कैंसर की खबर ही एक इंसान और उसके परिवार को तोड़ देती है. ऊपर से कैंसर के इलाज में होने वाले खर्चे का बोझ उठाना एक आम आदमी के लिए बेहद मुश्किल होता है. ऐसे में अगर कैंसर की दवाई कई गुना महंगी मिल रही हो तो कोई ट्रीटमेंट कैसे करवाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से ऐसा ही सवाल मंगलवार को पूछा. अदालत ने कहा कि क्या दवाओं और मेडिकल डिवाइस की रिटेल कीमतों पर एक जैसी लिमिट लगाई जानी चाहिए, ताकि रिटेलर से ली जाने वाली कीमत पर बहुत ज्यादा मार्कअप को रोका जा सके.
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‘3000 की दवा 27 हजार में क्यों’
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने सवाल किया कि मैक्सिमम रिटेल प्राइस (MRP) को ‘प्राइस टू रिटेलर’ (PTR) से 16 प्रतिशत ज्यादा पर क्यों सीमित नहीं किया जा सकता, खासकर जान बचाने वाली दवाओं के मामले में. जस्टिस मेहता ने कैंसर की एक दवा का जिक्र करते हुए कहा कि ग्राहकों को ये करीब 27 हजार में बेची जा रही थी, जबकि उसका PTR करीब 3 हजार रुपये था. उन्होंने इसे बेहद चिंताजनक बताया.
12 अक्टूबर को अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर दवाओं की कीमत बढ़ती है, तो उसका असर सरकारी फंड पर भी बढ़ सकता है. आयुष्मान भारत जैसी सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत इलाज कराने वाले मरीजों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है. केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिकाकर्ताओं की मांग पर गौर करते हुए ये माना की बैलेंस बनाना बेहद जरूरी है. इस मामले की अगली सुनवाई अब 12 अक्टूबर को होगी. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने जीवन रक्षक दवाओं, खासकर कैंसर की दवाओं की PTR और MRP के बीच बड़े अंतर पर गंभीर चिंता जताई थी.
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