Parliament Session 2026: संसद के मानसून सत्र के पहले तीन दिन लोकसभा और राज्यसभा दोनों ही सदनों की कार्यवाही बाधित रही. सत्र शुरू होते ही हंगामा, फिर नारे बाजी और फिर बार-बार सदन का स्थगित होना. बीते तीन दिनों में मानसून सत्र के दौरान दोनों सदनों से यही तस्वीर सामने आई है. इसे लेकर कई लोगों ने सवाल उठाए और सदन की कार्यवाही ठीक से ना चलने के लिए पक्ष और विपक्ष दोनों को ही जिम्मेदार ठहराया. तीसरे दिन भी सदन की कार्यवाही और कामकाज नहीं हो पाया और फिर से कार्यवाही को अगले दिन के लिए स्थगित कर दिया गया. इस बीच एक सवाल और उठ रहा है कि जब सदन की कार्यवाही नहीं होती है तो आखिर इसका खामियाजा कौन भुगतता है और सदन की कार्यवाही को चलाने के लिए आखिर फंड कहां से आता है?
मिली जानकारी के अनुसार, आपको बता दें कि सदन की कार्यवाही के लिए धन खर्च का सवाल सीधा देश के करदाताओं से जुड़ा हुआ है. संसद का संचालन सिर्फ सांसदों की मौजूदगी तक ही नहीं होता है बल्कि सदन की कार्यवाही को चलाने के लिए सचिवालय, सुरक्षा, तकनीकी सेवाएं, प्रसारण, अनुवाद और हर दिन की प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं.
वहीं, बजट सत्र 2026 के दौरान लोकसभा में पीठासीन अध्यक्ष जगदंबिका पाल का भी एक बयान सामने आया था. जिसमें उन्होंने कहा था कि संसद की कार्यवाही के लिए हर मिनट लगभग 2.5 लाख रुपये, हर घंटे लगभग 1.5 करोड़ रुपये और पूरे एक दिन में लगभग 9 करोड़ रुपये खर्च होते हैं. तो अब अगर ऐसे में मानसून सत्र 2026 के शुरुआती तीन दिनों की बात करें तो इन तीन दिनों में कम से कम 27 करोड़ रुपये की लागत लगी है. लेकिन मानसून सत्र के इन दिनों में ना ही प्रश्नकाल, विधायी कामकाज और ना ही शून्यकाल सामान्य रूप से या फिर बिना स्थगित हुए आगे बढ़ा है.
ऐसे में संसद के मानसून सत्र में होने वाले खर्च को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं और अब ये मामला सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि सार्वजनिक पैसों के इस्तेमाल और जवाबदेही को लेकर भी एक बड़ा सवाल खड़ा करती है.
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संसद की कार्यवाही पर कितना खर्च आता है?
यदि लोकसभा और राज्यसभा के तय कार्यक्रम को हम आधार मानें, तो संसद की कार्यवाही सामान्य तौर पर हर दिन करीब 360 मिनट चलती है. बजट सत्र 2026 के दौरान लोकसभा में पीठासीन अध्यक्ष जगदंबिका पाल द्वारा दिए गए बयान के अनुसार, जो आंकड़े दिए गए उसके अनुसार तीन दिनों में कम से कम अनुमानित खर्च 27 करोड़ रुपये हैं.
इसी अनुमान के आधार पर मानसून सत्र के शुरुआती तीन दिनों में इतना अनुमानित पैसा खर्च हुआ-
| मानसून सत्र के प्रभावित दिन | 3 |
| विधायी कार्य (Legislative Business) | प्रभावी रूप से नहीं हो सका |
| बाधित प्रश्नकाल | 3 |
| कुल निर्धारित कार्य अवधि | लगभग 1,080 मिनट |
| प्रति मिनट अनुमानित खर्च | ₹2.5 लाख |
| तीन दिनों का अनुमानित संचालन खर्च | करीब ₹27 करोड़ |
इन आंकड़ों से ये पता चलता है कि संसद की कार्यवाही बाधित रहने की स्थिति में भी उसके संचालन पर भारी सार्वजनिक धन खर्च होता है.
मानसून सत्र के पहले तीन दिन में क्या-क्या हुआ?
- पहला दिन: सत्र की शुरुआत से ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली. लगातार शोर-शराबे के कारण लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही बार-बार बाधित हुई और दोनों सदनों को स्थगित करना पड़ा.
- दूसरा दिन: दूसरे दिन भी गतिरोध खत्म नहीं हुआ. हंगामे की वजह से प्रश्नकाल सहित कई महत्वपूर्ण संसदीय कार्य पूरे नहीं हो सके और निर्धारित एजेंडा आगे नहीं बढ़ पाया.
- तीसरा दिन: तीसरे दिन शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष ने जोरदार विरोध दर्ज कराया. लगातार व्यवधान के चलते सदन की सामान्य कार्यवाही प्रभावित रही और विधायी कामकाज अपेक्षित रूप से आगे नहीं बढ़ सका.
लगातार तीन दिनों तक चले इस गतिरोध का परिणाम यह रहा कि संसद के संचालन पर भारी सार्वजनिक खर्च होने के बावजूद कानून निर्माण, प्रश्नकाल और अहम राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा नहीं हो सकी.
सिर्फ आर्थिक नहीं, लोकतांत्रिक नुकसान भी हुआ
संसद की कार्यवाही बाधित होने का असर केवल सरकारी खर्च तक सीमित नहीं रहता है. इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था की कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं भी प्रभावित होती हैं.
- सांसदों को सरकार से जवाब मांगने के पर्याप्त अवसर नहीं मिलते.
- विभिन्न मंत्रालयों की कार्यप्रणाली पर निगरानी नहीं हो पाती है.
- प्रस्तावित विधेयकों और नीतिगत विषयों पर चर्चा टल जाती है.
- आम जनता से जुड़े मुद्दे सदन की आधिकारिक कार्यवाही का हिस्सा नहीं बन पाते हैं.
- संसदीय समितियों और भविष्य की नीति-निर्माण प्रक्रिया के लिए आवश्यक बहस का आधार भी सीमित हो जाता है.
संसद के संचालन पर होने वाला खर्च कहां जाता है?
अक्सर यह धारणा बनाई जाती है कि संसद पर होने वाला अधिकांश खर्च केवल सांसदों के वेतन और भत्तों तक सीमित होता है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अलग है. संसद के संचालन के लिए कई प्रशासनिक और तकनीकी व्यवस्थाओं पर नियमित रूप से धन खर्च किया जाता है.
इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं–
- लोकसभा और राज्यसभा सचिवालय का संचालन.
- अधिकारियों, कर्मचारियों और सहायक स्टाफ के वेतन एवं अन्य सुविधाएं.
- संसद भवन परिसर की सुरक्षा और सुरक्षा एजेंसियों की तैनाती.
- कार्यवाही के अनुवाद, दस्तावेजीकरण और आधिकारिक रिपोर्टिंग की व्यवस्था.
- लाइव प्रसारण, डिजिटल नेटवर्क और सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) से जुड़ी सेवाएं.
- बिजली, रखरखाव, साफ-सफाई तथा अन्य प्रशासनिक और परिचालन व्यय.
इन सभी व्यवस्थाओं पर हर दिन करोड़ों रुपये खर्च होते हैं. तो सत्र के दौरान सदन की कार्यवाही ठीक ढंग से हो या ना हो लेकिन इन सभी व्यवस्थाओं पर लगातार पैसा खर्च होता रहता है.
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