Kumar Gaurav
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पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ रहे तनाव और युद्ध की चिंता ने कच्चे तेल की कीमतों पर भारी असर डाला है । इस चिंता के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेट्रोल – डीजल , सोना और विदेशी मुद्रा बचाने का जो संयम मंत्र दिया है, उसे सामान्य अपील नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे संभावित आर्थिक दबावों (महंगाई ) के लिए देश को मानसिक तौर पर पहले से तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। पीएम मोदी ने अपने भाषण में जिन बातों पर जोर दिया, उनके बहुत ही महत्वपूर्ण राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक मायने हैं।
‘एक साल तक न खरीदें सोना’ जानें PM Modi ने क्यों की देशवासियों से ये अपील
प्रधानमंत्री ने लोगों से पेट्रोल-डीजल का समझदारी से इस्तेमाल करने की अपील की। इसका सीधा मतलब यह माना जा रहा है कि सरकार को आने वाले समय में तेल की कीमतों को लेकर चिंता है । भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। अगर पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। ऐसे में सरकार अभी से ईंधन की खपत कम करने का संदेश दे रही है ताकि विदेशी मुद्रा पर दबाव कम हो सके। इस बयान को महंगाई बढ़ने की आशंका से भी जोड़कर देखा जा रहा है, क्योंकि तेल महंगा होने का असर परिवहन, गैस, खाद्य वस्तुओं और रोजमर्रा की चीजों पर पड़ता है। दूसरी बात ये है की अगर सरकार ने इन चीज़ों का दाम बढ़ा भी दिया और जनता इसका इस्तेमाल कम करेगी तो उनके जेब पर महंगाई का कम बोझ पड़ेगा ।
वर्क फ्रॉम होम फिर शुरू करें के पीछे क्या संकेत?
पीएम मोदी ने कोविड काल की तरह वर्क फ्रॉम होम, ऑनलाइन मीटिंग और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग को फिर प्राथमिकता देने की बात कही। इसका सीधा मलबा-ईंधन बचत और खर्च नियंत्रण है।
सरकार यह संकेत दे रही है कि अगर वैश्विक संकट गहराता है तो लोगों को यात्रा और ईंधन खपत कम करने की आदत डालनी पड़ सकती है। यह बयान इस बात का भी संकेत माना जा रहा है कि सरकार आने वाले समय में सावधानी आधारित अर्थव्यवस्था का माहौल बनाना चाहती है, जहां गैर-जरूरी यात्रा और खर्च कम किए जाएं।
मेट्रो, कार पूलिंग और रेलवे फ्रेट पर जोर क्यों?
प्रधानमंत्री ने पब्लिक ट्रांसपोर्ट, कार पूलिंग और माल धुलाई के लिए सड़क परिवहन की जगह – रेलवे फ्रेट के इस्तेमाल पर जोर दिया। इसका सीधा संबंध पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने से है।
रेलवे का बड़ा हिस्सा बिजली आधारित है, इसलिए सरकार चाहती है कि माल ढुलाई सड़क की बजाय रेल से ज्यादा हो। इससे डीजल की खपत कम होगी। कार पूलिंग और मेट्रो के इस्तेमाल से बड़े शहरों जहां मेट्रो की सुविधा उपलब्ध है वहां पेट्रोल डीजल की खपत कम होगी ।
विदेश यात्रा टालिए का क्या संदेश?
पीएम मोदी ने लोगों से एक साल तक विदेशी यात्राएं टालने पर विचार करने को कहा। इसे विदेशी मुद्रा बचत से जोड़कर देखा जा रहा है। जब भारतीय बड़ी संख्या में विदेश यात्रा करते हैं तो डॉलर में खर्च बढ़ता है। अगर उसी समय तेल आयात का बिल भी बढ़ जाए तो विदेशी मुद्रा भंडार पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
डॉलर के सामने पस्त हुआ रुपया! 95 के पार पहुंचा भाव
सरकार का संकेत यह माना जा रहा है कि आने वाले समय में डॉलर की मांग और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है, वैसे भी लंबे समय से रुपये की ताक़त डॉलर में मुक़ाबले लगातार घटती जा रही है, इसलिए विदेशी खर्च (डॉलर ) कम करने का संदेश दिया जा रहा है।
सोना मत खरीदिए की अपील क्यों महत्वपूर्ण मानी जा रही है?
भारत दुनिया में सोने का सबसे बड़ा उपभोक्ता देशों में शामिल है। सोना भी बड़े पैमाने पर आयात होता है और इसके लिए भारत सरकार को डॉलर में भुगतान करना पड़ता है।
समग्रता से पीएम मोदी का संयम मंत्र सीधा सीधा विदेशी मुद्रा बचाने को लेकर दिया गया । अगर तेल और सोना दोनों का आयात बिल बढ़ता है तो सरकारी खजाने पर तो दबाव बढ़ेगा ही, डॉलर के मुक़ाबले रुपया की ताकत और ज्यादा कमजोर होगी । पीएम ने सीधे तौर पर देश की जनता को समझाये हुए “आर्थिक सतर्कता” बरतने का आग्रह किया है ।
पहले भी संकट के समय प्रधानमंत्रियों ने जनता से मांगा था सहयोग
भारत में राष्ट्रीय संकट के दौरान प्रधानमंत्रियों द्वारा जनता से संयम और त्याग की अपील का लंबा इतिहास रहा है। सन 1960 के दशक में खाद्यान्न संकट और युद्ध जैसी परिस्थितियों के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने लोगों से सप्ताह में एक समय भोजन छोड़ने की अपील की थी। उनका कहना था कि अगर लोग स्वेच्छा से थोड़ा त्याग करें तो देश को विदेशी सहायता पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
शास्त्री जी ने पहले खुद अपने परिवार के साथ व्रत रखा और उसके बाद देशवासियों से शास्त्री व्रत रखने की अपील की। इसका व्यापक असर हुआ और लाखों लोगों ने सप्ताह में एक समय भोजन छोड़ना शुरू किया। कई होटल और रेस्तरां भी निर्धारित समय पर बंद रहने लगे।
इसी दौर में शास्त्री जी ने जय जवान, जय किसान का नारा दिया, जिसे आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय अनुशासन के प्रतीक के रूप में देखा गया।
इसके बाद 1971 युद्ध और बांग्लादेश शरणार्थी संकट के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी जनता से सहयोग मांगा था। उन्होंने रक्षा कोष में दान देने, गैर-जरूरी खर्च कम करने, बिजली बचाने और विलासिता से दूर रहने की अपील की थी ताकि संसाधनों का इस्तेमाल राष्ट्रीय जरूरतों के लिए किया जा सके।
बताया जाता है कि इंदिरा गांधी ने खुद अपने आभूषण दान कर प्रतीकात्मक संदेश दिया था। उस समय देशभर में राष्ट्रीय रक्षा कोष के लिए बड़े पैमाने पर योगदान आया था।
इसी वजह से प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदा अपील की तुलना भी पुराने दौर की उन अपीलों से की जा रही है, जब सरकारें वैश्विक या राष्ट्रीय संकट के समय जनता से “साझा त्याग” और “राष्ट्रीय सहयोग” की भावना के साथ जुड़ने का आग्रह करती थीं।
विपक्ष इसे कैसे देख रहा है?
विपक्ष का कहना है कि प्रधानमंत्री की अपील दरअसल आर्थिक दबाव और संभावित महंगाई की स्वीकारोक्ति है। विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं कि अगर अर्थव्यवस्था मजबूत है तो जनता से संयम और बचत की अपील क्यों करनी पड़ रही है। कुछ विपक्षी नेताओं ने यह भी कहा कि चुनाव के दौरान बड़े पैमाने पर हवाई यात्राएं, रोड शो और प्रचार अभियान चलाए गए, लेकिन अब जनता से ईंधन बचाने को कहा जा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार वैश्विक संकट के बहाने अपनी आर्थिक चुनौतियों को जनता के “त्याग” से संभालना चाहती है।
क्या सरकार जनता को संभावित मुश्किल दौर के लिए तैयार कर रही है?
प्रधानमंत्री का यह बयान “प्री-एम्प्टिव मैसेजिंग” भी हो सकता है। यानी सरकार पहले से जनता को यह समझाने की कोशिश कर रही है कि वैश्विक हालात कठिन हैं और आगे कुछ आर्थिक दबाव बढ़ सकते हैं।अगर पश्चिम एशिया संकट लंबा खिंचता है तो:
ऐसे में पीएम मोदी का “संयम” संदेश सिर्फ अपील नहीं बल्कि संभावित आर्थिक चुनौतियों के लिए सामाजिक और राजनीतिक तैयारी के रूप में भी देखा जा सकता है।
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