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भारत के लगभग हर शहर, कस्बे और गांव में आपने ऐसी महिलाओं या फेरीवालों को जरूर देखा होगा, जो गली-गली घूमकर आवाज लगाते हैं-‘पुराने कपड़े दे दो, बदले में बर्तन ले लो.’ लोग अपने घरों में रखे पुराने कपड़ों के बदले स्टील के बर्तन, बाल्टी या बाकी घरेलू सामान ले लेते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर ये पुराने कपड़े बाद में कहां जाते हैं? दरअसल, पुराने कपड़ों के पीछे एक बड़ा कारोबार और पूरी सप्लाई चेन काम करती है. इन कपड़ों का दोबारा इस्तेमाल, बिक्री और रीसाइक्लिंग की जाती है. इससे ना सिर्फ लाखों लोगों को रोजगार मिलता है, बल्कि पर्यावरण को भी बड़ा फायदा होता है. विशेषज्ञों के मुताबिक, पुराने कपड़ों का दोबारा इस्तेमाल नए कपड़े बनाने की तुलना में कम संसाधनों की मांग करता है और प्रदूषण भी घटाता है.

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सबसे पहले होती है कपड़ों की छंटाई

घर-घर से इकट्ठा किए गए कपड़े सबसे पहले बड़े व्यापारियों या गोदामों तक पहुंचते हैं. यहां उनकी क्वालिटी के आधार पर छंटाई की जाती है. जो कपड़े अच्छी हालत में होते हैं, उन्हें साफ करके दोबारा बिक्री के लिए तैयार किया जाता है. वहीं बहुत ज्यादा पुराने, फटे या खराब कपड़ों को रीसाइक्लिंग के लिए अलग कर दिया जाता है. भारत के कई शहरों में पुराने कपड़ों के बड़े बाजार लगते हैं, जहां बेहद कम कीमत में अच्छे कपड़े मिल जाते हैं. कम इनकम वाले परिवार, मजदूर, छात्र और जरूरतमंद लोग इन बाजारों से सस्ते कपड़े खरीदते हैं. कई बार विदेशों से आए सेकेंड हैंड कपड़े भी इन्हीं बाजारों में बेचे जाते हैं.

खराब कपड़ों से बनते हैं नए उत्पाद

जो कपड़े पहनने योग्य नहीं रहते, उन्हें मशीनों से छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है. इसके बाद उनसे फाइबर यानी रेशे निकाले जाते हैं. इन रेशों से दोबारा धागा तैयार किया जाता है, जिससे दरी, कालीन, पोछा, कंबल, कुशन, गद्दों की भराई और औद्योगिक इस्तेमाल में आने वाले कई प्रोडक्ट बनाए जाते हैं. कॉटन और ऊन जैसे प्राकृतिक रेशों वाले कपड़ों की रीसाइक्लिंग आसान होती है, जबकि पॉलिएस्टर और मिक्स फैब्रिक वाले कपड़ों को आधुनिक मशीनों की मदद से अलग-अलग प्रोसेस किया जाता है. रीसाइक्लिंग से तैयार धागों का इस्तेमाल सिर्फ घरेलू सामान तक सीमित नहीं रहता. ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में कारों की सीटों की फिलिंग, फर्नीचर, पैकिंग मटेरियल, इंसुलेशन और कई औद्योगिक प्रोडक्ट्स में भी इनका इस्तेमाल किया जाता है. इससे नए कच्चे माल की जरूरत कम होती है और उत्पादन लागत भी घटती है.

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पर्यावरण को मिलता है बड़ा फायदा

हर साल दुनिया भर में करोड़ों टन कपड़े कचरे के रूप में फेंक दिए जाते हैं. अगर इन्हें सीधे लैंडफिल में डाल दिया जाए तो प्रदूषण बढ़ता है और जमीन पर भी दबाव पड़ता है. वहीं पुराने कपड़ों का दोबारा इस्तेमाल और रीसाइक्लिंग करने से पानी, ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों की बचत होती है. साथ ही कार्बन एमिशन भी कम होता है, जिससे पर्यावरण संरक्षण में मदद मिलती है. पुराने कपड़ों का ये पूरा नेटवर्क लाखों लोगों की रोजी-रोटी का जरिया है. घर-घर से कपड़े इकट्ठा करने वाले, उनकी छंटाई करने वाले कर्मचारी, सेकेंड हैंड बाजार के व्यापारी, रीसाइक्लिंग फैक्ट्रियां और दरी-कालीन बनाने वाले कारीगर सभी इस उद्योग का अहम हिस्सा हैं.

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First published on: Jul 03, 2026 10:36 PM

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Varsha Sikri

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