Popcorn History: खेत में उगने वाला एक साधारण सा मक्के का दाना हजारों साल का सफर तय करके आज थिएटर का सबसे पसंद किए जाने वाला और लग्जरी स्नैक बन चुका है. काफी चौंकाने वाली बात है कि जिस पॉपकॉर्न (Popcorn) की कीमत बाजार में कुछ रुपये की होती है, वही थिएटर में कई सौ रुपये का बिकता है. इसकी वजह सिर्फ पॉपकॉर्न का टेस्ट नहीं है, बल्कि हजारों साल का इतिहास, दिलचस्प आविष्कार और थिएटर का पूरा बिजनेस मॉडल है. आइए जानते हैं कि कैसे एक साधारण मक्के का दाना आज थिएटर तक पहुंचकर ‘लग्जरी स्नैक’ बन गया है.
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पॉपकॉर्न की हजारों साल पुरानी कहानी
आपको जानकर हैरानी होगी कि पॉपकॉर्न कोई मॉडर्न फास्ट फूड नहीं है बल्कि यह तो लगभग 8000 साल पुराना है. इसकी शुरुआत होती है अमेरिका से. इसे ‘टीओसिन’ (Teosinte) नामक एक जंगली घास से बनाया गया था. इसकी खोज तब हुई जब कुछ वैज्ञानिकों ने एक्सपेरिमेंट के दौरान मक्के के दानों को भूनना शुरू किया. भूनने पर जब मक्के के दाने फूटकर पॉपकॉर्न बनने लगे और जब इसे टेस्ट किया गया, तो इसका स्वाद सबको अच्छा लगा. बस तभी से पॉपकॉर्न लोगों के बीच स्नैक के रूप में खूब पसंद किया जाने लगा.
एक मशीन ने बदल दी पॉपकॉर्न की किस्मत
पॉपकॉर्न की खोज के बाद एक ऐसे व्यक्ति आए, जिन्होंने पॉपकॉर्न की किस्मत ही बदल दी. चार्ल्स क्रेटर्स ने साल 1885 में पहली पॉपकॉर्न मशीन बनाई. इतना ही नहीं, उन्होंने पॉपकॉर्न मशीन में स्टीम इंजन भी लगाया जिससे स्वादिष्ट बटर वाले पॉपकॉर्न निकलते थे. चार्ल्स क्रेटर्स के बटर वाले पॉपकॉर्न ने इस स्नैक की लोकप्रियता और बढ़ा दी. इतिहासकार ‘एंड्र्यू स्मिथ’ के हिसाब से चार्ल्स अपनी इस मशीन को लोगों तक पहुंचाने के लिए साल 1893 के वर्ल्ड फेयर की प्रदर्शनी में ले गए, जहां से इसकी लोकप्रियता और भी बढ़ गई. इसी दौर में फ्रेडरिक रुएकहेम के द्वारा कैरेमल पॉपकॉर्न (Caramel Popcorn) बनाने की मशीन भी बनाई गई, लेकिन कैरेमल पॉपकॉर्न अपने चिपचिपेपन के चलते बटर पॉपकॉर्न को टक्कर नहीं दे पाए.
थिएटर में ही क्यों बिकता है सबसे ज्यादा पॉपकॉर्न?
समय के साथ देखते ही देखते पॉपकॉर्न और थिएटर का रिश्ता और भी गहरा हो गया. कोई मूवी देखने थिएटर जाए और पॉपकॉर्न न खाए, ये सोचना भी लोगों के लिए मुश्किल हो गया. थिएटर में सबसे ज्यादा पॉपकॉर्न बिकने की वजह उसकी खुशबू, आसान सर्विंग और खाते-खाते बिना किसी झंझट के मूवी देखने की सुविधा है. पॉपकॉर्न अब केवल एक स्नैक नहीं, बल्कि मूवी थिएटर का कल्चर बन गया है.
बाजार में सस्ता, थिएटर में महंगा… आखिर क्यों?
बाजार में सस्ता मिलने वाले पॉपकॉर्न की कीमत थिएटर में बढ़ जाने की वजह कम होने वाला मुनाफा था. थिएटर्स को मूवी की बिक्री से बहुत कम मुनाफा होता था. ऐसा इसलिए था क्योंकि कमाई का आधे से ज्यादा हिस्सा प्रोड्यूसर्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स ले लेते थे. वहीं दूसरी तरफ थिएटर चलाने का खर्च, बिजली और मॉल का किराया बहुत ज्यादा था. इसलिए ही एक पॉलिसी लाई गई कि लोग बाहर से थिएटर में खाना नहीं ले जाएंगे, जिसकी वजह से फूड काउंटर की बिक्री अपने आप बढ़ गई और थिएटर को उससे कुछ हद तक कमाई होने लगी. इसी वजह से पॉपकॉर्न थिएटर की सबसे बड़ी कमाई का जरिया बन गया.
अब अगली बार जब आप थिएटर में पॉपकॉर्न खरीदें, तो याद रखिए कि आप सिर्फ मक्के के दाने नहीं बल्कि 8000 साल के इतिहास और थिएटर के पूरे बिजनेस मॉडल का हिस्सा खरीद रहे हैं. पॉपकॉर्न की कीमत में सिर्फ मक्का और बटर की नहीं, बल्कि पूरे थिएटर एक्सपीरियंस, सुविधा और बिजनेस मॉडल की भी भूमिका होती है.
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