Arif Khan
आरिफ खान मंसूरी को डिजिटल मीडिया में करीब 15 वर्षों का अनुभव है . वर्तमान में न्यूज24 की डिजिटल विंग में कार्यरत हैं. इससे पहले देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं.
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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बुजुर्ग दंपत्ति की अपने बेटे के मौत के बाद अपनी बहू से भरण-पोषण मांगने वाली याचिका को खारिज करते हुए कहा है कि नैतिक दायित्व, चाहे वह कितना भी अनिवार्य क्यों न लगे, उसे कानूनी दायित्व के रूप में लागू नहीं किया जा सकता है.
पिछले साल एक फैमिली कोर्ट ने बुजुर्ग दंपत्ति की याचिका खारिज कर दी थी. इसके बाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. उनके वकील ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता बूढ़े और अनपढ़ हैं, और वे अपने बेटे पर निर्भर थे, जो उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल था. उनके बेटे की शादी 2016 में हुई थी और 2021 में उसकी मौत हो गई. उसकी पत्नी भी उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल है.
दंपत्ति ने तर्क दिया कि उनकी बहू की अपनी पर्याप्त आय है. उसे उनके बेटे की मौत के बाद सर्विस बेनेफिट्स भी मिले हैं.
बहू के वकील ने कहा कि फैमिली कोर्ट इस मामले पर फैसला कर चुका है और इसमें किसी दखल की जरूरत नहीं है.
कोर्ट ने कहा कि बुजुर्ग दंपत्ति ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 के तहत राहत मांगी थी, लेकिन सास-ससुर इस कानून के दायरे में नहीं आते हैं. धारा 144 कोर्ट को किसी व्यक्ति को अपनी आश्रित पत्नी, बच्चे और माता-पिता को भरण-पोषण का भुगतान करने का आदेश देने का अधिकार देती है.
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं मिला है, जिससे ये संकेत मिले कि बहू को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी मिली है. कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए और बुजुर्ग दंपत्ति की याचिका को खारिज कर दिया और कहा, ‘नैतिक दायित्व की अवधारणा, चाहे वह कितनी भी अनिवार्य क्यों न लगे, वैधानिक जनादेश की अनुपस्थिति में कानूनी दायित्व के रूप में लागू नहीं की जा सकती. उक्त प्रावधान के तहत भरण-पोषण का दावा केवल उन्हीं व्यक्तियों द्वारा किया जा सकता है जो विशेष रूप से उसमें सूचीबद्ध श्रेणियों के अंतर्गत आते हैं.’
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