Amar Dev Paswan
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कोलकाता, बंगाली सिनेमा के महानायक उत्तम कुमार की पहचान सिर्फ एक रोमांटिक हीरो या लोकप्रिय फिल्म स्टार के तौर पर नहीं थी. वे एक दौर की भावनाओं, सपनों और बंगाली मध्यवर्गीय समाज की आकांक्षाओं के प्रतीक बन चुके थे. लेकिन उनकी चमकदार स्टारडम के पीछे छिपे डर, अकेलेपन और असुरक्षा को जिस फिल्म ने सबसे गहराई से सामने रखा, वह थी महान फिल्मकार सत्यजीत रे की ‘नायक’, जो 1966 में रिलीज हुई थी. नायक भारतीय सिनेमा में स्टारडम की पड़ताल करने वाली महत्वपूर्ण फिल्मों में मानी जाती है. खास बात यह है कि सत्यजीत रे ने इस फिल्म की कहानी उत्तम कुमार को ध्यान में रखकर लिखी थी. रे की यथार्थवादी फिल्म भाषा और उत्तम कुमार की लोकप्रिय ‘महानायक’ छवि का यह मेल अपने आप में असाधारण था.
फिल्म में उत्तम कुमार ने अरिंदम मुखर्जी का किरदार निभाया. अरिंदम बंगाली फिल्मों का बेहद लोकप्रिय सुपरस्टार है और राष्ट्रीय पुरस्कार लेने के लिए कोलकाता से दिल्ली ट्रेन से जा रहा है. बाहर से वह आत्मविश्वासी, सफल और लगभग अजेय नजर आता है. लेकिन यात्रा आगे बढ़ने के साथ उसके व्यक्तित्व की दूसरी परतें खुलने लगती हैं. प्रसिद्धि के पीछे छिपा उसका डर, अपराधबोध, अकेलापन और अपने भविष्य को लेकर असुरक्षा धीरे-धीरे सामने आती है. ट्रेन में उसकी मुलाकात अदिति सेनगुप्ता, यानी शर्मिला टैगोर द्वारा निभाई गई एक पत्रकार, से होती है. अदिति एक महिला पत्रिका के लिए काम करती है और फिल्म स्टार की चमक से प्रभावित होने के बजाय उससे असहज सवाल पूछती है. यहीं से नायक सिर्फ एक ट्रेन यात्रा नहीं रह जाती. यह एक ऐसे व्यक्ति की आंतरिक यात्रा बन जाती है, जो लाखों लोगों का चहेता होने के बावजूद खुद अपने भीतर कई सवालों से जूझ रहा है.
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नायक की पूरी कहानी लगभग 24 घंटे की ट्रेन यात्रा के दौरान आगे बढ़ती है. कोलकाता से दिल्ली की ओर जा रही ट्रेन में अरिंदम का वर्तमान और अतीत एक-दूसरे से जुड़ते जाते हैं. सत्यजीत रे ने कहानी को फ्लैशबैक और स्वप्न दृश्यों के माध्यम से इस तरह बुना कि दर्शक धीरे-धीरे समझने लगता है कि सुपरस्टार अरिंदम के भीतर कितना गहरा संघर्ष चल रहा है. फिल्म में सात फ्लैशबैक और दो अतियथार्थवादी स्वप्न दृश्य उसके अतीत और मानसिक स्थिति को सामने लाते हैं। ये दृश्य बताते हैं कि प्रसिद्धि हमेशा सुख नहीं देती. कभी-कभी जिस सफलता को दुनिया उपलब्धि समझती है, वही व्यक्ति के लिए सबसे बड़ा मानसिक बोझ बन जाती है.

फिल्म का एक संवाद अरिंदम के स्टारडम और उसके भीतर छिपे डर को बेहद प्रभावशाली ढंग से सामने लाता है. जब उसे पता चलता है कि उसकी नई फिल्म बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रही, तो वह अपने मैनेजर से सवाल करता है— मैं फिल्म में हूं. क्या इतना काफी नहीं है. यह सवाल सिर्फ अरिंदम का नहीं है. इसके भीतर एक सुपरस्टार का वह डर छिपा है कि कहीं दर्शकों का प्यार खत्म न हो जाए. जिस लोकप्रियता ने उसे पहचान दी, क्या वही लोकप्रियता एक दिन उससे छिन सकती है? नायक इसी सवाल को लगातार दर्शकों के सामने रखती है.
नायक को देखने पर कई जगह अरिंदम मुखर्जी और उत्तम कुमार के वास्तविक जीवन के बीच समानताएं महसूस होती हैं. उत्तम कुमार भी संघर्ष के दौर से निकलकर बंगाली फिल्म उद्योग के सबसे बड़े सितारे बने थे. उनकी सफलता जितनी बड़ी थी, उसे बनाए रखने का दबाव भी उतना ही बड़ा था. लोकप्रियता खोने का डर, आर्थिक असुरक्षा की स्मृतियां और यह आशंका कि स्टारडम हमेशा कायम नहीं रहेगा—ये भावनाएं ‘नायक’ के केंद्रीय चरित्र में दिखाई देती हैं. सत्यजीत रे ने इसी वजह से उत्तम कुमार को इस भूमिका के लिए चुना. कहा जाता है कि रे ने इस किरदार की कल्पना ही उत्तम कुमार को ध्यान में रखकर की थी. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि यदि उत्तम कुमार भूमिका स्वीकार नहीं करते, तो वे फिल्म को आगे नहीं बढ़ाते. क्योंकि अरिंदम के लिए सिर्फ एक अच्छे अभिनेता की जरूरत नहीं थी. उसे ऐसे कलाकार की जरूरत थी, जिसके पास जनता की जबरदस्त लोकप्रियता और निजी संवेदनशीलता—दोनों का अनुभव हो.

नायक का महत्व इस बात में भी है कि इसने बंगाली सिनेमा की दो अलग धाराओं को एक साथ खड़ा किया. एक ओर थे सत्यजीत रे—जिनका नाम यथार्थवादी, गंभीर और कलात्मक सिनेमा के लिए जाना जाता था. दूसरी ओर थे उत्तम कुमार—बंगाली व्यावसायिक सिनेमा के निर्विवाद महानायक. लेकिन ‘नायक’ ने साबित कर दिया कि लोकप्रिय सिनेमा का सुपरस्टार भी बेहद जटिल और मनोवैज्ञानिक किरदार निभा सकता है. उत्तम कुमार ने अरिंदम को सिर्फ एक फिल्म स्टार की तरह नहीं निभाया, बल्कि उसके भीतर छिपे कमजोर और असुरक्षित इंसान को भी बेहद प्रभावशाली ढंग से सामने रखा.
नायक का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रसिद्धि इंसान को वास्तव में खुश करती है. अरिंदम के पास पैसा है, शोहरत है, प्रशंसक हैं और एक सफल करियर है. लेकिन इसके बावजूद वह मानसिक रूप से परेशान है. उसे अपने अतीत की घटनाएं परेशान करती हैं. उसे अपने फैसलों पर पछतावा है और भविष्य को लेकर डर भी. यही विरोधाभास फिल्म को कालजयी बनाता है. दर्शक पर्दे पर एक ऐसे व्यक्ति को देखते हैं, जिसे लाखों लोग आदर्श मानते हैं, लेकिन जो खुद अपने भीतर की कमजोरियों से लड़ रहा है.
रिलीज के बाद ‘नायक’ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिली. 1966 के बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में फिल्म को Special Jury Award और Critics’ Prize (UNICRIT Award) से सम्मानित किया गया. इस फिल्म ने यह स्थापित किया कि भारतीय सिनेमा में स्टारडम की कहानी सिर्फ ग्लैमर और सफलता की कहानी नहीं है. इसके भीतर मनुष्य की असुरक्षा, महत्वाकांक्षा, अकेलापन और भय भी मौजूद हैं.

आज सोशल मीडिया और डिजिटल दौर में स्टारडम का स्वरूप बदल गया है. लेकिन प्रसिद्धि खोने का डर, लगातार सफल रहने का दबाव और सार्वजनिक छवि के पीछे निजी जिंदगी को छिपाने की मजबूरी आज भी मौजूद है. यही वजह है कि ‘नायक’ आज भी आधुनिक दर्शकों से संवाद करती है. फिल्म का सुपरस्टार अरिंदम मुखर्जी भले ही 1966 का किरदार हो, लेकिन उसके सवाल आज के किसी भी सेलिब्रिटी से पूछे जा सकते हैं.
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उत्तम कुमार और सत्यजीत रे की इस ऐतिहासिक कृति को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए Film Heritage Foundation और RDB Organization ने फिल्म के खूबसूरती से रिस्टोर किए गए 2K संस्करण को भारत के विभिन्न सिनेमाघरों में दोबारा प्रदर्शित किया. यह सिर्फ पुरानी फिल्म की स्क्रीनिंग नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के उस दौर की वापसी है, जब एक महान निर्देशक ने एक महानायक की चमक के पीछे छिपे इंसान को देखने की कोशिश की थी. ‘नायक’ इसलिए याद नहीं की जाती कि इसमें उत्तम कुमार एक सुपरस्टार बने थे. यह इसलिए याद की जाती है क्योंकि इसमें एक सुपरस्टार ने पहली बार अपने भीतर छिपे उस इंसान को दर्शकों के सामने रखा, जो डरता है, पछताता है, अकेला पड़ता है और यह सोचता है कि कहीं एक दिन उसकी सारी चमक खत्म न हो जाए. सत्यजीत रे की दृष्टि और उत्तम कुमार के अभिनय ने मिलकर ‘नायक’ को सिर्फ बंगाली सिनेमा की नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की कालजयी विरासत बना दिया.
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