अक्सर कहा जाता है कि इंसान की पहचान उसके कद से नहीं, बल्कि उसके हौसले और कर्मों से होती है. इस कहावत को असम के जोरहाट जिले के तिताबर निवासी टीचर संजीव मजूमदार ने सच साबित कर दिखाया है. महज तीन फीट लंबाई होने के बावजूद उन्होंने अपनी शारीरिक चुनौती को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया. आज वो हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं. शिक्षा के क्षेत्र में उनके अनोखे योगदान के लिए साल 2025 में उन्हें जोरहाट जिले के बेस्ट टीचर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया.
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कौन हैं संजीव मजूमदार?
संजीव मजूमदार साल 2008 से सहायक टीचर के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. नौकरी की शुरुआत में उनकी पोस्टिंग जोरहाट में हुई थी. उस समय रोजाना लंबी दूरी तय करके स्कूल पहुंचना उनके लिए काफी मुश्किल था. बाद में साल 2015 में उनका ट्रांसफर तिताबर में मौजूद श्रीमंत शंकर विद्यापीठ में कर दिया गया, जो उनके घर से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर है. इससे उन्हें काफी राहत मिली और वो पूरी एनर्जी के साथ विद्यार्थियों की पढ़ाई पर ध्यान देने लगे. संजीव की लंबाई कम होने की वजह से उन्हें कक्षा में पढ़ाने के लिए अक्सर बेंच पर खड़ा होना पड़ता है. हालांकि उन्होंने इसे कभी शर्म या कमजोरी का कारण नहीं माना. उनके छात्र भी इसे पूरी तरह नॉर्मल मानते हैं और उनके ज्ञान, मेहनत, व्यवहार का सम्मान करते हैं. उनके लिए संजीव सर एक ऐसे शिक्षक हैं जो हर दिन अपने काम से प्रेरणा देते हैं.
बाकी ज़िम्मेदारियां भी निभाते हैं संजीव
पढ़ाई कराने के अलावा संजीव स्कूल की कई बाकी ज़िम्मेदारियां भी निभाते हैं. वो मिड-डे मील की व्यवस्था देखते हैं, स्कूल परिसर की साफ-सफाई पर नजर रखते हैं और प्रशासनिक कामों में भी एक्टिव भूमिका निभाते हैं. उनके सहयोगियों का कहना है कि वो हमेशा ज़िम्मेदारी से अपना हर काम पूरा करते हैं और कभी किसी काम से पीछे नहीं हटते. संजीव मजूमदार का जीवन सिर्फ स्कूल तक सीमित नहीं है. वो समाज सेवा में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं. स्कूल के बाद भी बच्चों को पढ़ाते हैं और हर साल मेधावी विद्यार्थियों को अपनी ओर से ईनाम देकर उनका उत्साह बढ़ाते हैं. उनका मानना है कि शिक्षा सिर्फ नौकरी नहीं बल्कि समाज निर्माण का सबसे मजबूत माध्यम है. सरकारी शिक्षक बनने का उनका सफर भी आसान नहीं था. उन्हें अपने अधिकार के लिए लंबे समय तक संघर्ष करना पड़ा. नियुक्ति मिलने के बाद उन्होंने अपनी इच्छा से अपने घर से करीब 30 किलोमीटर दूर मौजूद एक स्कूल में सात सालों तक सेवा दी. कठिन यात्रा के बावजूद उन्होंने कभी अपने कर्तव्य से समझौता नहीं किया.
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अक्सर कहा जाता है कि इंसान की पहचान उसके कद से नहीं, बल्कि उसके हौसले और कर्मों से होती है. इस कहावत को असम के जोरहाट जिले के तिताबर निवासी टीचर संजीव मजूमदार ने सच साबित कर दिखाया है. महज तीन फीट लंबाई होने के बावजूद उन्होंने अपनी शारीरिक चुनौती को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया. आज वो हजारों लोगों के लिए प्रेरणा बन चुके हैं. शिक्षा के क्षेत्र में उनके अनोखे योगदान के लिए साल 2025 में उन्हें जोरहाट जिले के बेस्ट टीचर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया.
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कौन हैं संजीव मजूमदार?
संजीव मजूमदार साल 2008 से सहायक टीचर के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. नौकरी की शुरुआत में उनकी पोस्टिंग जोरहाट में हुई थी. उस समय रोजाना लंबी दूरी तय करके स्कूल पहुंचना उनके लिए काफी मुश्किल था. बाद में साल 2015 में उनका ट्रांसफर तिताबर में मौजूद श्रीमंत शंकर विद्यापीठ में कर दिया गया, जो उनके घर से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर है. इससे उन्हें काफी राहत मिली और वो पूरी एनर्जी के साथ विद्यार्थियों की पढ़ाई पर ध्यान देने लगे. संजीव की लंबाई कम होने की वजह से उन्हें कक्षा में पढ़ाने के लिए अक्सर बेंच पर खड़ा होना पड़ता है. हालांकि उन्होंने इसे कभी शर्म या कमजोरी का कारण नहीं माना. उनके छात्र भी इसे पूरी तरह नॉर्मल मानते हैं और उनके ज्ञान, मेहनत, व्यवहार का सम्मान करते हैं. उनके लिए संजीव सर एक ऐसे शिक्षक हैं जो हर दिन अपने काम से प्रेरणा देते हैं.
बाकी ज़िम्मेदारियां भी निभाते हैं संजीव
पढ़ाई कराने के अलावा संजीव स्कूल की कई बाकी ज़िम्मेदारियां भी निभाते हैं. वो मिड-डे मील की व्यवस्था देखते हैं, स्कूल परिसर की साफ-सफाई पर नजर रखते हैं और प्रशासनिक कामों में भी एक्टिव भूमिका निभाते हैं. उनके सहयोगियों का कहना है कि वो हमेशा ज़िम्मेदारी से अपना हर काम पूरा करते हैं और कभी किसी काम से पीछे नहीं हटते. संजीव मजूमदार का जीवन सिर्फ स्कूल तक सीमित नहीं है. वो समाज सेवा में भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं. स्कूल के बाद भी बच्चों को पढ़ाते हैं और हर साल मेधावी विद्यार्थियों को अपनी ओर से ईनाम देकर उनका उत्साह बढ़ाते हैं. उनका मानना है कि शिक्षा सिर्फ नौकरी नहीं बल्कि समाज निर्माण का सबसे मजबूत माध्यम है. सरकारी शिक्षक बनने का उनका सफर भी आसान नहीं था. उन्हें अपने अधिकार के लिए लंबे समय तक संघर्ष करना पड़ा. नियुक्ति मिलने के बाद उन्होंने अपनी इच्छा से अपने घर से करीब 30 किलोमीटर दूर मौजूद एक स्कूल में सात सालों तक सेवा दी. कठिन यात्रा के बावजूद उन्होंने कभी अपने कर्तव्य से समझौता नहीं किया.
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