पुलिस लाठीचार्ज से मौत पर देश में क्या है कानून, किस पर दर्ज होगी FIR और मुआवजे को लेकर क्या है प्रावधान?

कॉकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च में पुलिस के लाठीचार्ज में एक लड़क बुरी तरह घायल हुई, लेकिन अगर उसकी मौत हो जाती तो क्या होता? क्या पुलिवालों पर कार्रवाई होती या लड़की के आश्रितों को मुआवजा मिलता, आइए जानते हैं…

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पुलिस लाठीचार्ज मं किसी की मौत होने पर संविधान के नियमों के तहत कार्रवाई होती है.

28 जून से जंतर-मंतर पर धरनारत कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने 20 जुलाई को संसद मार्च निकाला. दिल्ली पुलिस ने संसद भवन पहुंचने से पहले प्रदर्शनकारियों को खदेड़ दिया. जंतर-मंतर, विजय चौक और कनॉट प्लेस में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव हुआ. पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागकर और लाठीचार्ज करके संसद मार्च का दमन किया, जिसमें 100 से ज्यादा प्रदर्शनकारी घायल हुए. किसी का सिर फूटा तो किसी के हाथ-पैर में फ्रैक्चर आए.

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घायल लड़की ICU में वेंटिलेटर पर उपचाराधीन

दिल्ली पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुए हिंसक टकराव में एक लड़की गंभीर रूप से घायल हुई है. उसे इतनी चोटें लगी हैं कि ICU में वेंटिलेंटर पर रखना पड़ा. वह दिल्ली के RLM अस्पताल में भर्ती है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि पुलिस लाठीचार्ज करे और किसी प्रदर्शनकारी की मौत हो जाए तो ऐसे मामले में देश का कानून क्या कहता है? क्या ऐसे मामले में पुलिस के खिलाफ कार्रवाई होती है? FIR दर्ज होती है और मुआवजे को लेकर भी कोई प्रावधान है?

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गैर-इरादतन और लापरवाही से मौत का केस होता

बता दें कि पुलिस अगर प्रदर्शनकारियों का लाठीचार्ज से दमन करे और किसी की ज्यादा चोट लगने से मौत हो जाए तो ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर IPC की धारा 304 या इसके बराबर की BNS की धारा के तहत गैर-इरादतन हत्या या IPC की धारा 304A/BNS की धारा के तहत लापरवाही से मौत का केस दर्ज होता है और न्यायिक जांच की जाती है. इसके अलावा मौत के लिए जिम्मेदार पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या की धारा 302 या 304 के तहत मुकदमा दर्ज किया जा सकता है.

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मानवाधिकार आयोग मामले में स्वत: संज्ञान ले सकता

मिली जानकारी के अनुसार, पुलिस केस दर्ज करने के अलावा मजिस्ट्रेट घटनाक्रम की जांच करके यह सुनिश्चित करता है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNS) की किन धाराओं के तहत पुलिस की कार्रवाई कितनी जायज थी और पुलिस पर क्या कार्रवाई होनी चाहिए? इसके अलावा राष्ट्रीय मानववाधिकार आयोग (NHRC) स्वतः संज्ञान (suo-motu) लेकर मृतक/मृतका के परिजनों को मुआवजा देने की सिफारिश कर सकता है. वहीं मौत का वास्तविक कारण पोस्टमार्टम कराकर पता लगाया जाता है.

5 से 25 लाख रुपये तक का मुआवजा मिल सकता

बता दें कि अगर पुलिस के लाठीचार्ज में किसी प्रदर्शनकारी की मौत हो जाए तो उसे सरकार की ओर से 5 लाख से 25 लाख या इससे अधिकारी का मुआवजा दिया जा सकता है. लेकिन मुआवजे का निर्धारण मृतक की उम्र, इनकम और उस पर आश्रित लोगों की संख्या के आधार पर तय होता है. राज्य या राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ऐसे मामलों में स्वत: संज्ञान लेकर मुआवजा देने की सिफारिश सरकार से कर सकता है. वहीं तय किया गया मुआवजा न देने या देने में देरी करने पर भी कार्रवाई हो सकती है.

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राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के जरिए आवेदन होगा

मिली जानकारी के अनुसार, अगर पुलिस ने लाठीचार्ज करते समय संविधान के अनुच्छेद-21 (जीवन के अधिकार) का उल्लंघन किया तो कोर्ट बहुत ज्यादा भारी मुआवजा देने का आदेश दे सकती है. देश के हर प्रदेश में राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SLSA) के तहत एक पीड़ित क्षतिपूर्ति कोष बना है, जिसके जरिए पुलिस कार्रवाई या अपराध पीड़ितों मुआवजे के लिए आवेदन कर सकते हैं. इसके अलावा कोर्ट दोषी से भी मुआवजा दिला सकती है, जो दोषी पुलिसकर्मी की सैलरी से वसूला जा सकता है.

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लेखक के बारे में

Khushbu Goyal

Khushbu Goyal

खुशबू गोयल News24 हिंदी डिजिटल में चीफ सब एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. वेब जर्नलिज्म में 13 साल का अनुभव रखने वाली खुशबू गोयल राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और राज्यस्तरीय न्यूज और चुनावी कवरेज करती हैं. खुशबू गोयल ने अक्टूबर 2013 में अमर उजाला डिजिटल से अपने करियर की शुरुआत की थी, जहां 7 साल सेवाएं देने के बाद साल नवंबर 2020 में दैनिक भास्कर डिजिटल जॉइन किया और सितंबर 2023 से News24 के डिजिटल में सेवाएं दे रही हैं. 13 साल के करियर में खुशबू गोयल ने नेशनल, इंटरनेशनल, पॉलिटिकल, क्राइम टॉपिक कवर करने में विशेषज्ञता हासिल की. खुशबू गोयल का पत्रकारिता में अनुभव: 13 साल योग्यता: कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के IMC&MT इंस्टीट्यूट से मास्टर ऑफ कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म (MJ) के बाद जर्नलिज्म में MPhil की डिग्री ली. खुशबू गोयल ने 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव की विस्तृत रिपोर्टिंग की है, जिसमें उन्हें ग्राउंड कवरेज करने का भी अनुभव है. इसके अलावा पिछले 13 साल में विभिन्न राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव को भी उन्होंने फील्ड रिपोर्टिंग के साथ कवर किया.
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