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लाशों की आग से तपकर परिवार का पेट पाल रहीं जौनपुर की ‘महरीता चौधरी’, पति की मौत के बाद हालातों ने किया मजबूर

Jaunpur Mahrita Choudhary Struggle story:जौनपुर की महरीता चौधरी गंगा किनारे लाशों को जलाने का काम करती हैं, जो आम तौर पर कोई महिला नहीं करती। महरीता चौधरी ने इस काम के पीछे ऐसी वजह बताई, जिसे सुनकर हर किसी की आंखें नम हो गईं।

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Jaunpur Mahrita Choudhary Struggle story: श्मशान शब्द को सुनते ही लोगों के मन में एक डरावना ख्याल आता है, जिसे लोग कभी स्वीकार नहीं करना चाहते हैं। लेकिन जब ये पता चलें कि कोई महिला अपने दिन का आधे से ज्यादा समय सिर्फ उन जलती चिताओं के बीच श्मशान में गुजारती है तो वाकई हैरानी होती है कि आखिर कैसे? और इसी के साथ उस महिला की जिंदगी को पढ़ने की इच्छा जागने लगती है। ऐसी ही संघर्षों की कहानी जौनपुर की रहने वाली महरीता चौधरी की है, जो अपनी जिंदगी के उन लम्हों के साथ जी रही हैं, जिनके सहारे कोई एक क्षण भी नहीं जीना चाहेगा। जौनपुर की महरीता चौधरी गंगा किनारे लाशों को जलाने का काम करती हैं, जो आम तौर पर कोई महिला नहीं करती। महरीता चौधरी ने इस काम के पीछे ऐसी वजह बताई, जिसे सुनकर हर किसी की आंखें नम हो गईं। और इसी के साथ “संघर्ष ही जिंदगी का नाम है” जैसी एक कहावत भी सार्थक हो गई।

पति की मौत के बाद परिवार चलाने के लिए चुना ये रास्ता

जौनपुर में बदलापुर से आगे शाहगंज से 13 किलोमीटर दूर पिलकिछा गंगा घाट है, जहां जौनपुर की महरीता चौधरी शवों के अंतिम संस्कार का काम करती हैं। एक मीडिया इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि उनके पति संजय भी श्मशान में लाशों को जलाने का काम करते थे, उसी से हमारा परिवार चलता था। साल 2014 में उनके पति संजय लकड़ी उतारने के लिए पास के ही चौराहे पर गए थे। वे सड़क पर खड़े थे तभी एक तेज रफ्तार वाहन ने उन्हें टक्कर मारी, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई, जिसके बाद किसी तरह खुद को संभाला। उन्होंने कहा कि परिवार में 3 बेटियां और 1 दिव्यांग बेटा था। हालांकि, पति की मौत के बाद ससुर मदद के लिए आगे आए, लेकिन उन्होंने भी कभी 100 तो कभी 200 रुपए दिए, लेकिन इतने पैसों में परिवार चला पाना मुश्किल था। महरीता ने इन हालातों के बाद परिवार चलाने के लिए लाश जलाना ही अंतिम विकल्प माना और जिसके बाद वे पिलकिछा घाट पर चली आईं।

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पहली बार तेज आंच से हुई थी परेशान, कोविड में एक दिन में जलाईं 70 से 80 लाशें

महरीता बताती हैं कि उन्होंने पहले कभी लाश नहीं जलाई थी। इतना ही नहीं, वह कभी लाश के नजदीक भी नहीं गईं थी। नतीजतन, इसलिए जब पहली बार वह चिता के पास पहुंची तो चिता से निकल रही तेज आंच से वो परेशान हो गईं, उस दौरान 1 मिनट के लिए भी उस चिता के पास खड़े रहना मुश्किल सा लग रहा था। उन्होंने बताया कि इन समस्याओं के मुकाबले उनके हालात और मजबूरी ज्यादा बड़ी थी। निजी संस्थान को दिए इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि सालों तक इसी तपती आंच में तपकर अपने परिवार का पेट पालती रही। वहीं, साल 2021 में जब कोरोना की दूसरी लहर आई तो इलाके में मौत की संख्या तेजी से बढ़ी, जिस घाट पर कोरोना से पहले जहां 15-20 लाशें आती थीं, वही लाशें कोरोना के वक्त बढ़कर 70-80 तक पहुंच गईं। महरीता बताती हैं कि कोरोना का वक्त बहुत मुश्किलों वाला था। यहां तक कि जो लोग अपनों की लाश लेकर आते थे वो भी अपनों की ही चिता के पास जाने से बचते थे। लेकिन हम इन लाशों से दूर कहां जा सकते थे क्योंकि इन लाशों को जलाने की जिम्मेदारी हमारी होती है।

घर में रह रहीं शादी शुदा बेटियों की जिम्मेदारी भी उठाती हैं महरीता चौधरी

महरीता चौधरी बताती हैं कि साल 2014 में उनके पति की मौत हो गई। लेकिन घर में जवान बेटियां थीं, उनकी शादी की भी जिम्मेदारी थी, किसी तरह दो बेटियों की शादी की। शादी के बाद दोनों बेटियां लगभग 4 साल ससुराल में रहीं लेकिन पति की ओर से रोजाना शराब पीकर हंगामा करने से बेटियां परेशान हो गईं, जिसके चलते बीते 3 साल से दोनों बेटियां अपने बच्चों के साथ मायके वापस आ गईं। महरीता ने बताया कि तक से अभी तक उनकी तथा उनके बच्चों की जिम्मेदारी उठाने के साथ सारी जरूरतें पूरी कर रही हूं। थोड़ा भावुक होकर वो बोलीं कि अगर पति होते तो बेटियों का रिश्ता देख परख कर के अच्छी जगह करते। लेकिन लोगों की बातों में आकर, लड़के को अच्छा मानकर शादी करा दी लेकिन दोनों लड़के शराब के लती निकले।

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First published on: Oct 20, 2023 01:38 PM

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