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Kailash Mandir: आगरा के इस मंदिर में जुड़वा शिवलिंग की होती है पूजा, भगवान परशुराम से जुड़ी है मान्यता

Kailashpati Mahadev Mandir: देशभर में भगवान शिव को समर्पित कई प्राचीन मंदिर मौजूद हैं, जिनका अपना ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व है। आज हम आपको आगरा स्थित एक ऐसे प्राचीन मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां एक नहीं बल्कि दो शिवलिंग स्थापित हैं। कहा जाता है कि इन शिवलिंग की स्थापना भगवान परशुराम और उनके पिता ऋषि जमदग्नि ने की थी।

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Kailashpati Mahadev Mandir: भगवान शिव को संहार और परिवर्तन का देवता माना जाता है, जिनकी पूजा लिंग और मूर्ति के रूप में की जाती है। लिंग यानी शिवलिंग, जो भगवान शिव का निराकार रूप है। जबकि मूर्ति रूप में शिव जी के विभिन्न स्वरूपों जैसे कि महादेव, भोले बाबा और रुद्र की पूजा होती है। देश में भगवान शिव के लिंग और मूर्ति रूप के अनगिनत मंदिर हैं, जिनका अपना महत्व और मान्यता है।

उत्तर प्रदेश के आगरा में भी भगवान शिव के कई प्राचीन मंदिर स्थित हैं, जहां दर्शन करने के लिए देश के कोने-कोने से भक्तजन आते हैं। आगरा के सिकंदरा क्षेत्र के कैलाश गांव में यमुना नदी के किनारे कैलाशपति महादेव मंदिर स्थित है, जिसे कैलाश महादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। आज हम आपको इसी मंदिर से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में बताने जा रहे हैं।

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आगरा में स्थापित है जुड़वा शिवलिंग

News24 से बातचीत करते हुए कैलाशपति महादेव मंदिर के महंत निर्मल गिरी ने बताया कि आज से करीब दस हजार वर्ष पहले इस मंदिर की स्थापना की गई थी। इस मंदिर में जुड़वा शिवलिंग स्थित हैं। भगवान परशुराम और उनके पिता ऋषि जमदग्नि के द्वारा इन दोनों शिवलिंग की स्थापना की गई थी। बता दें कि त्रेता युग में भगवान विष्णु ने परशुराम जी के रूप में एक ब्राह्मण ऋषि के यहां जन्म लिया था। परशुराम जी भगवान विष्णु के छठवें अवतार हैं।

Nirmal Giri

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महादेव को खुश करने के लिए की थी कड़ी तपस्या

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार त्रेता युग में भगवान परशुराम और उनके पिता ऋषि जमदग्नि कैलाश पर्वत पर भगवान शिव को खुश करने के लिए कड़ी तपस्या कर रहे थे। पिता-पुत्र की भक्ति से खुश होकर महादेव ने उनसे वरदान मांगने को कहा। परशुराम और उनके पिता ने शिव जी से वरदान मांगा कि वो उनके साथ चलें और हमेशा उनके साथ ही रहें। इस पर महादेव ने कहा ‘मैं कैलाश पर्वत के कण-कण में विराजमान हूं और उनके हाथों में कैलाश की रज के कण से बने एक-एक शिवलिंग थमा दिए।’

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बीच रास्ते में ही करनी पड़ी स्थापना

दोनों शिवलिंग को लेकर भगवान परशुराम और उनके पिता अपने घर के लिए रवाना हो गए। लेकिन घर पहुंचने से पहले ही रात हो गई, जिस कारण बीच रास्ते में ही उन्होंने यमुना किनारे विश्राम करने का फैसला किया और शिवलिंग को जमीन पर रख दिया। विश्राम करने के बाद जब परशुराम और उनके पिता ने शिवलिंग को उठाने का प्रयास किया तो वो शिवलिंग को उठा नहीं पा रहे थे। फिर उन्होंने फैसला किया कि वो वहीं पर शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा कर देते हैं।

दर्शन मात्र से पूरी होती हैं मनोकामनाएं

पिता और पुत्र ने शिवलिंग की पूजा की और उस जगह का नाम कैलाश रख दिया। कुछ समय के बाद शिवलिंग के चारों तरफ दीवार बनाई गई और उसे मंदिर का स्वरूप दिया गया। हालांकि अब ये एक तीर्थ स्थल बन गया है। मंदिर के आसपास 200 से 250 धर्मशालाएं हैं, जहां सालभर अच्छी खासी भीड़ देखने को मिलती है।

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इसके अलावा हर साल श्रावण मास के तीसरे सोमवार को आगरा में मेला भी होता है, जिसे कैलाश मेले के नाम से जाना जाता है। कैलाशपति महादेव मंदिर के महंत निर्मल गिरी ने बताया कि इस दिन हर साल आगरा में सरकारी छुट्टी होती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो भी भक्त सच्चे मन से इन दोनों शिवलिंग की पूजा करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में आ रहे संकट टल जाते हैं।

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है।

First published on: Jul 15, 2025 05:12 PM

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