ईरान के सबसे ताकतवर नेता अली खामेनेई की मौत ने देश की सत्ता व्यवस्था में एक बड़ा शून्य पैदा कर दिया है. पिछले 36 सालों से खामेनेई ही ईरान के अंतिम फैसले लेते थे और उनके रहते कभी मतभेद खुलकर सामने नही आए. लेकिन उनके जाते ही शासन के भीतर खींचतान और दरारें दिखने लगी हैं. वर्तमान में संविधान के अनुसार एक तीन सदस्यीय अंतरिम परिषद बनाई गई है जिसमें राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान, न्यायपालिका प्रमुख मोहसेनी-एजेई और धार्मिक विद्वान अलीरेजा अराफी शामिल हैं. हालांकि युद्ध के इस कठिन दौर में यह संवैधानिक ढांचा कमजोर पड़ता दिख रहा है. असलियत यह है कि इस समय ईरान में नीतिगत फैसलों से ज्यादा सैन्य ताकत हावी होती जा रही है जिससे दुनिया भर के रणनीतिकार हैरान हैं.
राष्ट्रपति बनाम IRGC- बयानों से बढ़ी तल्खी
जंग के बीच राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के एक बयान ने ईरान के भीतर ही खलबली मचा दी है. उन्होंने पड़ोसी खाड़ी देशों से हमलों के लिए माफी मांगते हुए कहा था कि जब तक उनकी जमीन का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ नहीं होगा, वे हमला नहीं करेंगे. इस नरम रुख पर रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) और धार्मिक नेता आगबबूला हो गए. धार्मिक नेता हामिद रसाई ने तो सार्वजनिक रूप से राष्ट्रपति के स्टैंड को कमजोर और नामंजूर करार दे दिया. बढ़ते दबाव के चलते राष्ट्रपति को अपना माफीनामा वापस लेना पड़ा. यह घटना साफ दिखाती है कि ईरान की चुनी हुई सरकार और वहां की सैन्य संस्थाओं के बीच तालमेल की भारी कमी है और युद्ध को लेकर सबकी राय अलग-अलग है.
यह भी पढ़ें: नॉर्वे में मचा हड़कंप, ओस्लो में अमेरिकी दूतावास के पास भीषण धमाका
IRGC और अली लारिजानी का बढ़ता कद
खामेनेई की गैर-मौजूदगी में सुरक्षा और सैन्य रणनीति से जुड़े सबसे अहम फैसले अब इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC ले रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक देश की सुरक्षा का रिमोट अब पूरी तरह सेना के हाथ में चला गया है. इस मुश्किल घड़ी में सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव अली लारिजानी एक मुख्य कड़ी बनकर उभरे हैं. वे सेना, सरकार और धार्मिक गुटों के बीच तालमेल बिठाने का काम कर रहे हैं ताकि प्रशासन पूरी तरह ठप न हो जाए. जानकारों का कहना है कि लारिजानी का अनुभव इस समय ईरान को बिखरने से बचाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है. युद्ध के मैदान में मिसाइलें कहां दागी जाएंगी और कब पलटवार होगा, इसमें अब राष्ट्रपति से ज्यादा जनरलों की चल रही है.
कौन बनेगा नया सुप्रीम लीडर? रेस में ये नाम
ईरान को अब एक नए सुप्रीम लीडर की तलाश है जो देश को इस महायुद्ध से बाहर निकाल सके. उत्तराधिकार की इस दौड़ में सबसे पहला नाम अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई का है जो लंबे समय से सत्ता के करीब रहे हैं. दूसरा बड़ा नाम वरिष्ठ धार्मिक नेता अलीरेजा अराफी का है जिनका पकड़ धार्मिक संस्थानों पर काफी मजबूत मानी जाती है. हालांकि इजरायल ने पहले ही चेतावनी दे दी है कि जो भी नया नेता बनेगा, वह सीधे उनके निशाने पर होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक युद्ध जारी है, नए नेता का चुनाव टाला जा सकता है क्योंकि कोई भी इस समय अंतरराष्ट्रीय दबाव और सुरक्षा खतरों की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता. आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि ईरान की कमान किसके हाथ में सुरक्षित रहती है.
ईरान के सबसे ताकतवर नेता अली खामेनेई की मौत ने देश की सत्ता व्यवस्था में एक बड़ा शून्य पैदा कर दिया है. पिछले 36 सालों से खामेनेई ही ईरान के अंतिम फैसले लेते थे और उनके रहते कभी मतभेद खुलकर सामने नही आए. लेकिन उनके जाते ही शासन के भीतर खींचतान और दरारें दिखने लगी हैं. वर्तमान में संविधान के अनुसार एक तीन सदस्यीय अंतरिम परिषद बनाई गई है जिसमें राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान, न्यायपालिका प्रमुख मोहसेनी-एजेई और धार्मिक विद्वान अलीरेजा अराफी शामिल हैं. हालांकि युद्ध के इस कठिन दौर में यह संवैधानिक ढांचा कमजोर पड़ता दिख रहा है. असलियत यह है कि इस समय ईरान में नीतिगत फैसलों से ज्यादा सैन्य ताकत हावी होती जा रही है जिससे दुनिया भर के रणनीतिकार हैरान हैं.
राष्ट्रपति बनाम IRGC- बयानों से बढ़ी तल्खी
जंग के बीच राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के एक बयान ने ईरान के भीतर ही खलबली मचा दी है. उन्होंने पड़ोसी खाड़ी देशों से हमलों के लिए माफी मांगते हुए कहा था कि जब तक उनकी जमीन का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ नहीं होगा, वे हमला नहीं करेंगे. इस नरम रुख पर रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) और धार्मिक नेता आगबबूला हो गए. धार्मिक नेता हामिद रसाई ने तो सार्वजनिक रूप से राष्ट्रपति के स्टैंड को कमजोर और नामंजूर करार दे दिया. बढ़ते दबाव के चलते राष्ट्रपति को अपना माफीनामा वापस लेना पड़ा. यह घटना साफ दिखाती है कि ईरान की चुनी हुई सरकार और वहां की सैन्य संस्थाओं के बीच तालमेल की भारी कमी है और युद्ध को लेकर सबकी राय अलग-अलग है.
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IRGC और अली लारिजानी का बढ़ता कद
खामेनेई की गैर-मौजूदगी में सुरक्षा और सैन्य रणनीति से जुड़े सबसे अहम फैसले अब इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC ले रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक देश की सुरक्षा का रिमोट अब पूरी तरह सेना के हाथ में चला गया है. इस मुश्किल घड़ी में सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव अली लारिजानी एक मुख्य कड़ी बनकर उभरे हैं. वे सेना, सरकार और धार्मिक गुटों के बीच तालमेल बिठाने का काम कर रहे हैं ताकि प्रशासन पूरी तरह ठप न हो जाए. जानकारों का कहना है कि लारिजानी का अनुभव इस समय ईरान को बिखरने से बचाने में बड़ी भूमिका निभा रहा है. युद्ध के मैदान में मिसाइलें कहां दागी जाएंगी और कब पलटवार होगा, इसमें अब राष्ट्रपति से ज्यादा जनरलों की चल रही है.
कौन बनेगा नया सुप्रीम लीडर? रेस में ये नाम
ईरान को अब एक नए सुप्रीम लीडर की तलाश है जो देश को इस महायुद्ध से बाहर निकाल सके. उत्तराधिकार की इस दौड़ में सबसे पहला नाम अली खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई का है जो लंबे समय से सत्ता के करीब रहे हैं. दूसरा बड़ा नाम वरिष्ठ धार्मिक नेता अलीरेजा अराफी का है जिनका पकड़ धार्मिक संस्थानों पर काफी मजबूत मानी जाती है. हालांकि इजरायल ने पहले ही चेतावनी दे दी है कि जो भी नया नेता बनेगा, वह सीधे उनके निशाने पर होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक युद्ध जारी है, नए नेता का चुनाव टाला जा सकता है क्योंकि कोई भी इस समय अंतरराष्ट्रीय दबाव और सुरक्षा खतरों की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता. आने वाले कुछ दिन तय करेंगे कि ईरान की कमान किसके हाथ में सुरक्षित रहती है.