आखिर काले ही क्यों होते हैं गाड़ियों के टायर? रोज चलाने पर भी नहीं जानते होंगे वजह

क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया की हर कार और बाइक के टायर काले ही क्यों होते हैं? इसके पीछे सिर्फ स्टाइल नहीं बल्कि मजबूत साइंस और आपकी सेफ्टी छिपी है. जानते हैं इसकी वजह.

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सड़क पर दौड़ती लगभग हर कार और बाइक में काले रंग के टायर दिखाई देते हैं. ज्यादातर लोगों को लगता है कि यह सिर्फ स्टाइल या डिजाइन के लिए होता है, लेकिन इसके पीछे मजबूत वैज्ञानिक वजह छिपी हुई है. टायर का काला रंग सीधे उसकी मजबूती और सुरक्षा से जुड़ा है.

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पहले सफेद रंग के होते थे टायर

पहले सफेद रंग के होते थे टायर2 / 8

जब शुरुआती दौर में टायर बनाए जाते थे, तब उनमें नेचुरल रबर का इस्तेमाल होता था. उस समय टायरों का रंग सफेद या हल्का भूरा दिखाई देता था. हालांकि, ये टायर ज्यादा मजबूत नहीं होते थे और जल्दी घिस जाते थे. पुराने जमाने के रबर टायर सड़क की तेज गर्मी और भारी वजन को लंबे समय तक सहन नहीं कर पाते थे. ज्यादा इस्तेमाल के बाद उनमें जल्दी दरारें आने लगती थीं और उनकी लाइफ भी कम होती थी.

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कार्बन ब्लैक देता है टायर को काला रंग

कार्बन ब्लैक देता है टायर को काला रंग3 / 8

समय के साथ टायर बनाने की तकनीक में कई बदलाव किए गए. इसी दौरान रबर में एक खास मटेरियल मिलाना शुरू किया गया, जिसने टायरों की मजबूती और टिकाऊपन को काफी बढ़ा दिया. टायर बनाने के दौरान रबर में कार्बन ब्लैक नाम का खास पाउडर मिलाया जाता है. यही मटेरियल टायर को काला रंग देता है. लेकिन इसका काम सिर्फ रंग बदलना नहीं, बल्कि टायर को ज्यादा मजबूत बनाना भी है.

जल्दी घिसने से बचाता है कार्बन ब्लैक

जल्दी घिसने से बचाता है कार्बन ब्लैक4 / 8

कार्बन ब्लैक टायर को लंबे समय तक टिकाऊ बनाए रखने में मदद करता है. इससे टायर जल्दी घिसते नहीं हैं और सड़क पर उनकी परफॉर्मेंस बेहतर बनी रहती है. यही वजह है कि आज लगभग हर टायर में इसका इस्तेमाल किया जाता है. ये भी पढे़ं- हाफ या फुल फेस हेलमेट, सड़क पर कौन बचाएगा आपकी जान?

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तेज गर्मी में भी रहता है सुरक्षित

तेज गर्मी में भी रहता है सुरक्षित5 / 8

गर्म सड़क और तेज धूप का असर टायरों पर सबसे ज्यादा पड़ता है. कार्बन ब्लैक टायर को ज्यादा गर्म होने से बचाता है. अगर यह मटेरियल इस्तेमाल न किया जाए, तो रबर जल्दी कमजोर होकर फट सकता है.

ड्राइविंग सेफ्टी में निभाता है अहम रोल

ड्राइविंग सेफ्टी में निभाता है अहम रोल6 / 8

काले टायर सिर्फ मजबूत ही नहीं होते, बल्कि सड़क पर बेहतर ग्रिप भी देते हैं. इससे ब्रेक लगाने के दौरान गाड़ी आसानी से कंट्रोल में रहती है और फिसलने का खतरा कम हो जाता है. ये भी पढ़ें-  45°C की गर्मी में बाइक टायर में कितनी हवा सही? जान लें वरना पड़ सकता है भारी

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तेज रफ्तार में भी कम होता है फटने का खतरा

तेज रफ्तार में भी कम होता है फटने का खतरा7 / 8

कार्बन ब्लैक की वजह से टायर ज्यादा गर्म नहीं होते, जिससे हाई स्पीड पर टायर फटने की संभावना कम हो जाती है. यही कारण है कि छोटी कारों से लेकर रेसिंग कारों तक में काले टायर ही इस्तेमाल किए जाते हैं.

रंगीन टायर क्यों नहीं हो पाए सफल?

रंगीन टायर क्यों नहीं हो पाए सफल?8 / 8

कुछ कंपनियों ने अलग-अलग रंगों के टायर बनाने की कोशिश की थी, लेकिन वे मजबूती और टिकाऊपन के मामले में सफल नहीं रहे. यही वजह है कि आज भी काले टायर सबसे भरोसेमंद और सुरक्षित माने जाते हैं. (Image Credit- AI and Freepik)

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लेखक के बारे में

Mikita Acharya

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मिकिता आचार्य News24 में ऑटो एंड टेक राइटर हैं. पत्रकारिता में उन्हें 6 साल से ज्यादा का अनुभव है. मूल रूप से मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले की रहने वाली मिकिता ने इंदौर के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के स्कूल और जर्नलिज्म एंड मास कम्यनिकेशन (SJMC, DAVV) से मास्टर्स इन जर्नलिज्म किया है. वहीं श्री वैष्णव इंस्टीट्यूट से इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, इंदौर से बीएससी की डिग्री ली है. अपने करियर की शुरुआत मिकिता ने 2019 में ईटीवी भारत, हैदराबाद से की, जहां उन्होंने कई ऑटो, टेक के अलावा न्यूज के लिए कॉटेंट लिखा. इसके बाद दैनिक भास्कर सब-एडिटर के तौर पर उन्होंने न्यूज के साथ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म के लिए भी काम किया. साइंस बैकग्राउंड होने की वजह से ऑटोमोबाइल और टेक्नोलॉजी से जुड़ी खबरें लिखने में मिकिता की गहरी रूचि है. News24 में इस पद पर रहते हुए वे ऑटो और टेक्नोलॉजी से जुड़ी प्रोडक्ट लॉन्च, इंडस्ट्री ट्रेंड्स और रिव्यूज पर रोजाना लेख लिख रही हैं. मिकिता ने ऑटो और टेक से जुड़े कई बड़े इवेंट में ग्राउंड रिपोर्टिंग भी की है. वह ऑटो और टेक इंडस्ट्री से जुड़े एक्सपर्ट्स के संपर्क में रहती हैं. कितने साल का अनुभव: 6+ योग्यता : SJMC, DAVV से जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स श्री वैष्णव इंस्टीट्यूट से इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी में बीएससी पिछला अनुभव: दैनिक भास्कर, ETV भारत
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