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Dr. Manmohan Singh: मनमोहन सिंह ने जब देश को आर्थिक संकट से बचाने के लिए कठोर कदम उठाए,तो उन्हें आलोचना का सामना भी करना पड़ा। डॉ.सिंह जानते थे कि जिस तरह गंभीर बीमारी के इलाज के लिए कड़वी दवा खानी पड़ती है। ठीक वैसे ही बेपटरी हुई अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने के लिए कड़े फैसले लेने होंगे,इसलिए वह अपने फैसलों पर अडिग रहे। कुछ समय बाद जब मनमोहन सिंह के सुधारों का असर नजर आया तब विरोधी भी उनके कायल हो गए। उन्हें कांग्रेस के अंदर भी विरोध का सामना करना पड़ रहा था। नरसिम्हा राव की सरकार के नवनियुक्त वित्त मंत्री द्वारा बजट में आर्थिक सुधारों के लिए किये गए प्रावधान अधिकांश लोगों को पच नहीं रहे थे।
मनमोहन सिंह ने बजट भाषण में आर्थिक सुधारों को सही करार देते हुए कहा था,इस सुधार प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य औद्योगिक उत्पादन की दक्षता और अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाना है। ताकि इस उद्देश्य के लिए विदेशी निवेश और विदेशी टेक्नोलॉजी का उपयोग पहले की तुलना में ज्यादा किया जा सके। डॉ सिंह ने आगे कहा था कि हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि भारत का वित्तीय क्षेत्र तेजी से आधुनिक हो और सार्वजनिक क्षेत्र के प्रदर्शन में सुधार आये। तभी हमारी अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्र तेजी से बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था में पर्याप्त तकनीकी और प्रतिस्पर्धी बढ़त हासिल करने में सक्षम हो पाएंगे।
आर्थिक सुधार पर केंद्रित मनमोहन सिंह के इस बजट को मीडिया,अधिकांश कांग्रेस नेता पचा नहीं पा रहे थे। संसदीय दल की बैठक में मनमोहन सिंह को लगातार स्पष्टीकरण देना पड़ रहा था,लेकिन वह अपने निर्णयों पर अडिग रहे। वह हर संभव कोशिश करते रहे कि लोग बजट के दूरगामी परिणामों को समझें। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने अपनी पुस्तक ‘टू द ब्रिंक एंड बैक: इंडियाज 1991 स्टोरी’ में लिखा है,बजट पेश होने के एक दिन बाद 25 जुलाई 1991 को मनमोहन सिंह बिना किसी पूर्व योजना के एक प्रेस कांफ्रेंस में उपस्थित हुए,ताकि यह तय किया जा सके कि उनके बजट का संदेश अधिकारियों की उदासीनता के कारण गलत न हो जाए।
जयराम रमेश ने नरसिम्हा राव के बारे में लिखा है कि जून 1991 में उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद देश में तेजी से बदलाव होने लगे। रमेश की किताब में बजट के बारे में आगे लिखा गया है,मनमोहन सिंह ने अपने बजट को ‘मानवीय चेहरे वाला बजट’ करार दिया था। उन्होंने उर्वरक,पेट्रोल और LPG की कीमतों में तेजी के प्रस्ताव का बचाव किया। जयराम रमेश के अनुसार,केवल दो सांसदों,मणिशंकर अय्यर और नाथूराम मिर्धा ने ही बजट का पूरे दिल से समर्थन किया।
बजट को लेकर कांग्रेस में बढ़ते असंतोष के मद्देनजर PM राव ने 1 अगस्त 1991 को कांग्रेस संसदीय दल की बैठक बुलाई और पार्टी सांसदों को खुलकर अपनी बात रखने का मौका दिया। हालांकि,प्रधानमंत्री खुद बैठक से दूर रहे,क्योंकि वह चाहते थे कि मनमोहन सिंह ही पूरे मामले को संभालें। किताब में बताया गया है कि दो-तीन अगस्त को दो और बैठकें हुईं,जिनमें प्रधानमंत्री राव पूरे समय मौजूद रहे। इन बैठकों में उन्होंने वित्त मंत्री को आर्थिक फैसलों पर खुलकर अपना नजरिया पेश करने की आजादी थी।
पार्टी की तरफ से लगातार बढ़ रहे दबाव के चलते मनमोहन सिंह ने उर्वरक की कीमत में 40 प्रतिशत की वृद्धि को घटाकर 30% करने पर सहमति व्यक्त की,मगर LPG और पेट्रोल की कीमत में वृद्धि पर उन्होंने अपना फैसला नहीं पलटा। जयराम रमेश ने किताब में लिखा है, राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की चार-पांच अगस्त 1991 को दो बार बैठक हुई,जिसमें फैसला लिया गया कि 6 अगस्त को मनमोहन सिंह लोकसभा में क्या वक्तव्य देंगे। हालांकि,इस वक्तव्य में मूल्यवृद्धि वापस लेने की बात को शामिल नहीं किया गया,जिसकी मांग पिछले कुछ दिन से की जा रही थी। इसके बजाये इसमें छोटे किसानों के हितों की रक्षा की बात की गई।
रमेश ने आगे लिखा है,इस तरह दोनों पक्षों की जीत हुई। पार्टी ने पुनर्विचार के लिए मजबूर किया,लेकिन सरकार ने अपने मूल सिद्धांतों… यूरिया के अलावा अन्य उर्वरकों की कीमतों को नियंत्रण मुक्त करना और यूरिया की कीमतों में वृद्धि को बरकरार रखा। बता दें कि मनमोहन सिंह के इस बजट के चलते ही देश की अर्थव्यवस्था उस दौर के संकट से बाहर निकल पाई।
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