Mamata And Suvendu mother name common: पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मां का नाम भी गायत्री देवी था. ऐसे में राजनीतिक हलकों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि “गायत्री देवी की बेटी के बाद अब दूसरी गायत्री देवी का बेटा बंगाल की सत्ता पर बैठा है.” यह संयोग अब बंगाल की राजनीति में प्रतीकात्मक चर्चा का विषय बन गया है. रवींद्र जयंती के दिन पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला. भारतीय जनता पार्टी ने प्रचंड बहुमत के साथ राज्य में सरकार बनाई और कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में शुभेंदु अधिकारी ने पश्चिम Bengal के 9वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. शपथ ग्रहण समारोह के बाद उनकी मां गायत्री अधिकारी की भावुक प्रतिक्रिया ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी.
गायत्री अधिकारी ने कहा, “बचपन से ही शुभेंदु बेहद संघर्षशील था. राजनीति में आने के बाद उसे कई कठिन दौर से गुजरना पड़ा. उस पर हमले हुए, विरोध हुआ, लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी. जनता के बीच रहकर काम करने की उसकी जिद ही आज उसे इस मुकाम तक लाई है.”
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छात्र राजनीति से मुख्यमंत्री तक का सफर
15 दिसंबर 1970 को पूर्व मेदिनीपुर जिले के करकुली गांव में जन्मे शुभेंदु अधिकारी ने रवींद्र भारती विश्वविद्यालय से एम.ए. की पढ़ाई की. उन्होंने 1995 में छात्र राजनीति से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की. कांथी नगरपालिका के पार्षद से लेकर चेयरमैन, सांसद, विधायक और नेता प्रतिपक्ष तक उन्होंने लगातार अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत की. 2007 के नंदीग्राम आंदोलन में उनकी भूमिका ने उन्हें राज्य की राजनीति का बड़ा चेहरा बना दिया. इस आंदोलन को वाम मोर्चा सरकार के पतन की बड़ी वजह माना जाता है.
तृणमूल से भाजपा तक
शुभेंदु अधिकारी लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस में रहे और ममता बनर्जी सरकार में परिवहन तथा सिंचाई जैसे अहम मंत्रालय संभाले. राजनीतिक मतभेदों के बाद उन्होंने दिसंबर 2020 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में भाजपा जॉइन कर ली. उन्हें “जायंट किलर” भी कहा जाता है. उन्होंने 2021 में नंदीग्राम सीट पर और 2026 में भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी को हराकर राज्य की राजनीति में बड़ा संदेश दिया.
भाजपा विधायक दल ने सर्वसम्मति से चुना नेता
8 मई को भाजपा विधायक दल की बैठक में शुभेंदु अधिकारी को सर्वसम्मति से नेता चुना गया था. इसके बाद उनके मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया था. भाजपा ने विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए पहली बार अपने दम पर बंगाल की सत्ता हासिल की.
प्रशासनिक और सहकारिता क्षेत्र में भी लंबा अनुभव
शुभेंदु अधिकारी को दो दशक से अधिक का विधायी अनुभव है. वे दो बार लोकसभा सांसद, तीन बार विधायक और पांच वर्षों तक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रह चुके हैं. उन्होंने हुगली रिवर ब्रिज कमीशन के चेयरमैन और हल्दिया डेवलपमेंट अथॉरिटी के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया. सहकारिता आंदोलन में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है.
स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा रहा अधिकारी परिवार
कांथी का अधिकारी परिवार स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़ा रहा है. परिवार के बिपिन अधिकारी और केनाराम अधिकारी कई स्वतंत्रता सेनानियों के करीबी सहयोगी थे. ब्रिटिश शासन के दौरान अधिकारी परिवार का घर दो बार जलाया गया था और बिपिन अधिकारी को जेल भी भेजा गया था. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं.
यह भी पढ़ें: क्या ममता बनर्जी ने मान ली हार! सुवेंदु के शपथ लेते ही दिखा बड़ा बदलाव
Mamata And Suvendu mother name common: पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मां का नाम भी गायत्री देवी था. ऐसे में राजनीतिक हलकों में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि “गायत्री देवी की बेटी के बाद अब दूसरी गायत्री देवी का बेटा बंगाल की सत्ता पर बैठा है.” यह संयोग अब बंगाल की राजनीति में प्रतीकात्मक चर्चा का विषय बन गया है. रवींद्र जयंती के दिन पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला. भारतीय जनता पार्टी ने प्रचंड बहुमत के साथ राज्य में सरकार बनाई और कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में शुभेंदु अधिकारी ने पश्चिम Bengal के 9वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. शपथ ग्रहण समारोह के बाद उनकी मां गायत्री अधिकारी की भावुक प्रतिक्रिया ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी.
गायत्री अधिकारी ने कहा, “बचपन से ही शुभेंदु बेहद संघर्षशील था. राजनीति में आने के बाद उसे कई कठिन दौर से गुजरना पड़ा. उस पर हमले हुए, विरोध हुआ, लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी. जनता के बीच रहकर काम करने की उसकी जिद ही आज उसे इस मुकाम तक लाई है.”
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छात्र राजनीति से मुख्यमंत्री तक का सफर
15 दिसंबर 1970 को पूर्व मेदिनीपुर जिले के करकुली गांव में जन्मे शुभेंदु अधिकारी ने रवींद्र भारती विश्वविद्यालय से एम.ए. की पढ़ाई की. उन्होंने 1995 में छात्र राजनीति से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की. कांथी नगरपालिका के पार्षद से लेकर चेयरमैन, सांसद, विधायक और नेता प्रतिपक्ष तक उन्होंने लगातार अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत की. 2007 के नंदीग्राम आंदोलन में उनकी भूमिका ने उन्हें राज्य की राजनीति का बड़ा चेहरा बना दिया. इस आंदोलन को वाम मोर्चा सरकार के पतन की बड़ी वजह माना जाता है.
तृणमूल से भाजपा तक
शुभेंदु अधिकारी लंबे समय तक तृणमूल कांग्रेस में रहे और ममता बनर्जी सरकार में परिवहन तथा सिंचाई जैसे अहम मंत्रालय संभाले. राजनीतिक मतभेदों के बाद उन्होंने दिसंबर 2020 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में भाजपा जॉइन कर ली. उन्हें “जायंट किलर” भी कहा जाता है. उन्होंने 2021 में नंदीग्राम सीट पर और 2026 में भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी को हराकर राज्य की राजनीति में बड़ा संदेश दिया.
भाजपा विधायक दल ने सर्वसम्मति से चुना नेता
8 मई को भाजपा विधायक दल की बैठक में शुभेंदु अधिकारी को सर्वसम्मति से नेता चुना गया था. इसके बाद उनके मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया था. भाजपा ने विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए पहली बार अपने दम पर बंगाल की सत्ता हासिल की.
प्रशासनिक और सहकारिता क्षेत्र में भी लंबा अनुभव
शुभेंदु अधिकारी को दो दशक से अधिक का विधायी अनुभव है. वे दो बार लोकसभा सांसद, तीन बार विधायक और पांच वर्षों तक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रह चुके हैं. उन्होंने हुगली रिवर ब्रिज कमीशन के चेयरमैन और हल्दिया डेवलपमेंट अथॉरिटी के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया. सहकारिता आंदोलन में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही है.
स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा रहा अधिकारी परिवार
कांथी का अधिकारी परिवार स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़ा रहा है. परिवार के बिपिन अधिकारी और केनाराम अधिकारी कई स्वतंत्रता सेनानियों के करीबी सहयोगी थे. ब्रिटिश शासन के दौरान अधिकारी परिवार का घर दो बार जलाया गया था और बिपिन अधिकारी को जेल भी भेजा गया था. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में नए समीकरण बन सकते हैं.
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