गुजरात में बच्चों के पोषण को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. एक ओर सरकार 'कुपोषण मुक्त गुजरात' का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर हकीकत यह है कि लाखों स्कूली बच्चों के भोजन में कटौती की जा रही है और बड़ी संख्या में बच्चे अब भी कुपोषण का शिकार हैं.
राज्य की 32 हजार से ज्यादा सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले करीब 38 लाख छात्रों को मिलने वाले पोषक नाश्ते में कटौती कर दी गई है. जानकारी के अनुसार, पहले जहां बच्चों को लगभग 50 ग्राम नाश्ता दिया जाता था, वहीं अब इसे घटाकर औसतन करीब 38 से 46 ग्राम कर दिया गया है. यह कटौती ऐसे समय में की गई है जब राज्य में लगभग 2 लाख बच्चे अब भी कुपोषित बताए जा रहे हैं, जो सरकार की योजनाओं पर सवाल खड़े करता है.
वर्ष 2024 में शुरू की गई ‘मुख्यमंत्री पोषण अल्पाहार योजना’ का उद्देश्य बच्चों को कुपोषण से बचाना था. इसके तहत कक्षा 8 तक के छात्रों को मिड-डे मील के अलावा सुबह पोषक नाश्ता देने की व्यवस्था की गई थी. लेकिन इस योजना के लिए प्रति छात्र केवल ₹5 का बजट तय किया गया, जिसमें अब तक कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है, जबकि महंगाई लगातार बढ़ रही है.
रिपोर्ट के अनुसार, कई जगहों पर एनजीओ के माध्यम से भोजन पहुंचाया जा रहा है, लेकिन यह भोजन बच्चों तक पहुंचते-पहुंचते ठंडा हो जाता है. वहीं स्थानीय स्तर पर खाना बनाने वालों को अपेक्षाकृत कम भुगतान मिलने की बात भी सामने आई है. पहले बच्चों को सप्ताह में एक दिन ‘सुखड़ी’ दी जाती थी, जो पोषण के लिहाज से अहम मानी जाती थी. इस योजना पर करीब 30 करोड़ रुपये खर्च किए जाते थे, लेकिन अब इसे बंद कर दिया गया है.
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नाश्ते की मात्रा कम होने से कक्षा 5 से 7 तक के बड़े बच्चों के लिए यह भोजन अपर्याप्त माना जा रहा है. कई मामलों में बच्चों को सिर्फ एक चम्मच चाट या कुछ टुकड़े ही मिल पा रहे हैं. मिड-डे मील से जुड़े कर्मचारी संगठनों ने सरकार से मांग की है कि प्रति छात्र नाश्ते की राशि ₹5 से बढ़ाकर कम से कम ₹7 की जाए, ताकि बच्चों को पर्याप्त और पौष्टिक भोजन मिल सके.
गुजरात में बच्चों के पोषण को लेकर यह स्थिति चिंताजनक है. एक तरफ सरकारी कार्यक्रमों में महंगे भोज पर खर्च हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ बच्चों के भोजन में कटौती से उनकी सेहत पर खतरा मंडरा रहा है. ऐसे में सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं.
यह भी पढ़ें;‘विकास के नाम पर बीजेपी ने छीनी जमीन’, राहुल गांधी ने आदिवासी अधिकार सम्मेलन में बोला
गुजरात में बच्चों के पोषण को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. एक ओर सरकार ‘कुपोषण मुक्त गुजरात’ का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर हकीकत यह है कि लाखों स्कूली बच्चों के भोजन में कटौती की जा रही है और बड़ी संख्या में बच्चे अब भी कुपोषण का शिकार हैं.
राज्य की 32 हजार से ज्यादा सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले करीब 38 लाख छात्रों को मिलने वाले पोषक नाश्ते में कटौती कर दी गई है. जानकारी के अनुसार, पहले जहां बच्चों को लगभग 50 ग्राम नाश्ता दिया जाता था, वहीं अब इसे घटाकर औसतन करीब 38 से 46 ग्राम कर दिया गया है. यह कटौती ऐसे समय में की गई है जब राज्य में लगभग 2 लाख बच्चे अब भी कुपोषित बताए जा रहे हैं, जो सरकार की योजनाओं पर सवाल खड़े करता है.
वर्ष 2024 में शुरू की गई ‘मुख्यमंत्री पोषण अल्पाहार योजना’ का उद्देश्य बच्चों को कुपोषण से बचाना था. इसके तहत कक्षा 8 तक के छात्रों को मिड-डे मील के अलावा सुबह पोषक नाश्ता देने की व्यवस्था की गई थी. लेकिन इस योजना के लिए प्रति छात्र केवल ₹5 का बजट तय किया गया, जिसमें अब तक कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है, जबकि महंगाई लगातार बढ़ रही है.
रिपोर्ट के अनुसार, कई जगहों पर एनजीओ के माध्यम से भोजन पहुंचाया जा रहा है, लेकिन यह भोजन बच्चों तक पहुंचते-पहुंचते ठंडा हो जाता है. वहीं स्थानीय स्तर पर खाना बनाने वालों को अपेक्षाकृत कम भुगतान मिलने की बात भी सामने आई है. पहले बच्चों को सप्ताह में एक दिन ‘सुखड़ी’ दी जाती थी, जो पोषण के लिहाज से अहम मानी जाती थी. इस योजना पर करीब 30 करोड़ रुपये खर्च किए जाते थे, लेकिन अब इसे बंद कर दिया गया है.
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गुजरात में बच्चों के पोषण को लेकर यह स्थिति चिंताजनक है. एक तरफ सरकारी कार्यक्रमों में महंगे भोज पर खर्च हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ बच्चों के भोजन में कटौती से उनकी सेहत पर खतरा मंडरा रहा है. ऐसे में सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं.
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