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मार्क्सवाद और नक्सलबाड़ी से लेकर सशस्त्र क्रांति तक… भारत में कैसे शुरू हुआ नक्सलवाद

1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी इलाके में किसानों का एक आंदोलन हिंसक संघर्ष में बदल गया. जमीन और किसानों के अधिकार का सवाल इसके केंद्र में था. पढ़ें, ललित सिहाग के 'दिमागी नक्सली' पर तीन भाग की सीरीज का पार्ट - 2

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भाग -2 (भाग-1 यहां पढ़ें) हम एक सवाल पर रुके हैं कि अगर बंदूक दिखाई देती है, लेकिन उसके पीछे का विचार दिखाई नहीं देता, तो क्या नक्सलवाद की असली कहानी बंदूक से शुरू होती है या विचार से? इस सवाल का जवाब पाने के लिए हमें आज के जंगलों से थोड़ा पीछे जाना चाहिए जिस समय में, जब नक्सलबाड़ी नाम शायद भारत के अधिकांश लोगों ने सुना भी नहीं था और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में समाज, सत्ता और क्रांति को लेकर नए विचार जन्म ले रहे थे.

नक्सलवाद को समझने के लिए सबसे पहले उस विचार को समझना जरूरी है, जिसने दुनिया के कई हिस्सों में यह सवाल खड़ा किया कि समाज जैसा है, क्या उसे वैसा ही रहना चाहिए? अगर समाज में अमीर और गरीब के बीच बहुत बड़ा अंतर है, अगर मेहनत करने वाला व्यक्ति लगातार पीछे रह जाता है और संपत्ति तथा सत्ता कुछ लोगों के हाथ में केंद्रित होती जाती है, तो क्या केवल व्यवस्था के भीतर छोटे बदलाव काफी हैं या पूरी व्यवस्था को बदलने की जरूरत है? उन्नीसवीं सदी में कार्ल मार्क्स ने इन्हीं सवालों को एक व्यापक वैचारिक ढांचे में समझने की कोशिश की. उनके लिए इतिहास केवल राजाओं और युद्धों की कहानी नहीं था बल्कि समाज के भीतर आर्थिक संबंध, उत्पादन के साधन और अलग-अलग वर्गों के बीच संघर्ष भी इतिहास को आगे बढ़ाते हैं और यही मार्क्सवादी विचार आगे चलकर दुनिया की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक विचारधाराओं में से एक बना.

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लेकिन विचार किताबों में जितना आसान दिखाई देता है, राजनीति में उतरते ही कठिन हो जाता है. मार्क्स ने जिस सामाजिक परिवर्तन की कल्पना की थी, उसे राजनीतिक क्रांति का रास्ता देने वालों में व्लादिमीर लेनिन का नाम सबसे महत्वपूर्ण है. 1917 की रूसी क्रांति ने दुनिया को यह दिखाया कि कोई विचार सिर्फ विश्वविद्यालयों, किताबों या बहसों तक सीमित नहीं रहता. वह संगठन बना सकता है, राजनीतिक आंदोलन पैदा कर सकता है और अंततः सत्ता की संरचना को चुनौती दे सकता है. यहां एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है कि क्रांति पहले विचार में पैदा होती है और फिर वह अपने लिए रास्ता तलाशती है.

रूस का रास्ता चीन में बिल्कुल उसी तरह नहीं दोहराया गया. माओत्से तुंग ने चीन की परिस्थितियों को देखते हुए क्रांति का अपना मॉडल विकसित किया. चीन एक विशाल ग्रामीण समाज था जहां किसान आबादी बहुत बड़ी थी इसलिए माओ ने क्रांति के लिए किसानों को संगठित करने और ग्रामीण क्षेत्रों से सत्ता को चुनौती देने की रणनीति विकसित की. गुरिल्ला युद्ध इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बना जहां बंदूक एक बड़े राजनीतिक विचार की रणनीति का हिस्सा थी. जब विचार यह तय कर लेता था कि व्यवस्था को बदलना है और गुरिल्ला युद्ध उस बदलाव तक पहुंचने का एक साधन बनता था.

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यहीं से एक महत्वपूर्ण फर्क समझ में आता है कि नक्सलवाद को केवल हिंसा की कहानी मानना अधूरा है, लेकिन उसे केवल विचार की कहानी मानना भी अधूरा है. उसके भीतर विचार और हथियार का एक रिश्ता बना. माओ के चीन में यह रिश्ता एक खास ऐतिहासिक परिस्थिति में पैदा हुआ था. लेकिन जब यही क्रांतिकारी विचार भारत पहुंचा तो भारत की परिस्थितियां बिल्कुल अलग थीं.

भारत न रूस था और न चीन. यहां औपनिवेशिक शासन से निकलने के बाद एक संविधान था, चुनाव थे, संसद थी, न्यायपालिका थी और सबसे महत्वपूर्ण कि जनता को मतदान का अधिकार था लेकिन इसके साथ ही भारत में गहरी सामाजिक और आर्थिक असमानताएं भी थीं और साथ जमीन का सवाल था, जाति का सवाल था, गरीबी थी और आदिवासी समाज के सामने जमीन, जंगल और संसाधनों पर अधिकार के सवाल थे. कई इलाकों में राज्य की मौजूदगी विकास और न्याय से ज्यादा प्रशासन और दमन के रूप में महसूस होती थी यानी भारतीय लोकतंत्र के पास संस्थाएं तो थीं, लेकिन उन संस्थाओं तक हर व्यक्ति की पहुंच बराबर नहीं थी और यहीं से भारतीय नक्सलवाद की कहानी शुरू होती है.

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1967 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले के नक्सलबाड़ी इलाके में किसानों का एक आंदोलन हिंसक संघर्ष में बदल गया. जमीन और किसानों के अधिकार का सवाल इसके केंद्र में था. स्थानीय असंतोष के पीछे असली सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियां थीं लेकिन इस आंदोलन को उस समय की अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी राजनीति और माओवादी विचार से भी वैचारिक ऊर्जा मिली. यही कारण है कि नक्सलबाड़ी सिर्फ एक स्थानीय किसान संघर्ष का नाम नहीं रह गया बल्कि वह भारत में एक ऐसे राजनीतिक विचार का प्रतीक बन गया, जो मानता था कि मौजूदा व्यवस्था को मूल रूप से बदलने के लिए सशस्त्र क्रांति जरूरी है.

नक्सलबाड़ी का महत्व यही है. वहां केवल बंदूक नहीं चली थी; उसके पीछे यह विश्वास भी था कि मौजूदा राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था इतनी गहराई से अन्यायपूर्ण है कि उसे चुनाव, संसद और सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया के जरिए बदला नहीं जा सकता और यहीं से एक रास्ता अलग होता गया. एक तरफ वह रास्ता था जो कहता था कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के भीतर रहकर संघर्ष किया जाए जबकि दूसरी तरफ वह विचार था जो मानता था कि राज्य की मौजूदा संरचना को ही चुनौती देनी होगी और इसके लिए सशस्त्र संघर्ष जरूरी है.

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लेकिन यहां एक सवाल बहुत जरूरी है. क्या नक्सलवाद जिन समस्याओं से पैदा हुआ, वे समस्याएं काल्पनिक थीं? नहीं. अगर जमीन पर अन्याय था, अगर आदिवासी समुदायों को विस्थापन का सामना करना पड़ा, अगर विकास के नाम पर लोगों के अधिकार प्रभावित हुए, अगर प्रशासन गरीब और कमजोर लोगों की आवाज नहीं सुन रहा था, तो उन सवालों को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि बाद में उन्हीं सवालों के नाम पर हिंसा का रास्ता अपनाया गया.

किसी आंदोलन के जन्म की वजह और उसके रास्ते की आलोचना, दोनों एक साथ संभव हैं और यही शायद नक्सलवाद को समझने की सबसे जरूरी शर्त है. अगर हम केवल यह कहें कि नक्सली हिंसा करते हैं, इसलिए उनके पीछे कोई सवाल नहीं था, तो हम इतिहास का एक हिस्सा छोड़ देंगे और अगर हम यह कहें कि उनके पीछे वास्तविक सवाल थे, इसलिए उनकी हिंसा उचित थी, तो हम दूसरा हिस्सा छोड़ देंगे.

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यहीं भारत की अपनी बौद्धिक परंपरा भी एक दिलचस्प संदर्भ देती है. भारत में सामाजिक और नैतिक परिवर्तन की कल्पना केवल हथियार के जरिए नहीं हुई. कृष्ण के सामने युद्ध था, लेकिन उससे पहले संवाद था. बुद्ध के सामने समाज और मनुष्य के दुख का सवाल था, लेकिन उन्होंने परिवर्तन का रास्ता भीतर से शुरू किया. उपनिषदों में सवाल हैं, शास्त्रार्थ की परंपरा है और अलग-अलग दर्शन एक-दूसरे से असहमत होते हुए भी लंबे समय तक साथ मौजूद रहे. इसका अर्थ यह नहीं कि भारत का इतिहास हमेशा अहिंसक रहा या यहां संघर्ष नहीं हुए. ऐसा कहना इतिहास को बहुत सरल बना देना होगा. इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि भारतीय समाज में विचार के जरिए बदलाव की एक पुरानी और गहरी परंपरा मौजूद थी.

इसलिए जब माओवादी विचार भारत में आया तो उसके सामने सिर्फ गरीबी और शोषण की जमीन नहीं थी. उसके सामने एक ऐसा समाज भी था जिसके पास परिवर्तन की अपनी राजनीतिक और वैचारिक परंपराएं थीं. गांधी ने जनआंदोलन के जरिए सत्ता को चुनौती देने का रास्ता दिखाया था. आंबेडकर ने संविधान और संस्थाओं के जरिए सामाजिक न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ाया. समाजवादी और वामपंथी धाराओं ने भी चुनावी राजनीति और जनसंगठनों के जरिए अपनी जगह बनाई यानी भारत में व्यवस्था बदलने की इच्छा रखने वाले हर व्यक्ति के सामने बंदूक ही एकमात्र रास्ता नहीं था.

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फिर सवाल यह नहीं रह जाता कि व्यवस्था बदलनी चाहिए या नहीं. सवाल यह बन जाता है कि व्यवस्था बदलने का रास्ता क्या हो. क्या कोई समाज अपने भीतर मौजूद अन्याय को खत्म करने के लिए लोकतांत्रिक संस्थाओं का इस्तेमाल कर सकता है? क्या चुनाव और संसद के जरिए बड़े बदलाव संभव हैं? क्या सड़क का आंदोलन और जनदबाव किसी सरकार को अपनी नीति बदलने के लिए मजबूर कर सकता है? भारत के इतिहास में इन सभी सवालों के जवाब कई बार ‘हां’ में मिले हैं. लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि लोकतांत्रिक संस्थाएं हमेशा पूरी तरह न्यायपूर्ण या प्रभावी नहीं रहीं. यही वह जगह है जहां क्रांतिकारी विचारों को जमीन मिलती है. जब लोगों को लगता है कि व्यवस्था उनकी बात नहीं सुन रही, तो व्यवस्था के बाहर रास्ता तलाशने की और ध्यान बढ़ता है.

नक्सलवाद की कहानी में यही हुआ. वास्तविक शिकायतों के बीच एक ऐसा विचार मजबूत हुआ जिसने कहा कि समस्या केवल किसी सरकार या किसी नीति में नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था में है और अगर पूरी व्यवस्था ही समस्या है तो उसे सुधारने के बजाय बदलना होगा. फिर सवाल आया कि, कैसे? यहीं माओवादी विचार का वह हिस्सा सामने आया जिसमें सशस्त्र संघर्ष को परिवर्तन का रास्ता माना गया.

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लेकिन किसी भी विचार की असली परीक्षा शायद वहीं शुरू होती है जहां वह जमीन पर उतरता है. किताब में लिखी क्रांति और गांव के भीतर चलने वाली बंदूक की आवाज एक चीज नहीं होती. विचार जब हिंसा में बदलता है तो उसका असर उन लोगों पर भी पड़ता है जो उस विचार की बहस का हिस्सा नहीं होते. जिस आदिवासी के नाम पर क्रांति की बात की जा रही है, वही आदिवासी हिंसा, सुरक्षा अभियानों, विस्थापन और भय के बीच फंस सकता है. जिस गरीब किसान के नाम पर संघर्ष शुरू होता है, जरूरी नहीं कि वह उस संघर्ष के हर तरीके का समर्थक हो.

इसलिए यहां एक और कठिन सवाल पैदा होता है कि क्या किसी आंदोलन के उद्देश्य को उसके साधनों से अलग करके देखा जा सकता है? अगर उद्देश्य सामाजिक न्याय है, तो क्या हिंसा स्वीकार्य हो जाती है? अगर लक्ष्य शोषण खत्म करना है, तो क्या किसी निर्दोष की हत्या उस लक्ष्य के नाम पर उचित ठहराई जा सकती है? और अगर जवाब नहीं है, तो फिर उस विचार के उस हिस्से की पहचान करनी होगी जो हिंसा को राजनीतिक साधन मानता है और यहीं से “दिमागी नक्सल” की बहस फिर हमारे सामने लौटती है.

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लेकिन अभी भी एक फर्क बाकी है. किसी विचार की आलोचना करना और उस विचार को मानने वाले हर व्यक्ति को एक ही नाम दे देना एक बात नहीं है. नक्सलवाद की वैचारिक जड़ को समझना जरूरी है, लेकिन किसी सरकार की आलोचना करने वाले, किसी आदिवासी अधिकार की बात करने वाले या किसी आर्थिक व्यवस्था पर सवाल उठाने वाले हर व्यक्ति को उसी विचारधारा का हिस्सा मान लेना भी उतना ही गलत होगा यानी नक्सलवाद की कहानी हमें एक ऐसी जगह तक ले आई है जहां बंदूक और विचार के बीच फर्क करना जरूरी है, लेकिन विचार और असहमति के बीच फर्क करना उससे भी ज्यादा जरूरी है.

नक्सलबाड़ी से शुरू हुई वह यात्रा हमें यह बताती है कि विचार कभी खाली जमीन पर नहीं उतरता बल्कि उसे समाज की वास्तविक समस्याएं जमीन देती हैं. फिर राजनीति उसे दिशा देती है और संगठन उसे ताकत देता है लेकिन उसी रास्ते में कहीं यह तय होता है कि बदलाव संवाद से होगा, चुनाव से होगा, आंदोलन से होगा या बंदूक से.

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यहीं नक्सलवाद की सबसे बड़ी दुविधा दिखाई देती है. सवाल कई बार वास्तविक थे, लेकिन चुना गया रास्ता लोकतंत्र से टकराता गया. और अब हमारे सामने वह सवाल खड़ा है कि अगर किसी व्यक्ति के हाथ में बंदूक नहीं है, लेकिन उसके दिमाग में उस हिंसक क्रांति के लिए समर्थन है, तो क्या उसे “दिमागी नक्सल” कहा जाए? और अगर वह सिर्फ इसलिए सरकार से असहमत है क्योंकि उसे लगता है कि सत्ता गलत हो सकती है, तो क्या उसे भी उसी नाम से पुकारा जा सकता है? शायद इन दोनों सवालों का जवाब एक जैसा नहीं हो सकता.

पार्ट वन – ‘दिमागी नक्सल’ आखिर कौन? समझिए असहमति और उग्र विचारधारा के बीच की पतली रेखा

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डिस्क्लेमर – लेखक ललित सिहाग जाने माने राजनीतिक विश्लेषक हैं, वह रिसर्चर हैं और वर्तमान में नीति एवं राजनीति पर लिखते हैं. लेख में साझा किए गए तथ्य लेखक के निजी विचार हैं.

First published on: Aug 21, 2026 07:27 PM

End of Article
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