मिडिल ईस्ट की जंग से गुजरात में ‘मंदी’? टेक्सटाइल से केमिकल तक कई फैक्ट्रियों पर लगे ताले, हजारों मजदूर हुए बेरोजगार
दुनिया के दूसरे सबसे बड़े सिरामिक क्लस्टर मोरबी पर इस अंतरराष्ट्रीय संकट का सबसे बुरा असर पड़ा है. मंगलवार को हुई मोरबी सिरामिक एसोसिएशन की एक अहम बैठक में सर्वसम्मति से लॉकडाउन का फैसला लिया गया है. आपको बता दें कि गुजरात गैस ने पहले ही गैस बिक्री समझौते के तहत नियमों को सख्त करते हुए 6 मार्च 2026 से 31 मार्च 2026 तक सभी सिरामिक इकाइयों को मिलने वाली गैस में 50% की कटौती कर रखी थी.
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गुजरात के उद्योगों पर मध्य पूर्व संकट का प्रभाव
गुजरात गैस लिमिटेड ने मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण राज्य के उद्योगों को गैस आपूर्ति में 50% से अधिक की कटौती की है।
मोरबी सिरामिक एसोसिएशन ने सर्वसम्मति से लॉकडाउन का फैसला किया है, जिससे लगभग 30,000 मजदूर बेरोजगार हो गए हैं।
सूरत में लगभग 350-400 कपड़ा प्रसंस्करण इकाइयाँ प्राकृतिक गैस पर निर्भर हैं, जहाँ ईंधन महंगा होने से 'जॉब वर्क' की लागत ₹2 से ₹4 प्रति मीटर बढ़ गई है।
अन्य प्रमुख प्रभाव
निर्यातकों को शिपिंग कंपनियों द्वारा वसूले जा रहे वॉर रिस्क सरचार्ज के कारण ₹250 से ₹500 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा है।
दुनिया के दूसरे सबसे बड़े सिरामिक क्लस्टर मोरबी पर इस अंतरराष्ट्रीय संकट का सबसे बुरा असर पड़ा है. मंगलवार को हुई मोरबी सिरामिक एसोसिएशन की एक अहम बैठक में सर्वसम्मति से लॉकडाउन का फैसला लिया गया है. आपको बता दें कि गुजरात गैस ने पहले ही गैस बिक्री समझौते के तहत नियमों को सख्त करते हुए 6 मार्च 2026 से 31 मार्च 2026 तक सभी सिरामिक इकाइयों को मिलने वाली गैस में 50% की कटौती कर रखी थी. जिन ग्राहकों के पास मिनिमम गारंटीड ऑफटेक (Non-MGO) अनुबंध नहीं है, उनका दैनिक कोटा 6 मार्च से शून्य (Zero) कर दिया गया है.
ऐसे में कई फैक्टरी पहले ही बंद हो चुकी हैं और कल ही किए गए लॉकडाउन के चलते एक अनुमान के मुताबिक 30 हजार के करीब मजदूर बेरोजगार हो गए जिनके पास अपने वतन लौटने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचा और इसीलिए उन्होंने पलायन शुरू कर दिया है.
कुछ ऐसा ही हाल सूरत के वीविंग और गुजरात की केमिकल इंडस्ट्रीज का है. जहां गैस सप्लाई बाधित होने से उत्पादन पूरी तरह से चरमरा गया है.
सूरत का कपड़ा उद्योग अपनी भट्टियों (Boilers) और स्टेंटर मशीनों को चलाने के लिए मुख्य रूप से Natural Gas पर निर्भर है. सूरत में लगभग 350-400 टेक्सटाइल प्रोसेसिंग यूनिट्स हैं. ईंधन महंगा होने के कारण कपड़ों की 'जॉब वर्क'की लागत ₹2 से ₹4 प्रति मीटर बढ़ गई है.
कपड़ा मिलों में शिफ्ट कम होने के कारण लाखों प्रवासी श्रमिकों की आय पर असर पड़ा है. गैस कम है तो उत्पादन कम हो रहा है. मजदूरों की जरूरत भी कम हो गई है. ऐसे में हजारों अस्थाई मजदूर काम न मिलने से अपने गांव लौट रहे हैं. जिसके चलते रेलवे स्टेशन पर लंबी-लंबी कतार देखी जा रही है.
केमिकल इंडस्ट्रीज की बात करें तो गुजरात भर में 1,000 से ज्यादा केमिकल इंडस्ट्रीज हैं जो अपने बॉयलर ऑपरेट करने के लिए गैस पर निर्भर करते हैं. उन्हें अब दिन में सिर्फ 40 फीसदी से भी कम सप्लाई दी जा रही है. अगर उससे ज्यादा गैस को इस्तेमाल करते हैं तो 2 से 3 गुना ज्यादा लागत वसूली जा रही है.
अवनी डाईकेम के मालिक योगेश भाई के मुताबिक अगर वह काम अधूरा छोड़ते हैं तो उनका माल बर्बाद होता है और अगर काम पूरा करते हैं तो उन्हें ज्यादा गैस इस्तेमाल करना पड़ता है जिसकी वजह से उन्हें गैस का बिल कितना भरना पड़ रहा है ऐसे में कुछ समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या करें.
परेशानी सिर्फ फैक्ट्री तक ही सिमित नहीं है. किसी तरह से प्रोडक्शन हो गया तो अब उसे निर्यात करने वाले एक्सपोर्टर वॉर रिस्क सरचार्ज से परेशान है. निर्यातकों के लिए शिपिंग कम्पनी द्वारा वसूला जा रहा वॉर सरचार्ज एक बड़ी मुश्किल बन गई है जिसके चलते एक्सपोर्टर्स और फ्रेट फॉरवर्ड को ढाई सौ से पांच सौ करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा है.
गुजरात से निर्यात होने वाले सिर्फ मसालों के ३ हजार के करीब टैंकर गुजरात के अलग-अलग बंदरगाहों पर कई दिन से पड़े हुए हैं. जानकारी के मुताबिक गुजरात के ६ से ७ जहाजों में निर्यात के लिए १२ हजार से ज्यादा कंटेनर को ढाई सौ से ५०० करोड़ की वॉर रिस्क सरचार्ज की भरपाई करनी पड़ेगी.
इन बड़े उद्योगों के साथ-साथ कमर्शियल गैस इस्तेमाल करने वाले छोटे मोटे उद्योग की भी कमर टूटती जा रही है. कई होटल मेस ने चूल्हा जला लिया है तो कई लोग इलेक्ट्रिक इंडक्शन इस्तेमाल करने लगे हैं.
तनाव के बावजूद भारत के बंदरगाह पहुंचे भारतीय गैस टैंकर
मिडल ईस्ट में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच गहराते युद्ध के बादलों ने अब गुजरात की अर्थव्यवस्था और उद्योगों पर सीधा प्रहार करना शुरू कर दिया है. कच्चे तेल और गैस की वैश्विक सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित होने के कारण, गुजरात गैस लिमिटेड (GGL) ने राज्य के उद्योगों के लिए गैस आपूर्ति में 50% से भी ज्यादा तक की कटौती करने का कड़ा फैसला लिया है. ऐसे में Strait of Hormuz के बंद होने के कारण उत्पादन और परिवहन ठप हो गया है. भारत के चार जहाज इस परिस्थिति में भी गैस लेकर इस रूट से भारत के बंदरगाहों पर पहुंचे हैं, लेकिन इससे सिर्फ घरेलू गैस में थोड़ी राहत मिलने की उम्मीद है. लेकिन औद्योगिक इकाइयों की हालत दिन पर दिन खराब हो रही है.
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मिडिल ईस्ट में तनाव लंबे समय तक बना रहा, तो गैस की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है और औद्योगिक उत्पादन पर दबाव और बढ़ेगा. कुल मिलाकर मिडिल ईस्ट के बढ़ते तनाव ने गुजरात के उद्योगों को बदहाली के कगार पर ला दिया है.
दुनिया के दूसरे सबसे बड़े सिरामिक क्लस्टर मोरबी पर इस अंतरराष्ट्रीय संकट का सबसे बुरा असर पड़ा है. मंगलवार को हुई मोरबी सिरामिक एसोसिएशन की एक अहम बैठक में सर्वसम्मति से लॉकडाउन का फैसला लिया गया है. आपको बता दें कि गुजरात गैस ने पहले ही गैस बिक्री समझौते के तहत नियमों को सख्त करते हुए 6 मार्च 2026 से 31 मार्च 2026 तक सभी सिरामिक इकाइयों को मिलने वाली गैस में 50% की कटौती कर रखी थी. जिन ग्राहकों के पास मिनिमम गारंटीड ऑफटेक (Non-MGO) अनुबंध नहीं है, उनका दैनिक कोटा 6 मार्च से शून्य (Zero) कर दिया गया है.
ऐसे में कई फैक्टरी पहले ही बंद हो चुकी हैं और कल ही किए गए लॉकडाउन के चलते एक अनुमान के मुताबिक 30 हजार के करीब मजदूर बेरोजगार हो गए जिनके पास अपने वतन लौटने के सिवाय कोई रास्ता नहीं बचा और इसीलिए उन्होंने पलायन शुरू कर दिया है.
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कुछ ऐसा ही हाल सूरत के वीविंग और गुजरात की केमिकल इंडस्ट्रीज का है. जहां गैस सप्लाई बाधित होने से उत्पादन पूरी तरह से चरमरा गया है.
सूरत का कपड़ा उद्योग अपनी भट्टियों (Boilers) और स्टेंटर मशीनों को चलाने के लिए मुख्य रूप से Natural Gas पर निर्भर है. सूरत में लगभग 350-400 टेक्सटाइल प्रोसेसिंग यूनिट्स हैं. ईंधन महंगा होने के कारण कपड़ों की ‘जॉब वर्क’की लागत ₹2 से ₹4 प्रति मीटर बढ़ गई है.
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कपड़ा मिलों में शिफ्ट कम होने के कारण लाखों प्रवासी श्रमिकों की आय पर असर पड़ा है. गैस कम है तो उत्पादन कम हो रहा है. मजदूरों की जरूरत भी कम हो गई है. ऐसे में हजारों अस्थाई मजदूर काम न मिलने से अपने गांव लौट रहे हैं. जिसके चलते रेलवे स्टेशन पर लंबी-लंबी कतार देखी जा रही है.
केमिकल इंडस्ट्रीज की बात करें तो गुजरात भर में 1,000 से ज्यादा केमिकल इंडस्ट्रीज हैं जो अपने बॉयलर ऑपरेट करने के लिए गैस पर निर्भर करते हैं. उन्हें अब दिन में सिर्फ 40 फीसदी से भी कम सप्लाई दी जा रही है. अगर उससे ज्यादा गैस को इस्तेमाल करते हैं तो 2 से 3 गुना ज्यादा लागत वसूली जा रही है.
अवनी डाईकेम के मालिक योगेश भाई के मुताबिक अगर वह काम अधूरा छोड़ते हैं तो उनका माल बर्बाद होता है और अगर काम पूरा करते हैं तो उन्हें ज्यादा गैस इस्तेमाल करना पड़ता है जिसकी वजह से उन्हें गैस का बिल कितना भरना पड़ रहा है ऐसे में कुछ समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या करें.
परेशानी सिर्फ फैक्ट्री तक ही सिमित नहीं है. किसी तरह से प्रोडक्शन हो गया तो अब उसे निर्यात करने वाले एक्सपोर्टर वॉर रिस्क सरचार्ज से परेशान है. निर्यातकों के लिए शिपिंग कम्पनी द्वारा वसूला जा रहा वॉर सरचार्ज एक बड़ी मुश्किल बन गई है जिसके चलते एक्सपोर्टर्स और फ्रेट फॉरवर्ड को ढाई सौ से पांच सौ करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा है.
गुजरात से निर्यात होने वाले सिर्फ मसालों के ३ हजार के करीब टैंकर गुजरात के अलग-अलग बंदरगाहों पर कई दिन से पड़े हुए हैं. जानकारी के मुताबिक गुजरात के ६ से ७ जहाजों में निर्यात के लिए १२ हजार से ज्यादा कंटेनर को ढाई सौ से ५०० करोड़ की वॉर रिस्क सरचार्ज की भरपाई करनी पड़ेगी.
इन बड़े उद्योगों के साथ-साथ कमर्शियल गैस इस्तेमाल करने वाले छोटे मोटे उद्योग की भी कमर टूटती जा रही है. कई होटल मेस ने चूल्हा जला लिया है तो कई लोग इलेक्ट्रिक इंडक्शन इस्तेमाल करने लगे हैं.
तनाव के बावजूद भारत के बंदरगाह पहुंचे भारतीय गैस टैंकर
मिडल ईस्ट में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच गहराते युद्ध के बादलों ने अब गुजरात की अर्थव्यवस्था और उद्योगों पर सीधा प्रहार करना शुरू कर दिया है. कच्चे तेल और गैस की वैश्विक सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित होने के कारण, गुजरात गैस लिमिटेड (GGL) ने राज्य के उद्योगों के लिए गैस आपूर्ति में 50% से भी ज्यादा तक की कटौती करने का कड़ा फैसला लिया है. ऐसे में Strait of Hormuz के बंद होने के कारण उत्पादन और परिवहन ठप हो गया है. भारत के चार जहाज इस परिस्थिति में भी गैस लेकर इस रूट से भारत के बंदरगाहों पर पहुंचे हैं, लेकिन इससे सिर्फ घरेलू गैस में थोड़ी राहत मिलने की उम्मीद है. लेकिन औद्योगिक इकाइयों की हालत दिन पर दिन खराब हो रही है.
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मिडिल ईस्ट में तनाव लंबे समय तक बना रहा, तो गैस की कीमतों में और बढ़ोतरी हो सकती है और औद्योगिक उत्पादन पर दबाव और बढ़ेगा. कुल मिलाकर मिडिल ईस्ट के बढ़ते तनाव ने गुजरात के उद्योगों को बदहाली के कगार पर ला दिया है.