भारतीय रेलवे अपने रनिंग स्टाफ के वेतन ढांचे से जुड़े एक महत्वपूर्ण बदलाव की तैयारी में है. रेलवे बोर्ड ने लोको पायलट, सहायक लोको पायलट, ट्रेन मैनेजर (पूर्व में गार्ड) और अन्य रनिंग स्टाफ को मिलने वाले किलोमीटरेज अलाउंस (Kilometrage Allowance) की गणना के तरीके में संशोधन का प्रस्ताव तैयार किया है. यदि यह व्यवस्था लागू होती है तो कई कर्मचारियों की मासिक आय पर असर पड़ सकता है.

बता दें कि रेलवे अब किलोमीटर की जगह 'ड्यूटी कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स' (DCI) लागू करने पर विचार कर रहा है. रेलवे के रनिंग स्टाफ का वेतन केवल मूल वेतन और महंगाई भत्ते तक सीमित नहीं होता है. उनकी आय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा किलोमीटरेज अलाउंस से आता है, जो ट्रेन संचालन के दौरान तय की गई दूरी के आधार पर दिया जाता है. प्रस्तावित बदलाव इसी भत्ते की गणना से जुड़ा है. कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यदि नए फार्मूले के अनुसार भुगतान किया गया तो वर्तमान व्यवस्था की तुलना में कई कर्मचारियों को कम राशि मिल सकती है.

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रेलवे क्यों ले रहा ये फैसला?

रेलवे बोर्ड से जुड़े सूत्रों के अनुसार, मौजूदा व्यवस्था में तेज रफ्तार ट्रेनों का संचालन करने वाले लोको पायलट अपेक्षाकृत कम समय में अधिक दूरी तय कर लेते हैं, जिससे वर्तमान किलोमीटरेज अलाउंस के आधार पर प्रति घंटे मिलने वाला भुगतान काफी अधिक हो जाता है. उदाहरण के तौर पर, यदि कोई लोको पायलट 160 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चार घंटे में 400 किलोमीटर की दूरी तय करता है, तो मौजूदा नियमों के तहत उसे मिलने वाला भुगतान असंतुलित माना जा रहा है.

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रेलवे का कहना है कि प्रस्तावित नई प्रणाली कर्मचारियों के कार्यभार और परिचालन परिस्थितियों का अधिक संतुलित आकलन करेगी. हालांकि, कर्मचारी संगठनों का दावा है कि यदि यह प्रस्ताव लागू हुआ तो रनिंग स्टाफ की कुल मासिक आय में लगभग 15 से 25 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है.

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प्रस्ताव के खिलाफ कर्मचारी संगठनों ने खोला मोर्चा

रेलवे बोर्ड के प्रस्तावित बदलाव का ऑल इंडिया रेलवेमेन फेडरेशन (AIRF) ने कड़ा विरोध किया है. फेडरेशन के महासचिव शिव गोपाल मिश्रा का कहना है कि आधुनिक तकनीक और हाई-स्पीड ट्रेनों के संचालन के साथ लोको पायलटों की जिम्मेदारियां पहले की तुलना में कहीं अधिक बढ़ गई हैं. उनका तर्क है कि 130 से 160 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से ट्रेन चलाते समय एक क्षण की चूक भी गंभीर हादसे का कारण बन सकती है. ऐसे में मानसिक दबाव को आधार बनाकर रनिंग अलाउंस में कमी करना कर्मचारियों के हितों के विपरीत होगा. उनका कहना है कि यदि कार्य का तनाव बढ़ा है तो भत्तों में बढ़ोतरी होनी चाहिए, न कि कटौती.

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इसके साथ ही कर्मचारी संगठनों ने रेलवे प्रशासन से रनिंग स्टाफ के 20 हजार से अधिक रिक्त पदों पर जल्द स्थायी नियुक्तियां करने की मांग की है. यूनियन का यह भी कहना है कि हाई-स्पीड ट्रेनों का संचालन करने वाले लोको पायलटों के लिए विशेष 'स्ट्रेस-रिस्क अलाउंस' लागू किया जाना चाहिए, ताकि उनकी अतिरिक्त जिम्मेदारियों और कार्य के दबाव को उचित आर्थिक मान्यता मिल सके.