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वेश्यावृत्ति पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, कानूनन स्वेच्छा से देहव्यापार अपराध नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अगर कोई महिला अकेले अपने जीवनयापन के लिए देहव्यापार करती है, तो उसका घर 'कोठा' नहीं माना जाएगा. कोर्ट ने इम्मोरल ट्रैफिक प्रिवेंशन एक्ट (ITPA) की व्याख्या करते हुए कहा कि इस कानून का मकसद सेक्स वर्क को पूरी तरह प्रतिबंधित करना नहीं, बल्कि इसके व्यावसायिक इस्तेमाल को रोकना है. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने आदेश दिया कि बालिग और मर्जी से सेक्स वर्क करने वाली महिलाओं को जबरन सुधार गृहों में न रखा जाए.

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सुप्रीम कोर्ट ने देश में देहव्यापार से जुड़े करीब 70 साल पुराने कानून की बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक व्याख्या की है. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि कोई महिला अकेले अपने गुजारे या आजीविका के लिए देहव्यापार करती है, तो उसके निवास स्थान को कानूनन ‘ब्रोथल’ यानी कोठा नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने साफ किया कि अगर उस जगह पर कोई दूसरी सेक्स वर्कर या कोई बिचौलिया (दलाल) शामिल नहीं है, तो पुलिस उस परिसर पर इस आधार पर कार्रवाई नहीं कर सकती.

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने ‘इम्मोरल ट्रैफिक प्रिवेंशन एक्ट’ (ITPA), 1956 का सूक्ष्म विश्लेषण करने के बाद यह अहम फैसला सुनाया. लगभग 298 पन्नों के इस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “इस कानून का मुख्य उद्देश्य देहव्यापार को पूरी तरह से खत्म करना या इसे पूरी तरह से अपराध घोषित करना नहीं है. बल्कि इसका असली मकसद इसके व्यावसायिकरण और संगठित रूप से चलाए जा रहे अवैध धंधों पर रोक लगाना है.”

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पब्लिक प्लेस में मांग करना ही अपवाद

अदालत ने कानून की धारा 7 और 8 का हवाला देते हुए समझाया कि खुलेआम सार्वजनिक स्थलों या धार्मिक-सड़क जैसे इलाकों के पास ग्राहकों को रिझाना या देहव्यापार को प्रदर्शित करना ही इस कानून के तहत अपवाद और दंडनीय है, क्योंकि यह सार्वजनिक शालीनता और सामाजिक नैतिकता के खिलाफ है. लेकिन निजी दायरे में अपनी मर्जी से जीवनयापन के लिए ऐसा करने वाली एकल महिला पर यह कानून सीधे लागू नहीं होता.

मर्जी की सेक्स वर्कर को जबरन ‘रेस्क्यू’ न करे पुलिस

सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित सुरक्षा योजना के तहत मजिस्ट्रेट और पुलिस प्रशासन को सख्त निर्देश दिए हैं. कोर्ट ने कहा कि जब भी किसी संदिग्ध ठिकाने पर छापेमारी होती है, तो वहां मौजूद हर महिला को अपराधी या पीड़ित की तरह ट्रीट न किया जाए. मजिस्ट्रेट को सबसे पहले शुरुआती जांच में यह तय करना होगा कि क्या वह महिला बालिग है और अपनी मर्जी से यह काम कर रही है?

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अदालत ने साफ कहा कि जो बालिग महिलाएं स्वेच्छा से इस पेशे में हैं, उन्हें उनकी मर्जी के खिलाफ जबरन ‘रेस्क्यू’ करके लंबे समय तक सुधार गृहों या शेल्टर होम्स में बंद नहीं रखा जा सकता. राज्य को पुनर्वास की सुविधाएं देने का अधिकार है, लेकिन वह किसी नागरिक पर उसकी इच्छा के विरुद्ध इसे थोप नहीं सकता.

First published on: Jun 01, 2026 01:32 PM

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About the Author

Vijay Jain

सीनियर न्यूज एडिटर विजय जैन को पत्रकारिता में 23 साल से अधिक का अनुभव है.  न्यूज 24 से पहले विजय दैनिक जागरण, अमर उजाला और दैनिक भास्कर जैसे प्रतिष्ठित अखबारों में अलग-अलग जगहों पर रिपोर्टिंग और टीम लीड कर चुके हैं, हर बीट की गहरी समझ है। खासकर शहर राज्यों की खबरें, देश विदेश, यूटिलिटी और राजनीति के साथ करेंट अफेयर्स और मनोरंजन बीट पर मजबूत पकड़ है. नोएडा के अलावा दिल्ली, गाजियाबाद, गोरखपुर, जयपुर, चंडीगढ़, पंचकूला, पटियाला और जालंधर में काम कर चुके हैं इसलिए वहां के कल्चर, खानपान, व्यवहार, जरूरत आदि की समझ रखते हैं. प्रिंट के कार्यकाल के दौरान इन्हें कई मीडिया अवार्ड और डिजिटल मीडिया में दो नेशनल अवार्ड भी मिले हैं. शिकायत और सुझाव के लिए स्वागत है- Vijay.kumar@bagconvergence.in

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