समुद्र के नीचे भारत की सबसे बड़ी खोज, क्या मिलेगी श्रीकृष्ण की द्वारका? 2030 तक चलेगा ASI का मेगा अंडरवॉटर मिशन

इस मिशन का सबसे चर्चित केंद्र द्वारका है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह भगवान श्रीकृष्ण की राजधानी थी, जो बाद में समुद्र में समा गई.

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समुद्र की गहराइयों में छिपे भारत के प्राचीन इतिहास को सामने लाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा अभियान शुरू किया है. वर्ष 2030 तक कई ऐतिहासिक समुद्री स्थलों पर अंडरवॉटर पुरातात्विक खोज और खुदाई की जाएगी. इस अभियान का मकसद समुद्र के नीचे दबे प्राचीन शहरों, बंदरगाहों, किलों और सभ्यताओं के साक्ष्य तलाशना है.

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किन जगहों पर होगी खोज?

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की अंडरवॉटर आर्कियोलॉजी विंग फिलहाल गुजरात के द्वारका और बेट द्वारका, तमिलनाडु के महाबलीपुरम और पुडुचेरी के कराईकल में सर्वे और रिसर्च कर रही है. वहीं तमिलनाडु के पूम्पुहार तथा गुजरात के बेट द्वारका, छारी और गंगता बेट में भी अंडरवॉटर खोज और खुदाई के लिए अनुमति दी गई है. वर्ष 2030 तक द्वारका, बेट द्वारका, विजयदुर्ग, जंजीरा, कराईकल और महाबलीपुरम इस अभियान के प्रमुख केंद्र होंगे.

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क्या मिलेगी श्रीकृष्ण की द्वारका?

इस मिशन का सबसे चर्चित केंद्र द्वारका है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह भगवान श्रीकृष्ण की राजधानी थी, जो बाद में समुद्र में समा गई. पिछले कई वर्षों में समुद्र के नीचे पत्थर की संरचनाएं, प्राचीन लंगर और अन्य अवशेष मिले हैं. हालांकि, अब तक यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं हुआ है कि ये अवशेष श्रीकृष्ण की नगरी के ही हैं. यही वजह है कि यह खोज इतिहास और आस्था- दोनों के लिहाज से बेहद अहम मानी जा रही है।

समुद्र के नीचे क्या खोज रहे हैं वैज्ञानिक?

पुरातत्वविद यह पता लगाने की कोशिश करेंगे कि क्या समुद्र के नीचे किसी प्राचीन नगर, बंदरगाह, जहाज, घाट, किले या बस्ती के अवशेष मौजूद हैं. यदि महत्वपूर्ण संरचनाएं और कलाकृतियां मिलती हैं तो वे भारत के समुद्री इतिहास और प्राचीन सभ्यताओं को समझने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं.

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सरकार कितना खर्च कर रही है?

वर्ष 2025-26 में ASI की अंडरवॉटर आर्कियोलॉजी विंग को 75.40 लाख रुपये का बजट मिला था, जिसमें लगभग पूरी राशि खर्च की जा चुकी है. वर्ष 2026-27 में अब तक 66.50 लाख रुपये आवंटित किए गए हैं. तमिलनाडु सरकार ने भूमि और समुद्र दोनों में पुरातात्विक खुदाई के लिए 7 करोड़ रुपये अलग से निर्धारित किए हैं, जबकि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशनोग्राफी को भी इस मिशन के लिए बजट दिया गया है.

2030 तक क्या बदल सकता है?

ASI अंडरवॉटर पुरातत्व के लिए विशेषज्ञों को विशेष प्रशिक्षण भी दे रहा है. आधुनिक तकनीक, सोनार मैपिंग और वैज्ञानिक सर्वे की मदद से समुद्र के नीचे छिपे इतिहास को सामने लाने की कोशिश की जाएगी. अगर यह अभियान सफल रहा तो भारत के प्राचीन समुद्री व्यापार, बंदरगाहों और सभ्यताओं से जुड़े कई नए तथ्य सामने आ सकते हैं. द्वारका से लेकर महाबलीपुरम तक समुद्र की गहराइयों में छिपे रहस्य आने वाले वर्षों में इतिहास की नई तस्वीर पेश कर सकते हैं.

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