कैसे होती है स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा? जहां वोटिंग के बाद रखी जाती है EVM, इस तरह की जाती है मिनट-टू-मिनट मॉनिटरिंग

बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग खत्म होने के बाद 6 नवंबर की शाम को भारी सुरक्षा के बीच EVM मशीनों को स्ट्रॉन्ग रूम में रखा गया है. वहीं, 11 नवंबर को दूसरे और ऑखिरी चरण की वोटिंग होनी है. इसके बाद 14 नवंबर को मतदान की गिनती शुरू होगी.

what is Strong Room
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बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग खत्म होने के बाद 6 नवंबर की शाम को भारी सुरक्षा के बीच EVM मशीनों को स्ट्रॉन्ग रूम में रखा गया है. वहीं, 11 नवंबर को दूसरे और ऑखिरी चरण की वोटिंग होनी है. इसके बाद 14 नवंबर को मतदान की गिनती शुरू होगी.

बता दें कि सारे EVM यानी इलेक्‍ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें मतगणना के दिन सुबह-सुबह तय समयानुसार खोली जाती है और काउंटिंग शुरू होती है. काउंटिंग पूरी होने के बाद चुनाव परिणाम सामने आता है. तब तक के लिए सारी मशीनों की कड़ी मॉनिटरिंग होती है, ताकि उनसे छेड़छाड़ न की जा सके. लेकिन पहले चरण की वोटिंग के बाद सारण में एक वीडियो वायरल होने के बाद EVM की सुरक्षा को लेकर तेजस्वी यादव ने सवाल उठाए हैं.

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आपने अक्सर देखा होगा कि चुनाव में किसी न किसी पार्टी द्वारा EVM की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए जाते हैं. जिसके बाद सभी के मन में ये सवाल आता है कि क्या EVM के साथ छेड़छाड़ संभव है? जब मतदान केंद्रों पर गड़बड़ी के खबरें सामने आती हैं तो लोगों का ध्यान स्ट्रॉन्ग रूम की ओर जाता है. वो जगह देश के भविष्य का फैसला बंद ताले में होता है. आपको बता दें कि स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा इतनी कड़ी होती है कि वहां एक परिंदा भी पर नहीं मार सकता है.

स्ट्रॉन्ग रूम क्या होता है?

स्ट्रॉन्ग रूम एक तरह का कमरा होता है जिसमें मतदान के बाद EVM मशीनें रखी जाती हैं. इस कमरे में एक ही दरवाजा होता है जिससे कोई अंदर और बाहर आता-जाता है. अगर इस कमरे में कोई खिड़की होती है तो उसे लोहे की सलाखों से बंद कर दिया जाता है. चुनाव के बाद EVM मशीनें रखने के लिए इस कमरे को अक्सर किसी सरकारी इमारत में ही बनाया जाता है, जैसे- कॉलेज, सरकारी दफ्तर या किसी सुरक्षित पुलिस स्टेशन में. चुनाव आयोग यह सुनिश्चित करता है कि इस कमरे की सुरक्षा मानकों का पूरा ध्यान रखा जाए और सभी नियमों का पालन हो.

EVM मशीनों को स्ट्रॉन्ग रूम तक कैसे ले जाया जाता है?

जब मतदान समाप्त हो जाता है तो EVM मशीनों को भारी घेरे सुरक्षा में स्ट्रॉन्ग रूम तक ले जाया जाता है. इस दौरान पूरे रास्ते की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की जाती है. इस दौरान चुनाव अधिकारियों के अलावा अन्य पार्टियों के जनप्रतिनिधि भी मौजूद रहते हैं. EVM मशीनों को स्ट्रॉन्ग रूम में रखने के बाद उस कमरे को सील कर दिया जाता है और फिर किसी को भी इस कमरे में जाने की इजाजत नहीं होती है.

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कैसे की जाती है स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा?

स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा किसी आम जगहों जैसी बिल्कुल भी नहीं होती है. यहां चार लेयर की सिक्योरिटी होती है.

पहला और दूसरा स्तर- अर्धसैनिक बलों की निगरानी में होता है.

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तीसरा स्तर- तीसरे लेवल पर स्थानीय पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी होती है कि कमरे के आस पास भी कोई न भटक सके.

चौथा स्तर- राजनीतिक दलों के जन प्रतिनिधि भी मौजूद रहते हैं जो दिन रात पहरा देते हैं.

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सीसीटीवी से भी रखते हैं नजर

स्ट्रॉन्ग रूम के अंदर और बाहर CCTV कैमरे लगे होते हैं. इन कैमरों की फुटेज का सीधा प्रसारण जिला नियंत्रण कक्ष तक होता है. इतनी ही नहीं, कई जगहों पर राजनीतिक दलों को भी लाइव मॉनिटरिंग की सुविधा दी जाती है. जिससे पारदर्शिता बनी रहे और कोई भी सुरक्षा को लेकर सवाल न उठा सके.

स्ट्रॉन्ग रूम के अंदर कौन कर सकता है एंट्री?

मतगणना से पहले स्ट्रॉन्ग रूम के दरवाजे किसी के लिए भी नहीं खोले जाते हैं. मान लीजिए कि किसी पार्टी को गड़बड़ी का कोई संदेह होता है तो उसे लिखित में शिकायत के साथ-साथ सबूत भी देने होते हैं और आवेदन करना होता है. इसके बाद जिला अधिकारी, चुनाव अधिकारी और सभी दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में स्ट्रॉन्ग रूम खोला जाता है और जांच करने के बाद फिर से सील कर दिया जाता है.

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