पेट्रोल की कीमतें बढ़ने के साथ कार चलाने का खर्च भी लगातार बढ़ रहा है. यही वजह है कि कई लोग अपनी कार में CNG किट लगवाने का ऑप्शन चुन रहे हैं. हालांकि बाजार में आज कई ऐसी कारें भी हैं जिनमें कंपनी की तरफ से ही CNG का विकल्प मिलता है, लेकिन जिन कारों में फैक्ट्री फिटेड CNG नहीं है उनके मालिक ऑफ्टरमार्केट किट लगवाते हैं. इससे रनिंग कॉस्ट कम हो सकती है, लेकिन इसके साथ कुछ नुकसान और सावधानियां भी जुड़ी हैं. ऐसे में इसे लगवाने से पहले ये जानना जरूरी है कि इसमें कौन-कौन से पार्ट्स होते हैं, इसे कैसे फिट किया जाता है और किन कारों में इसे लगवाने के बचना चाहिए.
कैसे लगाया जाता है CNG किट
एक अच्छी वर्कशॉप में आफ्टरमार्केट CNG किट लगाने में करीब 4 से 5 घंटे का समय लग सकता है.सबसे पहले इंजन और स्पार्क प्लाग की जांच की जाती है. इसके पार्ट जैसे रिड्यूसर, इंजेक्टर और CNG ECU को उनकी जगह पर फिट किया जाता है. इसके बाद सिलेंडर को डिग्गी में मजबूत फ्रेम पर बोल्ट की मदद से कसकर लगाया जाता है. इसके बाद कार के नीचे से हाई-प्रेशर पाइप और वायरिंग को सुरक्षित तरीके से बिछाया जाता है. फिटिंग के बाद करीब 2 किलोग्राम गैस भरकर सेंसर और साबुन के पानी की मदद से गैस लीक की जांच की जाती है. आखिर में सॉफ्टवेयर के जरिए किट की ट्यूनिंग की जाती है और रोड टेस्ट किया जाता है.
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CNG किट में लगा होता है सिलेंडर
CNG किट का सबसे जरूरी हिस्सा सिलेंडर होता है. इसे आमतौर पर कार की डिग्गी में लगाया जाता है. ऑटोकार इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक खाली होने पर भी इसका वजन करीब 70 किलो होता है. इसमें करीब 60-65 लीटर गैस स्टोर की जा सकती है. बाजार में हल्के कार्बन फाइबर सिलेंडर भी उपलब्ध हैं लेकिन इनकी कीमत काफी ज्यादा होती है.
CNG किट का सबसे बड़ा फायदा
CNG किट का सबसे बड़ा फायदा इसकी कीमत है. कंपनी के CNG कार खरीदने की तुलना में बाहर से किट लगवाना करीब 25 से 30 फीसदी तक सस्ता पड़ सकता है. इसके अलावा अगर किसी ऑटोमैटिक कार या SUV में CNG चाहिए और कंपनी उस मॉडल में CNG नहीं देती है तो ऑफ्टरमार्केट किट का ऑप्शन बन सकता है.
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CNG किट के कुछ नुकसान भी
कार की वारंटी पर पड़ सकता है असर
आफ्टरमार्केट CNG किट लगवाने का सबसे बड़ा नुकसान कार की वारंटी से जुड़ा है. बाहर से किट लगवाने पर कार कंपनी की इंजन वारंटी खत्म हो जाती है. इसलिए नई कार में किट लगवाने से पहले वारंटी की शर्तों को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए.
डिग्गी में कम हो जाती है जगह
CNG किट में आमतौर पर एक बड़ा सिलेंडर डिग्गी में लगाया जाता है. इससे सामान रखने की जगह कम हो जाती है. इसके मुकाबले कार कंपनियां अब कुछ मॉडल्स में दो छोटे सिलेंडर या कार के नीचे सिलेंडर लगाने जैसी तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं. जिससे डिग्गी में ज्यादा जगह बचत है.
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किन कारों में नहीं लगवाना चाहिए CNG किट?
डीजल कार में CNG किट से बचें
हर कार में इस किट को नहीं लगाया जा सकता. डीजल कारों में कम्प्रेशन-इग्निशन सिस्टम होता है, इसलिए उनमें सामान्य तरीक से CNG किट लगाना संभव नहीं है. ऐसे में डीजल कार को CNG में बदलने का ऑप्शन नहीं चुनना चाहिए.
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हाईब्रिड कारों में भी है दिक्कत
हाईब्रिड कारों में इंजन बार-बार बंद और चालू होता रहता है. इसकी वजह से CNG सिस्टम की कैलिब्रेशन काफी जटिल हो जाती है. इसलिए ऐसी कारों में ऑफ्टरमार्केट CNG किट लगवाना सही ऑप्शन नहीं माना जाता.
कमजोर इंजन वाली कार में न लगवाएं किट
अगर कार का इंजन पहले से खराब या कमजोर कंडीशन में है तो उसमें CNG किट लगवाने से परेशानी बढ़ सकती है. इसलिए किट लगाने से पहले इंजन की कंडीशन अच्छी तरह चेक करना जरूरी है. खराब कंडीशन वाली कार में CNG का इस्तेमाल इंजन पर अतिरिक्त असर डाल सकता है.
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क्या है इसे लगवाने के नियम
- CNG सिलेंडर की सुरक्षा जांच भी बेहद जरूरी है. सरकारी नियम के मुताबिर सिलेंडर का हर 3 साल में हाइड्रोटेस्ट कराना जरूरी है. इस जांच के करीब 3 हजार रुपये खर्च आ सकता है.
- CNG को हर 10 हजार किमी या 3 साल में बदलने की सलाह दी जाती है. इसे बदलने में 1000 रुपये तक का खर्च आ सकता है. समय पर फिल्टर बदलने से CNG सिस्टम को सही तरीके से चलाने में मदद मिलती है.
- CNG कार होने के बावजूद पूरी तरह पेट्रोल का इस्तेमाल बंद नहीं करना चाहिए. कार के फ्यूल सिस्टम को सही स्थिति में रखने के लिए कम से कम 10 फीसदी सफर पेट्रोल पर करने की सलाह दी जाती है.
मान्यता प्राप्त डीलर से ही लगवाएं किट
आफ्टरमार्केट CNG किट हमेशा सरकार से मान्यता प्राप्त डीलर या अच्छी वर्कशॉप से ही लगवानी चाहिए. गलत फिटिंग या खराब क्वालिटी के पार्ट्स सुरक्षा के लिए परेशानी पैदा कर सकते हैं. किट लगवाने के बाद RTO में इसकी जानकारी देकर RC में CNG दर्ज कराना और अपनी इंश्योरेंस कंपनी को भी इसकी सूचना देना जरूरी है.
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Source- Autocarindia