उत्तर प्रदेश की इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने हाफ एनकाउंटर पर सवाल उठाए हैं और एक मामले की CBI जांच के आदेश दिए हैं. 3 महीने में जांच रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए हैं. जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की सिंगल बेंच ने छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन की ओर से दाखिल एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए सवाल किया कि आखिर पुलिस की गोली आरोपी के ठीक घुटने के नीचे कैसे लग जाती है, जबकि आरोपी के जवाबी फायरिंग करने पर पुलिसकर्मी को छर्रा तक नहीं लगता. मामला श्रावस्ती में हुए एक हाफ एनकाउंटर कहा है, जिसमें दर्ज FIR में कमियां होने की बात बेंच ने कही.
‘हर प्रेम संबंध का अंत शादी जरूरी नहीं…’, रेप केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
आरोपी की गोलियां पुलिसवालों को क्यों छू नहीं पाती?
बेंच ने कहा कि उत्तर प्रदेश पुलिस किसी को गिरफ्तार करके FIR दर्ज कर देती है. फिर आरोप लगाए जाते हैं कि आरोपी को पकड़ा तो उसने पुलिस टीम पर अंधाधुंध फायरिंग की. जबकि पुलिसकर्मियों को आरोपी की गोलियों का छर्रा तक नहीं लगता. आरोपी अगर फायरिंग करता है तो पुलिसकर्मी घायल हुए बिना कैसे बच जाते हैं? वहीं पुलिस की गोली आरोपी के घुटने पर या उसके नीचे कैसे लग जाती है? अधिकारियों को खुश करने, प्रमोशन पाने या सोशल मीडिया पर वाहवाही लूटने के लिए पैरों में गोली मारने का ट्रेंड चल रहा है, जबकि पुलिस भूल गई है कि सजा देने का अधिकार पुलिस को नहीं न्यायपालिका को है.
आरोपी को मुठभेड़ में गिरफ्तार किए जाने का दावा
बता दें कि 9 मई 2025 को श्रावस्ती के थाना इकौना में 7 साल की बच्ची के अपहरण मामले में FIR दर्ज हुई. आरोप शफीक नामक व्यक्ति और 2 अज्ञात लोगों पर लगा. आरोपी शफीक को मौके पर दबोचकर पुलिस के हवाले कर दिया गया, लेकिन पुलिस ने 12 मई 2025 को छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन को मुख्य आरोपी बताया और कहा कि इसे पुलिस मुठभेड़ में गिरफ्तार किया गया, जिसमें आरोपी के दोनों पैरों में गोली लगी थी. मुठभेड़ मामले में अगल FIR दर्ज की गई, जिसमें थानाध्यक्ष अश्विनी कुमार दुबे समेत 5 सब इंस्पेक्टर, एक हेड कॉन्सटेबल और 6 कॉन्सटेबल समेत 13 पुलिसकर्मियों को गश्त पर बताया गया.
बेंच ने पुलिस की FIR पर एक सवाल यह उठाया
FIR में दर्ज इस फैक्ट पर हाई कोर्ट ने कहा कि पुलिस जीप या SUV में 13 लोगों का बैठना पॉसिबल नहीं. FIR में आगे बताया गया कि आरोपी के बारे में सुराग मिलने पर स्वाट टीम के 10 सदस्य भी उनके साथ आ गए और आरोपी का घेराव किया. इस पॉइंट पर कोर्ट ने सवाल उठाया कि एक देसी कट्टे और 2 कारतूस से लैस आरोपी को 23 पुलिसकर्मी घेरने में नाकाम कैसे रहे? इतना ही नहीं, उन्हें अपने बचाव में आरोपी पर गोली चलानी पड़ी. कोर्ट में पेश हुए थानाध्यक्ष अश्विनी कुमार दुबे ने बताया कि 15 मीटर की दूरी से 9MM की सर्विस रिवॉल्वर से 2 गोलियां चलाई थीं, जो सीधे आरोपी के दोनों पैरों में लगी थीं.
नमाज पर इलाहाबाद HC का बड़ा फैसला, खुले में Namaz पढ़ने से जुड़ी याचिका की गई खारिज
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से चिढ़ने की आशंका जताई
बेंच ने आरोपी की मेडिकल रिपोर्ट और गोली के साइज में कमियां पहचानते हुए थानाध्यक्ष द्वारा कोर्ट में दी गई सफाई को भ्रामक और हास्यास्पद बताया. बता दें कि आरोपी को 6 साल की एक बच्ची के रेप और मर्डर केस में फांसी की सजा हुई थी, जिसे हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट साल 2023 में उसे बरी कर दिया था. इसलिए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आशंका जताई कि सुप्रीम कोर्ट के द्वारा बरी किए जाने के फैसले से चिढ़कर आरोपी को जानबूझकर मामले में आरोपी बनाया गया. वहीं एनकाउंटर करके आरोपी को पकड़ने वाले 23 पुलिसकर्मियों को पुरस्कृत भी कर दिया गया.
हाई कोर्ट ने थाना प्रभारी को लेकर ये आदेश दिया
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने CBI को आदेश दिया कि थाना प्रभारी अश्विनी कुमार दुबे की शूटिंग कैपेसिटी की क्षमता जांची जाए. चेक किया जाए कि वह रात के अंधेरे में 15 मीटर की दूरी से सिर्फ हथियार लोड किए जाने की आवाज सुन सकता है और 9MM की सर्विस रिवॉल्वर से सटीक निशाना लगाता सकता है.