साथ हैं. वे विधानसभा में नेता विपक्ष का पद अपने लिए मांग रहे थे. बुधवार, 3 जून को विधानसभा स्पीकर द्वारा ऋतब्रत बनर्जी की समर्थित टीएमसी को विपक्ष की पार्टी मान लिया गया और ऋतब्रत को नेता विपक्ष बनाया गया है. उन्होंने ममता को सलाहकार के रूप में बने रहने का प्रस्ताव दिया है, जो शिंदे की रणनीति से काफी मिलता-जुलता है.
TMC पर क्या होगा असर?

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TMC के लिए 1998 के बाद ये सबसे गंभीर संकट है. हालांकि ममता बनर्जी अभी भी जनता में अपनी लोकप्रियता बनाए हुए हैं, लेकिन पार्टी संगठन पर नियंत्रण खोने का खतरा साफ दिख रहा है.