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लाल सागर संकट ने खोल दी पाकिस्तान की समुद्री बेबसी की पोल

लाल सागर और बाब-अल-मंदेब में बढ़ते संकट ने पाकिस्तान की सीमित नौसैनिक क्षमता और सुरक्षा के लिए दूसरे देशों पर उसकी निर्भरता को उजागर कर दिया है.

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लाल सागर में बढ़ते हूती हमलों के बीच समुद्री सुरक्षा को लेकर पाकिस्तान की सीमित नौसैनिक क्षमता पर सवाल उठ रहे हैं. (Image source- Pakistan Navy/X)

इस साल लाल सागर के गलियारे में हुए हमले में पाकिस्तानी नागरिकों की मौत सिर्फ एक दुखद घटना नहीं थी. इसने एक ज्यादा गहरी और ढांचागत सच्चाई को उजागर कर दिया-पाकिस्तान के पास इतनी स्वतंत्र नौसैनिक ताकत ही नहीं है कि वह उस समुद्री क्षेत्र में हालात को प्रभावित कर सके, जिस पर उसके अपने नागरिकों की रोजी-रोटी टिकी है.

इस्लामाबाद की नौसेना अपने ढांचे और बजट, दोनों के लिहाज से एक तटीय और नजदीकी समुद्र तक सीमित ताकत है. उसके बड़े युद्धपोत, पनडुब्बियां और गश्ती संसाधन मुख्य रूप से अरब सागर और उसके जरिए भारत के मुकाबले रोकथाम यानी डेटरेंस पर केंद्रित हैं. लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जैसे दूर के अहम पड़ावों तक पहुंच कभी भी इस ढांचे का हिस्सा नहीं रही. नतीजा यह है कि पाकिस्तान पूरी तरह दूसरों की बनाई सुरक्षा व्यवस्था पर निर्भर है-हूती हमलों के जवाब में अमेरिका के नेतृत्व वाले गठबंधन की कार्रवाई, सऊदी और खाड़ी देशों की नौसैनिक तैनाती और अलग से CMF का गश्त.

यह निर्भरता तब कम मायने रखती, अगर इसके साथ यह भरोसा भी होता कि बड़ी ताकतें जब कार्रवाई करेंगी तो पाकिस्तानी नागरिकों के हित को लेकर उसकी बात भी सुनी जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं है. इस क्षेत्र में पाकिस्तान नियम बनाने वाला नहीं, बल्कि नियम मानने वाला देश है. वह जानकारी मांग सकता है, कूटनीतिक भरोसा हासिल करने की कोशिश कर सकता है और उम्मीद कर सकता है कि दूसरों की तैयार की गई निकासी योजना में उसके नागरिकों का भी ख्याल रखा जाए. लेकिन वह अपने बलबूते किसी संसाधन को मोड़ नहीं सकता, अपनी शर्तों पर सुरक्षित रास्ता तय नहीं करा सकता, और बिना किसी मेजबान देश या गठबंधन के सहयोग के कोई बचाव अभियान भी नहीं चला सकता.

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भारत की स्थिति भले ही किसी ऐसी बड़ी ताकत जैसी न हो जो लाल सागर में अकेले दम पर दबदबा बना सके, लेकिन उसने कम से कम यह दिखाया है कि जब भी उसके नागरिकों पर खतरा मंडराया, वह आसपास के समुद्री इलाकों में स्वतंत्र रूप से निकासी और सुरक्षा अभियान चला सकता है-यह क्षमता उसने पश्चिम एशिया और खाड़ी क्षेत्र में आए कई संकटों के दौरान बार-बार साबित की है. दक्षिण एशिया की इन दो नौसेनाओं के बीच की यह क्षमता की खाई अब पूरी तरह खुलकर सामने आ गई है.

पाकिस्तान के लिए असली समस्या सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि उतनी ही आर्थिक भी है. उसके विदेश में काम करने वाले कामगारों का एक बड़ा हिस्सा-डॉक पर काम करने वाले मजदूर, व्यापारिक जहाजों के चालक दल, खाड़ी के बंदरगाहों से गुजरने वाले श्रमिक-ठीक उसी गलियारे से होकर गुजरते हैं, जो अब हूती हमलों की वजह से अस्थिर हो चुका है. इन्हीं कामगारों से आने वाला विदेशी मुद्रा प्रेषण पाकिस्तान की विदेशी मुद्रा स्थिति का एक अहम आधार है. यही वजह है कि इस गलियारे का संकट इस्लामाबाद के लिए कोई दूर की रणनीतिक बहस भर नहीं है-यह सीधे उन नागरिकों पर असर डालता है, जिनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की स्वतंत्र क्षमता राज्य के पास बेहद सीमित है.

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पाकिस्तानी अधिकारी पहले भी कई बार खाड़ी देशों के साथ अपनी “रणनीतिक साझेदारी” और अमेरिका के नेतृत्व वाली समुद्री सुरक्षा पहलों में शामिल होने को इन जोखिमों से निपटने के लिए पर्याप्त बताते रहे हैं. लेकिन लाल सागर के इस संकट ने कुछ और ही तस्वीर दिखाई है. साझेदारी और गठबंधन में शामिल होना, असल क्षमता होने जैसा नहीं है. जब यह समुद्री गलियारा खतरनाक हो गया, तो पाकिस्तान के पास सिर्फ इंतजार करने, हालात देखते रहने और यह उम्मीद करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा कि बड़े साझेदार देश उसके नागरिकों का भी ख्याल रखेंगे-और यही रुख किसी सुरक्षा से ज्यादा, पाकिस्तान की निर्भरता को कहीं साफ तौर पर उजागर करता है.

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