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मुंबई
उद्धव ठाकरे ने एक बड़ी चूक से गंवाई BMC की सत्ता, कांग्रेस की गलती से भी BJP फायदे में
Uddhav Thackeray Lost BMC: महाराष्ट्र की राजनीति में उद्धव ठाकरे का नाम हमेशा मुंबई की सत्ता से जुड़ा रहा है, लेकिन महाराष्ट्र में BMC के चुनावी नतीजों ने साबित कर दिया कि एक छोटी सी चूक कैसे घातक साबित सकती है. बिना कांग्रेस के मैदान में उतरी उद्धव की शिवसेना (UBT) ने 65 सीटें जीतीं पर BMC की सत्ता से बाहर हो गई. इससे 24 सीटें जीतने वाली कांग्रेस को भी दोहरा नुकसान हुआ. आंकड़ों से समझें गणित
Edited By :
Vijay Jain
Updated: Jan 17, 2026 10:29
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Uddhav Thackeray Lost BMC: महाराष्ट्र में BMC के चुनावी नतीजों में उद्धव की शिवसेना (UBT) ने 65 सीटें जीतीं, लेकिन BJP-शिंदे सेना गठबंधन ने 118 सीटों के साथ बहुमत हासिल कर लिया. सवाल उठता है, अगर उद्धव ने कांग्रेस से गठबंधन किया होता तो क्या वह BMC की गद्दी बचा पाते? आंकड़ों पर नजर डालें तो लगता है, हां! कांग्रेस ने अकेले लड़कर 24 सीटें जीतीं, लेकिन वोट बंटवारे ने उद्धव को भारी नुकसान पहुंचाया. दरअसल, उद्धव ठाकरे की चूक यही है कि वह कांग्रेस को मनाने में नाकाम रहे, जिससे विपक्षी वोट बंट गए. 2024 विधानसभा चुनावों में MVA (शिवसेना UBT + कांग्रेस + NCP-SP) ने साथ लड़कर अच्छा प्रदर्शन किया था. लेकिन बीएमसी चुनाव में अगर उद्धव ने MVA को एकजुट रखा होता, तो UBT + कांग्रेस के वोट ऐड होकर 27.52% + 4.44% = 31.96% हो जाते.
वोट बंटवारे से महायुति को फायदा
कांग्रेस ने 151 वार्डों में उम्मीदवार उतारे और 24 सीटें जीतीं, लेकिन उनका वोट बैंक मुख्य रूप से मुस्लिम और दलित इलाकों में था, जहां UBT भी मजबूत है, लेकिन असल में कई वार्डों में वोट बंटवारे से महायुति को फायदा हुआ. वार्ड 183 (धारावी): कांग्रेस की आशा काले जीतीं, लेकिन अगर गठबंधन होता तो UBT का उम्मीदवार मजबूत हो सकता था. मुंबई के मराठी-मुस्लिम बहुल इलाकों में UBT को 65 सीटें मिलीं, लेकिन कांग्रेस की 24 सीटें जोड़कर कुल 89 हो सकती थीं. वोट ट्रांसफर से 10-15 अतिरिक्त सीटें मिल सकती थीं, क्योंकि 2017 में शिवसेना ने 84 सीटें जीती थीं.
क्या होता अगर शिवसेना UBT-कांग्रेस में गठबंधन होता?
कांग्रेस के 2.42 लाख वोट मुख्य रूप से UBT के समर्थक बेस से आए. गठबंधन में ये वोट UBT कैंडिडेट्स को ट्रांसफर हो सकते थे, जिससे 20-25% वार्डों में जीत संभव थे. इससे शिवसेना UBT-कांग्रेस को कम से कम 15 सीटें अतिरिक्त मिलतीं जो अभी जीतीं 89 सीटों में जोड़ दें तो 104 हो जातीं और अगर NCP-SP की सीटें मिलाकर 110+ पहुंच सकती थीं यानी बहुमत के करीब. कांग्रेस की गलती थी जो VBA और RSP से गठबंधन किया, लेकिन अकेले लड़कर सिर्फ 24 सीटें जीतीं यानी 2017 की 31 से कम. अगर MVA में रहती, तो ज्यादा सीटें और मेयर पद की दावेदारी मिल सकती थी.
विपक्षी एकता से महायुति का दबदबा भी बिखरता
शिवसेना UBT-कांग्रेस गठबंधन से महायुति का दबदबा भी बिखर सकता था. BJP की 45% वोट शेयर मजबूत है, लेकिन विपक्षी एकता से कई क्लोज कॉन्टेस्ट, 10 से15 वार्ड ऐसे थे, जहां जीत-हार का अंतर 5% से कम था, में महायुति हार सकती थी. उदाहरण: मुंबई के दादर, शिवाजी पार्क जैसे इलाकों में UBT मजबूत रही, लेकिन कांग्रेस ने वोट काटे.
उद्धव की बादशाहत पर असर
उद्धव ठाकरे ने मराठी वोट बैंक को मजबूत रखा, शिंदे की असली शिवसेना केवल 27 सीट जीत पाई, जबकि शिवसेना UBT ने 65 सीटे जीतीं, लेकिन BMC गंवाने से मुंबई की 25 साल पुरानी सत्ता खत्म हो गई. अगर चूक न होती, तो उद्धव की 'बादशाहत' कायम रह सकती थी, क्योंकि कुल महाराष्ट्र में महायुति ने 24/29 कॉर्पोरेशन जीते, लेकिन मुंबई में क्लोज फाइट थी. संक्षेप में, उद्धव की चूक ने न सिर्फ BMC छीना, बल्कि विपक्ष को कमजोर किया. क्या अगले चुनावों में MVA एकजुट होगा?
Uddhav Thackeray Lost BMC: महाराष्ट्र में BMC के चुनावी नतीजों में उद्धव की शिवसेना (UBT) ने 65 सीटें जीतीं, लेकिन BJP-शिंदे सेना गठबंधन ने 118 सीटों के साथ बहुमत हासिल कर लिया. सवाल उठता है, अगर उद्धव ने कांग्रेस से गठबंधन किया होता तो क्या वह BMC की गद्दी बचा पाते? आंकड़ों पर नजर डालें तो लगता है, हां! कांग्रेस ने अकेले लड़कर 24 सीटें जीतीं, लेकिन वोट बंटवारे ने उद्धव को भारी नुकसान पहुंचाया. दरअसल, उद्धव ठाकरे की चूक यही है कि वह कांग्रेस को मनाने में नाकाम रहे, जिससे विपक्षी वोट बंट गए. 2024 विधानसभा चुनावों में MVA (शिवसेना UBT + कांग्रेस + NCP-SP) ने साथ लड़कर अच्छा प्रदर्शन किया था. लेकिन बीएमसी चुनाव में अगर उद्धव ने MVA को एकजुट रखा होता, तो UBT + कांग्रेस के वोट ऐड होकर 27.52% + 4.44% = 31.96% हो जाते.
वोट बंटवारे से महायुति को फायदा
कांग्रेस ने 151 वार्डों में उम्मीदवार उतारे और 24 सीटें जीतीं, लेकिन उनका वोट बैंक मुख्य रूप से मुस्लिम और दलित इलाकों में था, जहां UBT भी मजबूत है, लेकिन असल में कई वार्डों में वोट बंटवारे से महायुति को फायदा हुआ. वार्ड 183 (धारावी): कांग्रेस की आशा काले जीतीं, लेकिन अगर गठबंधन होता तो UBT का उम्मीदवार मजबूत हो सकता था. मुंबई के मराठी-मुस्लिम बहुल इलाकों में UBT को 65 सीटें मिलीं, लेकिन कांग्रेस की 24 सीटें जोड़कर कुल 89 हो सकती थीं. वोट ट्रांसफर से 10-15 अतिरिक्त सीटें मिल सकती थीं, क्योंकि 2017 में शिवसेना ने 84 सीटें जीती थीं.
क्या होता अगर शिवसेना UBT-कांग्रेस में गठबंधन होता?
कांग्रेस के 2.42 लाख वोट मुख्य रूप से UBT के समर्थक बेस से आए. गठबंधन में ये वोट UBT कैंडिडेट्स को ट्रांसफर हो सकते थे, जिससे 20-25% वार्डों में जीत संभव थे. इससे शिवसेना UBT-कांग्रेस को कम से कम 15 सीटें अतिरिक्त मिलतीं जो अभी जीतीं 89 सीटों में जोड़ दें तो 104 हो जातीं और अगर NCP-SP की सीटें मिलाकर 110+ पहुंच सकती थीं यानी बहुमत के करीब. कांग्रेस की गलती थी जो VBA और RSP से गठबंधन किया, लेकिन अकेले लड़कर सिर्फ 24 सीटें जीतीं यानी 2017 की 31 से कम. अगर MVA में रहती, तो ज्यादा सीटें और मेयर पद की दावेदारी मिल सकती थी.
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विपक्षी एकता से महायुति का दबदबा भी बिखरता
शिवसेना UBT-कांग्रेस गठबंधन से महायुति का दबदबा भी बिखर सकता था. BJP की 45% वोट शेयर मजबूत है, लेकिन विपक्षी एकता से कई क्लोज कॉन्टेस्ट, 10 से15 वार्ड ऐसे थे, जहां जीत-हार का अंतर 5% से कम था, में महायुति हार सकती थी. उदाहरण: मुंबई के दादर, शिवाजी पार्क जैसे इलाकों में UBT मजबूत रही, लेकिन कांग्रेस ने वोट काटे.
उद्धव की बादशाहत पर असर
उद्धव ठाकरे ने मराठी वोट बैंक को मजबूत रखा, शिंदे की असली शिवसेना केवल 27 सीट जीत पाई, जबकि शिवसेना UBT ने 65 सीटे जीतीं, लेकिन BMC गंवाने से मुंबई की 25 साल पुरानी सत्ता खत्म हो गई. अगर चूक न होती, तो उद्धव की ‘बादशाहत’ कायम रह सकती थी, क्योंकि कुल महाराष्ट्र में महायुति ने 24/29 कॉर्पोरेशन जीते, लेकिन मुंबई में क्लोज फाइट थी. संक्षेप में, उद्धव की चूक ने न सिर्फ BMC छीना, बल्कि विपक्ष को कमजोर किया. क्या अगले चुनावों में MVA एकजुट होगा?