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भारत एक सोच

क्या बांग्लादेश की आग का भारत पर भी असर होगा? जानें कट्टरपंथी उस्मान हैदी को किसने हीरो बनाया

बांग्लादेश की आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी घटकर आठ फीसदी से भी कम हो चुकी है. हालांकि, वहां के गोपालगंज, मौलवी बाजार, ठाकुरगांव और खुलना में हिंदुओं की आबादी 20 फीसदी से अधिक है. बांग्लादेश पॉलिटिक्स में हिंदू वोटरों अहम भूमिका निभाते रहे हैं.

बांग्लादेश हिंसा की आग में जल रहा है, वहां एक तरह से कट्टरपंथियों की अघोषित सरकार है. भारत विरोधी छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद से कट्टरपंथी सड़कों पर हैं…बांग्लादेश में भारतीय उच्चायोग के बाहर नारेबाजी और पत्थरबाजी हुई . मैमनसिंह शहर में एक हिंदू की बहुत निर्ममता से पीट-पीटकर हत्या कर दी गयी . ये सब उस बांग्लादेश में हो रहा है – जिसका जन्म ही भारत की वजह से हुआ . भारतीय फौज के शूरवीरों ने अपने लहू से बांग्लादेश को जन्म दिया . लेकिन, आज उसी बांग्लादेश में कट्टरपंथी इस कदर हावी है कि वो भारत के एहसानों को भूल चुके हैं . भारत विरोधी एजेंडा को आगे बढ़ाने में लगे हैं . इतना ही नहीं, बांग्लादेश के कट्टरपंथी मुल्क से बंग-बंधु यानी मुजीब-उर रहमान के हर निशान को मिटाने पर आमादा हैं . करीब डेढ़ साल पहले कट्टरपंथियों ने बांग्लादेश में ऐसे हालात पैदा कर दिए – जिससे तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को इस्तीफा देकर मुल्क छोड़ना पड़ा . उसके बाद से बांग्लादेश की कमान मोहम्मद यूनुस के हाथों में है…जहां फरवरी में चुनाव होना है . बांग्लादेश को कट्टरपंथियों ने फिर बारूद के ढेर पर बैठा दिया है . बांग्लादेश और भारत 4 हजार किलोमीटर से अधिक लंबी अंतर्राष्ट्रीय सीमा साझा करते हैं . दोनों मुल्कों के बीच कई प्वाइंट ऐसे हैं–जहां तय करना मुश्किल होता है कि कदम भारतीय सीमा में हैं या फिर बांग्लादेश की सीमा में. बांग्लादेश से सटे पश्चिम बंगाल और असम में भी अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. अब सवाल उठता है कि क्या ढाका की आग का भारत पर भी असर होगा ? बांग्लादेश के कट्टरपंथी आखिर चाहते क्या हैं? कट्टरपंथियों को कौन हवा-पानी दे रहा है ? कहीं बांग्लादेश में चुनाव टालने के लिए मोहम्मद युनूस की अंतरिम सरकार ही कट्टरपंथियों को हवा तो नहीं दे रही है ? कट्टरपंथी शरीफ उस्मान हैदी को आखिर किसने हीरो बनाया ? बांग्लादेश में एक कट्टरपंथी को इतना सम्मान देने के पीछे असली खेल क्या है? मैं आपको बताने की कोशिश करूंगी कि बांग्लादेश में जो कुछ हो रहा है, उसकी जड़ें कितनी गहरी हैं? वहां की फिजाओं में हिंदुओं के लिए नफरत किसने भरी? बांग्लादेश के कट्टरपंथी हिंदुओं पर हमला कब से करते आ रहे हैं?

बांग्लादेश में चुनाव की तारीखों का ऐलान हुआ 11 दिसंबर को और अगले दिन यानी 12 दिसंबर को ढाका में कट्टरपंथी छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी को गोली मार दी गईं . सिंगापुर में इलाज के दौरान हादी की मौत हो गईं और उसके बाद बांग्लादेश में हिंसा भड़की . बांग्लादेश में चुनाव की तारीख 12 फरवरी को तय है . हादी ढाका में 8 नंबर सीट से इंकलाब मंच का उम्मीदवार था. ये आज के बांग्लादेश का चाल, चरित्र और चेहरा है,जिसमें उस्माद हादी जैसे कट्टरपंथी को वहां की हुकूमत ने शहीद करार दिया..इस कट्टरपंथी के लिए बांग्लादेश सरकार ने एक दिन के राजकीय शोक की घोषणा की है . ऐसे में सबसे पहले समझते हैं कि बांग्लादेश को बारूद के ढेर पर किसने बैठाया और 32 साल के शरीफ उस्मान हादी में ऐसा क्या था – जिसके पीछे कट्टरपंथी इतनी मजबूती से खड़े थे .

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सामने आई तस्वीरों में देखा गया कि ढाका में राष्ट्रीय संसद भवन के ठीक दक्षिण में स्थित माणिक मिया एवेन्यू पर लोगों का सैलाब कट्टरपंथी छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी के नमाज-ए-जनाजा के लिए जुटा था…32 साल के उस्माद हादी को बांग्लादेश में करीब-करीब उसी तरह सुपुर्द-ए-खाक किया गया, जैसे किसी बड़े नेता को किया जाता है . मोहम्मद युनुस की अंतरिम सरकार ने उस्मान हादी को शहीद घोषित किया..एक दिन के राजकीय शोक का ऐलान किया … नमाज-ए-जनाजा में व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस और पैरामिलिट्री की तैनाती की .

ढाका से करीब 1800 किलोमीटर दूर दिल्ली में बांग्लादेश दूतावास का झंडा झुका रहा. ये आज का बांग्लादेश है – जो कट्टरपंथियों को न सिर्फ पालता-पोसता और संरक्षण देता है . बल्कि, उनके सम्मान में झंडा भी झुका देता है . बंग्लादेश में चुनाव की तारीखों के ऐलान के अगले दिन यानी 12 दिसंबर को हादी को गोली मार दी गईं…इलाज के लिए उसे सिंगापुर ले जाया गया. लेकिन, उसकी जान नहीं बची…उस्मान हादी पर हमले के बाद बांग्लादेश में हिंसा का दौर शुरू हो गया..देश से अलग-अलग हिस्से से आगजनी, पथराव और प्रदर्शन की तस्वीरें आने लगीं . दरअसल, कट्टरपंथी छात्र नेता हादी भारत विरोधी और भड़काऊ बातें करता था .

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आरोप है कि उस्माद हादी ने एक नक्शा भी सर्कुलेट किया था-जिसे ग्रेटर बांग्लादेश का नाम दिया गया . इसमें भारत के कई राज्यों को ग्रेटर बांग्लादेश के नक्शे का हिस्सा दिखाया गया. जिसके ऊपर लिखा था – सल्तनत-ए-बांग्ला . दरअसल, ग्रेटर बांग्लादेश की थ्योरी कट्टरपंथियों को बहुत शूट करती है. अब उसकी मौत को राजनीतिक मुद्दा बनाकर कट्टरपंथी बंग्लादेश में सत्ता हासिल करने के लिए माहौल बनाने में लगे हैं . कट्टरपंथी हादी के समर्थन में नेशनल सिटीजन पार्टी यानि NCP और स्टूडेंट्स अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन यानि SAD से जुड़े कार्यकर्ता सड़कों पर हैं. कट्टरपंथियों के निशाने पर भारत है . ढाका में भारतीय दूतावास के बाहर प्रदर्शन से पथराव की तस्वीरें आईं . ये कट्टरपंथियों के वर्चस्व वाले बांग्लादेश का मिजाज है-जिसमें मैमनसिंह के भालुका क्षेत्र में हिंदू युवक दीपूचंद्र दास की बेरहमी से हत्या कर दी गयीं..25 साल के दीपू पर ईशनिंदा का आरोप था . इसी तरह झिनाइदाह जिले में कट्टरपंथियों ने सरेआम एक गरीब हिंदू रिक्शा चालक गोपाल बिस्वास पर हमला कर दिया .

दलील दी जा रही है कि कट्टरपंथी बांग्लादेश को हिंसा की आग में तेज कर चुनाव टालने की रणनीति को आगे बढ़ा रहे हैं. भले ही प्रतिबंध की वजह से अवामी लीग चुनावी प्रक्रिया से बाहर है – लेकिन, उसका मजबूत आधार कट्टरपंथियों को डरा रहा है.शायद इसीलिए बांग्लादेश में बंग-बंधु यानी मुजीब-उर-रहमान के हर निशान को मिटाने की हर संभव कोशिश कट्टरपंथी कर रहे हैं..यहां तक की कभी कट्टरपंथियों की हमदर्द रही बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी BNP नेताओं को भी निशाना बनाया जाने लगा है. लक्ष्मीपुर में एक BNP नेता के घर को आग के हवाले कर दिया गया… जिसमें 7 साल की एक बच्ची की मौत और कुछ के झुलसने की खबर है. मतलब, अगले कुछ दिनों में बांग्लादेश की आग ठंडी होगी या और भड़केगी…भविष्यवाणी करना मुश्किल है .

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उस्माद हादी ग्रेटर बांग्लादेश के एजेंडा को आगे बढ़ाने में लगा हुआ था . पिछले साल अगस्त में जब कट्टरपंथियों ने शेख हसीना सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला…तो उसमें उस्मान हादी एक बड़े चेहरे के तौर पर उभरा . दरअसल, शेख हसीना सरकार ने बांग्लादेश में कट्टरपंथियों को कुचलने में कोई कसर नहीं छोड़ी, उनका भारत से लगाव भी किसी से छिपा नहीं था . ऐसे में बांग्लादेशी कट्टरपंथियों को बाहरी ताकतों से भी मदद मिली . नतीजा ये रहा कि कट्टरपंथियों ने छात्रों को आगे कर शेख हसीना को मुल्क छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया . अब भारत के सामने चुनौती ये है कि अगर बांग्लादेश में इसी तरह हिंसा जारी तो वहां के अल्पसंख्यक हिंदू सरहद पार करने की कोशिश करते दिख सकते हैं. बांग्लादेश से लगे भारत के राज्यों खासतौर से पश्चिम बंगाल और असम में घुसपैठ की घटनाएं बढ़ सकती हैं. बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों में खासकर हिंदू और हिंदू मंदिरों पर हमले का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है .

शेख हसीना सरकार के तख्तापलट के दौरान भी बांग्लादेश से हिंसा की भयानक तस्वीरें सामने आई थीं. खौफ के साए में बांग्लादेश के नागरिक सरहदी इलाकों में बॉर्डर लाइन के पास पहुंच गए थे, अपनी जान बचाने के लिए भारत की सीमा में दाखिल होना चाहते थे. बांग्लादेश में अगर इसी तरह हिंसा का दौर चला, अल्पसंख्यकों पर कट्टरपंथियों के हमले जारी रहे तो बांग्लादेश से लगी 4 हजार किलोमीटर से अधिक लंबी सीमा पर ऐसी तस्वीरें फिर से दिख सकती हैं. ऐसे में नेता से पूर्व कूटनीतिज्ञ तक बांग्लादेश की आग को भारत के लिए भी खतरे के रूप में देख रहे हैं .

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कांग्रेस सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने बांग्लादेश के मौजूदा हालात को भारत के लिए साल 1971 के बाद की सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती बताया…बांग्लादेश में हिंसा के पीछे इस्लामिक कट्टरपंथ,चीन-पाकिस्तान का बढ़ता दखल और अवामी लीग का कमजोर होना बताया गया है . संसदीय समिति ने सुझाव दिया है कि बांग्लादेश के विकास में सहयोग से ही समस्या का समाधान किया जा सकता है . वहीं, अगर बांग्लादेश में कट्टरपंथी मजबूत होते हैं तो भारत के सामने बांग्लादेश की ओर से घुसपैठ रोकना बड़ी चुनौती होगी … ये किसी से छिपा नहीं है कि मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार किस तरह कट्टरपंथियों के इशारे पर चल रही है .

अब सवाल उठता है कि बांग्लादेश की आग को किस तरह शांत किया जाए ? जब बांग्लादेश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी ही चुनाव से दूर रहेगी – तो फिर चुनाव का क्या मतलब रह जाएगा? बांग्लादेश के लोगों के सामने चुनाव में कट्टरपंथी ही विकल्प के रूप में दिखेंगे तो अवाम क्या करेगी? कट्टरपंथी अगर सत्ता में आ गए तो वो भारत विरोधी नफरती एजेंडा को बढ़ाएंगे, सल्तनत-ए-बांग्ला के प्लान के लिए तिकड़म करेंगे. पिछले दरवाजे से भारत विरोधी ताकतें कट्टरपंथियों को मजबूत करती रहेंगी . ऐसे में बांग्लादेश की जमीन पर खासतौर से हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ेंगे. भारत के खिलाफ साजिश बढ़ने के भी चांस हैं. बांग्लादेश की 4 हजार किलोमीटर से लंबी सीमा भारत के लिए नए तरह की चुनौती के रूप में सामने आ सकती है .

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अब ये समझना भी जरूरी है कि आखिर बांग्लादेश के DNA में हिंदुओं को लेकर इतनी नफरत कहां से आईं ? इसके लिए इतिहास के पन्नों को पलटना पड़ेगा . बात 1940 के दशक की है . बंगाल की जमीन पर आजादी की लड़ाई टॉप गियर में चल रही थी . मोहम्मद अली जिन्ना की अगुवाई वाली मुस्लिम लीग बहुत पहले से मुस्लिमों के लिए अलग मुल्क की मांग कर रही थी…मोहम्मद इकबाल और चौधरी रहमत अली ने मुस्लिमों के लिए जिस अलग मुल्क का खांचा खींचा था. उसमें बंगाल का जिक्र नहीं था . लेकिन, बंगाल के सामाजिक समीकरण और अंग्रेजों की साजिश ने हिंदू-मुस्लिम राजनीति के लिए जमीन तैयार कर दी . उस दौर में बंगाल की आबादी में हिंदुओं की तादाद 42 फीसदी थी और मुस्लिमों की 33 फीसदी . तब बंगाल में दो राजनीतिक दल आमने-सामने थे…एक हिंदू महासभा और दूसरा मुस्लिम लीग . कांग्रेस का बंगाल को लेकर रवैया ढुलमुल वाला था . बंगाल में मुस्लिम लीग के सबसे बड़े हुआ करते थे- हुसैन सुहरावर्दी . जिन्होंने राजनीति की शुरुआत चितरंजन दास की स्वराज पार्टी से की…बाद में इंडिपेंडेंट मुस्लिम पार्टी बनाई . कुछ वर्षों में ही बंगाल पॉलिटिक्स में बड़ा नाम बन गए सुहरावर्दी और वो मोहम्मद अली जिन्ना के मुस्लिमों के लिए अलग देश के विचार के साथ मजबूती से खड़े हो गए. सुहरावर्दी का साथ मिलने से मुस्लिम लीग भी बहुत ताकतवर बनी . इस तरह सुहरावर्दी की वजह से बंगाल मुस्लिम लीग के पाकिस्तान प्लान में जुट गए. मोहम्मद अली जिन्ना कई मौकों पर कह चुके थे कि हिंदू भारत और मुस्लिम भारत को विभाजित करना चाहिए क्योंकि दोनों देश बिल्कुल अलग हैं . कुछ चीजें दोनों की विपरीत हैं . हम भारत का विभाजन हिंदुस्तान और पाकिस्तान के रूप में चाहते हैं .

जिन्ना को अपने खास-म-खास हुसैन सुहरावर्दी पर पूरा भरोसा था तब वो बंगाल के प्रीमियर यानी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर थे. डायरेक्ट एक्शन वाले दिन कलकत्ता में मारकाट मच गई…उस दिन कलकत्ता की सड़कों पर न पुलिस थी…न सेना . दंगाइयों को रोकने वाला कोई नहीं था.16 अगस्त 1946 को सुहरावर्दी ने पहले से छुट्टी का ऐलान कर रखा था . कलकत्ता की सड़कों पर 72 घंटे तक खून बहा जिसमें हजारों लोग मारे गए .

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मुस्लिम लीग हिंदू बहुल कलकत्ता और उसके आसपास के कुछ जिलों को पाकिस्तान में मिलाना चाहती थी . तब एक सोच ये थी कि हिंसा से हिंदुओं को भागने पर मजबूर कर कलकत्ता में मुस्लिमों की आबादी बढ़ाई जा सकती है … कलकत्ता दंगों के बाद नोआखली तथा टिपरा में भीषण दंगे शुरू हुए..उस दौर में पूर्वी बंगाल से भाग कर करीब 10 लाख हिंदुओं ने पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा जैसे राज्यों में शरण ली.

सुहरावर्दी एक ऐसा स्वतंत्र बंगाल चाहते थे..जो न पाकिस्तान का हिस्सा बने, न हिंदुस्तान का . बंटवारे के नाम पर हिंदू और मुसलमानों के बीच खून-खराबा जारी था . आजादी से ठीक 5 दिन पहले कलकत्ता दंगों की आग में जल रहा था..पूरे भारत में सबसे ज्यादा बेकाबू हालात कलकत्ता में थे . लेकिन, महात्मा गांधी के सत्याग्रह, अहिंसा और अनशन के प्रयोग से किसी तरह कलकत्ता में शांति लौटी .

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बंटवारे के बाद पाकिस्तान अलग मुल्क बना . लेकिन, वहां हिंदुओं पर अत्याचार जारी रहा…तब के पूर्वी पाकिस्तान में रहने वाले अल्पसंख्यक हिंदुओं की संपत्ति हड़पने के लिए वेस्टेड प्रॉपर्टीज एक्ट को मोहरे की तरह इस्तेमाल किया गया…इसके तहत हुकूमत किसी भी संपत्ति को स्थाई या अस्थाई तौर पर अपने कब्जे में ले सकती थी. 1951 में एक ऐसा कानून बना-जिसके मुताबिक बंटवारे के वक्त पूर्वी पाकिस्तान से गए लोगों की संपत्ति सरकार को जब्त करने की ताकत मिल गई .

साल 1964 में Disturbed Persons (Rehabilitation Ordinance) लाया गया . इस कानून के तहत अल्पसंख्यकों को बिना सरकार की इजाजत के अलच संपत्ति या घर-जमीन ट्रांसफर करने पर रोक लगा दी गई … इस अध्यादेश ने पूर्वी पाकिस्तान में एक तरह से हिंदू जमींदारों की कमर तोड़ दी . समय-समय पर हिंदू और मुस्लिमों के बीच दंगे होते रहे…जिसे पूरी प्लानिंग के साथ वहां के कट्टरपंथी भड़काते . ऐसे में धीरे-धीरे हिंदू पूर्वी पाकिस्तान छोड़ने लगे. लेकिन, पूर्वी पाकिस्तान में वहां के मुस्लिमों के भीतर एक दूसरे तरह के असंतोष की आग धधकने लगी थी .

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सुहरावर्दी के हाथ कलकत्ता में मारे गए हजारों निर्दोष लोगों के खून से सने थे . लेकिन, उनका व्यक्तित्व कैसा था…इसकी एक तस्वीर डोमिनिक लापिएर और लैरी कॉलिन्स की किताब फ्रीडम एट मिडनाइट में मिलती है . इसमें लिखा गया है कि 1942 के आकाल में पूरा बंगाल तबाह हो गया था . लेकिन, सुहरावर्दी ने कलकत्ता के भूखे मरते लोगों के लिए भेजा गया लाखों टन अनाज बीच में ही रोक कर काले बाजार में बेचा और करोड़ों रुपये कमाए . सुहरावर्दी हमेशा ही टिप-टॉप रहते और हर तरह का शौक पाले हुए थे . खैर, बंगाल में मुस्लिमों के DNA में हिंदुओं के प्रति जहर भरने में सुहरावर्दी की बड़ी भूमिका रही . इतना ही नहीं, वो बंगाल को अलग देश बनाने का ख्वाब भी पाले हुए थे… हालांकि, उनका ये सपना पूरा नहीं हो पाया . आजादी के साथ भारत का बंटवारा भी हुआ . पाकिस्तान का एक हिस्सा भारत के पश्चिम में और दूसरा पूरब में . दोनों हिस्सों के लोगों के रहन-सहन, बोली, खान-पान और तौर-तरीकों में कोई मेल नहीं…बस दोनों हिस्सों को जोड़ने वाला धागा इस्लाम था . भीतर खाने हिंदुओं को लेकर टीस … जिसे कट्टरपंथी हवा दे रहे थे. इसका अंजाम किस रूप में सामने आया … इसे एक आंकड़े के जरिए समझा जा सकता है. साल 1951 में पूर्वी पाकिस्तान यानी आज के बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी 22 फीसदी थी…जो 1974 आते-आते घटकर 12 फीसदी हो गई . ऐसे में सवाल उठता है कि बांग्लादेश की आबादी में लगातार घट रहे हिंदू कहां गए ? बांग्लादेश में कट्टरपंथी अपने मुल्क के उदार सोच के रहनुमाओं के साथ भी कैसा सुलूक करते हैं- इसे समझने के लिए बंग-बंधु मुजीब-उर-रहमान के आरंभ और अंत को भी समझना जरूरी है . इसके लिए 1970 के दशक का पन्ना पलटना जरूरी है .

पूर्वी पाकिस्तान की सियासत में कभी सुहरावर्दी की सरपरस्ती में सियासत शुरू करने वाले शेख मुजीब-उर-रहमान का कद तेजी से बढ़ रहा था. पश्चिमी पाकिस्तान में बैठे हुक्मरान पूर्वी पाकिस्तान के लोगों के साथ जिस तरह का बर्ताव कर रहे हैं- उसके खिलाफ असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा था . मामला तब संगीन हो गया जब उर्दू को पूरे पाकिस्तान की एकमात्र भाषा बनाने बनाने की तैयारी हो गयी..भाषा और बंगाली राष्ट्रवाद के नाम पर पूर्वी पाकिस्तान के लोग एकजुट होने लगे .

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शेख मुजीब पाकिस्तान के बांग्ला भाषी लोगों की अगुवाई कर रहे थे..दिसंबर1970 में हुए चुनाव में दो सीटों को छोड़कर पूर्वी पाकिस्तान की सभी सीटों पर शेख मुजीब की पार्टी अवामी लीग की जीत हुई…लेकिन, तत्कालीन राष्ट्रपति याह्या खान ने अवामी लीग को सत्ता सौंपने से इनकार कर दिया..ऐसे में शेख मुजीब ने अलग बांग्लादेश के लिए आंदोलन तेज कर दिया … जिसे कुचलने के लिए 25 मार्च, 1971 को पाकिस्तानी आर्मी ने ढाका में ऑपरेशन सर्चलाइट की शुरुआत की .

ऑपरेशन सर्चलाइट में लाखों लोग मारे गए . कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी अलग बांग्लादेश आंदोलन का विरोध कर रही थी…उसके पीछे पाकिस्तानी आर्मी खड़ी थी . कट्टरपंथी ब्रिगेड ने अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना शुरू किया . जिससे तब के पूर्वी पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू भारत के सरहदी राज्यों में दाखिल होने लगे . पूर्वी पाकिस्तान से भागकर पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और असम पहुंचे लाखों शरणार्थियों के लिए कैंप लगाए गए…भारत की ओर से लगाए गए शरणार्थी कैंपों में लगातार भीड़ बढ़ती जा रही थी . ऐसे में तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूर्वी पाकिस्तान में भारतीय फौज को आगे बढ़ने का आदेश दिया . पहला हमला पाकिस्तान की ओर से किया गया … जो
16 दिसंबर, 1971 को ढाका में पाकिस्तानी फौज के सरेंडर के साथ खत्म हुआ . पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों ने भारतीय फौज के सामने हथियार रख दिए … जो दुनिया के इतिहास में सबसे बड़ा सरेंडर है . पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए…दुनिया के नक्शे पर एक नए मुल्क के रूप में बांग्लादेश का जन्म हुआ .

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बांग्लादेश की कमान शेख-मुजीब के हाथों में आईं . वो अपने बांग्लादेश को कट्टरपंथियों से पूरी तरह आजाद रखने का ख्वाब पाले हुए थे … उन्होंने बिना लाग-लपेट कहा कि बांग्लादेश में सभी धर्मों के लोग अपने धर्म का पालन करने के लिए आजाद है… लेकिन, एक बड़ा सच यही भी है कि 1951 से 1974 के बीच बांग्लादेश की आबादी में हिंदू 22 फीसदी से घटकर 12 फीसदी हो गए…1964 से 1971 के बीच 17 लाख हिंदुओं ने बांग्लादेश छोड़ा .

बांग्लादेश में हिंदुओं के प्रति नफरत का जहर घोलने में जमात-ए-इस्लामी की बड़ी भूमिका रही है. इस कट्टरपंथी संगठन की छतरी तले खड़े लोगों ने संस्कृति और धर्म के बीच टकराव पैदा करने की कोशिश की . बांग्लादेश में भारत विरोधी एजेंडा को जमात समर्थक दशकों से हवा देते आ रहे हैं . जमात-ए-इस्लामी को पाकिस्तान से समर्थन मिलता रहा है. भले ही मुजीब-उर-रहमान का राजनीतिक उभार नफरती सोच वाले हुसैन सुहरावर्दी की सरपरस्ती में हुआ..लेकिन, बंग-बंधु ने अपने बांग्लादेश को समाजवाद, राष्ट्रवाद, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के मजबूत स्तंभों पर खड़ा करने की कोशिश की, जिसमें मजहब के आधार पर भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं थी . कट्टरपंथी सोच को दफन करने का रास्ता संविधान में निकाला गया . भारत के साथ बेहतर रिश्तों बांग्लादेश का बेहतर कल देखा गया. लेकिन, धर्मनिरपेक्षता और भारत से बेहतर रिश्ता रखने वाला बांग्लादेश कट्टरपंथियों को कभी पसंद नहीं आया. साल 1975 में मुजीब-उर-रहमान की तख्तापलट के बाद हत्या कर दी गई…इसके बाद बांग्लादेश को इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ बांग्लादेश में बदल दिया गया . वहां कट्टरपंथी ताकतें हावी होने लगीं…बांग्लादेश में साजिश, नफरत, हिंसा और तख्तापलट का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ…जो बदस्तूर जारी है .>>

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अलग बांग्लादेश में पहली बार मार्च 1973 में आम चुनाव हुए…शेख मुजीब की अवामी लीग ने संसद की 300 सीटों में से 293 जीत लीं…तब भी अवामी लीग पर चुनावों में धांधली के आरोप लगे . शेख मुजीब के तेवरों को तानाशाही के तौर पर देखा जाने लगा . नतीजा ये रहा तीन साल बाद यानी 15 अगस्त, 1975 को बांग्लादेशी आर्मी के कुछ अफसरों ने बंगबंधु यानी शेख मुजीब के घर पर टैंक से हमला किया…जिसमें परिवार के सदस्यों के साथ खुद मुजीब भी मारे गए . हालांकि, विदेश में होने की वजह से उनकी बेटियां शेख हसीना और शेख रेहाना की जान बच गयी . इसके बाद वहां सत्ता की कमान सेना ने संभाली … वहां की सत्ता में पूर्व आर्मी चीफ जियाउर रहमान नए नायक के रूप में उभरे … चुनाव हुए तो उनकी नई नवेली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी BNP को प्रचंड बहुमत मिला. इस पार्टी को पीछे से कट्टरपंथियों का पूरा समर्थन मिल रहा था…जहां अवामी पार्टी सेक्युलर बांग्लादेश की बात कर रही थीं…वहीं, बीएनपी ने सेक्युलरिज्म के लवादे को उतार फेंकने की तैयारी कर चुकी थी . बांग्लादेश अब उसी रास्ते पर था- जिस रास्ते पाकिस्तान बढ़ रहा था . तख्तापलट और साजिश ढाका की फिजाओं में बढ़ती जा रही थी .

सरकारी गेस्ट हाउस में तत्कालीन राष्ट्रपति जियाउर रहमान की हत्या कर दी गई … इसके बाद बांग्लादेश में सत्ता के नए सूरज बने अब्दुल सत्तार, जिन्होंने अंतरिम राष्ट्रपति का पद संभाला . उनके पीछे खड़े थे – जनरल हुसैन मोहम्मद इरशाद . हुक्मरान अपने खेल में व्यस्त थे और बांग्लादेश में मौजूद कट्टरपंथी खुद को ताकतवर बनाने में जुटे थे…वो अल्पसंख्यकों पर हमला कर अपनी ताकत का एहसास कराने में जुटे थे. सालभर में जनरल इरशाद ने किंगमेकर से किंग बनने के लिए बड़ा दांव चला और अब्दुल सत्तार का तख्तापलट कर सत्ता में आ गए . मार्शल लॉ लागू कर दिया . पाकिस्तान की तरह बांग्लादेश में भी चुनाव की खानापूर्ति हो रही थी….ऐसे में 1988 में हुसैन मोहम्मद इरशाद को सत्ता को सत्ता से हटाने के लिए आंदोलन तेज हुआ.. दो वर्षों तक चले आंदोलन के बाद इरशाद को सत्ता छोड़नी पड़ी . निष्पक्ष चुनाव कराने की कोशिश हुई…बीएनपी सत्ता में आई और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठीं- बेगम खालिदा जिया. पूर्व राष्ट्रपति और आर्मी चीफ जियाउर रहमान की पत्नी .

जून 1996 में हुए चुनावों में आवामी लीग की सत्ता में वापसी हुई…बांग्लादेश की कमान शेख मुजीब-उर-रहमान की बेटी शेख हसीना के हाथों में आ गई … उन्होंने अपने पिता के रास्तों पर मुल्क आगे बढ़ाने की कोशिश की. जिसमें भारत के साथ बेहतर रिश्ता और कट्टरपंथियों पर लगाम कसना रहा . बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यकों ने चैन की सांस ली… लेकिन साल 2001 में हुए चुनाव में आवामी लीग हार गई..BNP ने चुनाव में भारी मतों से जीत हासिल की..बेगम खालिदा जिया फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर थीं . बीएनपी के सत्ता में आने के बाद कुछ हफ्तों तक हिंदुओं को ये कहते हुए निशाना बनाया गया कि इन लोगों ने अवामी लीग को वोट दिया है…कुछ समय बाद हिंसा का वो दौर खत्म हो गया . जनवरी 2009 में अवामी लीग की सत्ता में वापसी हुई और प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठीं शेख हसीना..उन्होंने कट्टरपंथियों को कुचलना शुरू किया और अपने पिता की तरह ही भारत के साथ दोस्ती में मुल्क का मुस्तकबिल चमकदार देखा… करीब 15 वर्षों तक लगातार प्रधानमंत्री रहीं..लेकिन, कट्टरपंथियों ने 5 अगस्त, 2024 को उनका तख्तापलट कर दिया . उसके बाद रह-रह कर हिंदुओं को कट्टरपंथी निशाना बना रहे हैं .

बांग्लादेश की आबादी में हिंदुओं की हिस्सेदारी घटकर आठ फीसदी से भी कम हो चुकी है. हालांकि, वहां के गोपालगंज, मौलवी बाजार, ठाकुरगांव और खुलना में हिंदुओं की आबादी 20 फीसदी से अधिक है. बांग्लादेश पॉलिटिक्स में हिंदू वोटरों अहम भूमिका निभाते रहे हैं…कट्टरपंथियों की सोच है कि हिंदू वोट का बड़ा हिस्सा अवामी लीग को जाता है, फिलहाल, अवामी लीग पर प्रतिबंध है. ऐसे में इस चुनाव में अवामी लीग हिस्सा नहीं ले पाएगी . दूसरी ओर, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की सबसे बड़ी नेता खालिदा जिया की सेहत बहुत अच्छी नहीं है . छात्रों की अगुवाई वाली नेशनल सिटीजन पार्टी ने हाल ही में कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी के साथ हाथ मिलाया है . ऐसे में अगर 12 फरवरी को बांग्लादेश में चुनाव होता है तो कट्टरपंथियों ने अपनी तरफ से सत्ता में आने की स्क्रिप्ट तैयार कर ली है . वहां के कट्टरपंथियों की सोच है कि हिंदुओं की मौजूदगी की वजह से बांग्लादेश इस्लामिक राष्ट्र नहीं बन पा रहा है. ऐसे में वहां के कट्टरपंथी हिंदुओं के घर और मंदिरों पर हमला कर खौफ का ऐसा माहौल बनाए रखना चाहते हैं– जिससे बांग्लादेश में सिर्फ मुस्लिम ही रह जाएं . शायद बांग्लादेश के लोग भूल गए हैं कि जब पाकिस्तानी फौज उन पर अत्याचार कर रही थी-तो किसने बचाया ? बांग्लादेश के लिए लड़ने वाले इंडियन आर्मी के जवानों ने कभी नहीं सोचा कि वो हिंदू हैं तो मुस्लिमों को अत्याचार से मुक्ति दिलाने के लिए क्यों लड़ें? लेकिन, वहां कट्टरपंथियों के उकसावे पर अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमला करने वाली उन्मादी भीड़ शायद भूल जाती है कि अगर भारत ने साथ नहीं दिया होता… तो आज उनका वजूद भी न होता . आजादी से पहले हुसैन सुहरावर्दी ने वहां के लोगों के DNA में नफरत और हिंसा मिलाया …उसे आज भी वहां के कट्टरपंथी पालने-पोसने में लगे हुए हैं . ऐसे में डर इस बात का भी है कि कहीं ढाका पर भी कट्टरपंथियों का उसी तरह कब्जा न हो जाए – जैसा सीरिया और अफगानिस्तान में हुआ .

First published on: Dec 20, 2025 09:37 PM

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About the Author

Anurradha Prasad

आकर्ष शुक्ला (Akarsh Shukla) एक अनुभवी पत्रकार हैं, जो पिछले 12 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वर्तमान में वो News 24 Digital टीम को शिफ्ट हेड के तौर पर लीड कर रहे हैं। आकर्ष शुक्ला ने India.com (ZEE Media), 'नवोदय टाइम्स' (पंजाब केसरी ग्रुप), 'ओपेरा न्यूज' और 'वनइंडिया' (डेली हंट) जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करके अपनी व्यापक पत्रकारिता क्षमता का परिचय दिया। उनकी विशेषज्ञता प्रिंट, डिजिटल मीडिया (वेबसाइट) और मोबाइल ऐप्स के माध्यम से खबरों को सजीव और प्रभावी रूप में पेश करने में है। देश-दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों के साथ-साथ आकर्ष को मनोरंजन, लाइफस्टाइल, ट्रेंडिंग और खेल जगत की खबरों का भी बखूबी अनुभव है। आकर्ष शुक्ला, पत्रकारिता को सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि समाज की आवाज और जनसंवाद का एक सशक्त माध्यम मानते हैं।

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Akarsh Shukla

आकर्ष शुक्ला (Akarsh Shukla) एक अनुभवी पत्रकार हैं, जो पिछले 12 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वर्तमान में वो News 24 Digital टीम को शिफ्ट हेड के तौर पर लीड कर रहे हैं। आकर्ष शुक्ला ने India.com (ZEE Media), 'नवोदय टाइम्स' (पंजाब केसरी ग्रुप), 'ओपेरा न्यूज' और 'वनइंडिया' (डेली हंट) जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करके अपनी व्यापक पत्रकारिता क्षमता का परिचय दिया। उनकी विशेषज्ञता प्रिंट, डिजिटल मीडिया (वेबसाइट) और मोबाइल ऐप्स के माध्यम से खबरों को सजीव और प्रभावी रूप में पेश करने में है। देश-दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों के साथ-साथ आकर्ष को मनोरंजन, लाइफस्टाइल, ट्रेंडिंग और खेल जगत की खबरों का भी बखूबी अनुभव है। आकर्ष शुक्ला, पत्रकारिता को सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि समाज की आवाज और जनसंवाद का एक सशक्त माध्यम मानते हैं।

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