पहाड़ों पर एवलांच हुआ और ग्लेशियर फट गया, जिससे नेपाल में भोटेकोशी और त्रिशुला नदी में उफान आया. पहाड़ों से भारी मात्रा में मलबा और पानी आया, जो नेपाल के रासुवा जिले के 25 से ज्यादा गांवों को बहा ले गया. 26 अगस्त 2026 की सुबह पूरी दुनिया ने नेपाल में तबाही का वो खौफनाक मंजर देखा कि भारत में साल 2013 में आई केदारनाथ आपदा की यादें ताजा हो गईं. नेपाल में आई जलप्रलय अपने साथ लोगों के घर, दुकानें, सड़कें, होटल, पुल और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट तक बहा ले गई. लेकिन नेपाल में पहली बार ऐसी प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि 1978 से 2026 तक 10 बार नेपाल ऐसा ही तबाही का मंजर देख चुका है. वहीं 13 महीनों में दूसरी बार 30KM लंबे इसी नदी क्षेत्र में बाढ़ आई है.
नेपाल में 1978 से 2026 तक जलप्रलय का इतिहास
1978- तिनौ बेसिन में विनाशकारी बाढ़
1980- कोसी नदी में विनाशकारी बाढ़
1985- तादी नदी बेसिन में बाढ़ से तबाही
1987- सुनकोसी बेसिन में आई भीषण बाढ़
1993- कुलेखाणी में विनाशकारी बाढ़ आई
2008- कोसी तटबंध टूटने से विनाशकारी बाढ़
2017- भूस्खलन होने के बाद बाढ़ आई
2019- भूस्खलन होने के बाद बाढ़ आई
2024- बारिश से भूस्खलन होने पर बाढ़ आई
2026- रासुवा में ग्लेशियर फटने से फ्लैश फ्लड
1993 में आई जलप्रलय सबसे भयावह और विनाशकारी
नेपाल के इतिहास में अबतक की सबसे भयावह और विनाशकारी बाढ़ जुलाई 1993 में आई थी. 19 से 21 जुलाई के बीच 3 दिन में नेपाल के मध्य और दक्षिणी तराई इलाकों में रिकॉर्ड तोड़ बारिश हुई थी. 24 घंटे के अंदर करीब 540 मिलीमीटर पानी बरसा था. इससे बागमती नदी बेसिन में बाढ़ आई थी और भूस्खलन हुआ था. उस जलप्रलय में 1336 लोगों की मौत हुई थी. वहीं देश का सबसे बड़ा कुलेखाणी हाइड्रोपावर प्लांट डैमेज हुआ था. बागमती बैराज समेत हजारों पुल और सड़कें बह गए थे. वहीं भोटेकोशी नदी का इतिहास देखें तो साल 2025 में इसमें पानी और मलबा आया था. जिसने नेपाल और चीन को जोड़ने वाले फ्रेंडशिप ब्रिज को ढहा दिया था. ब्रिज ढहने से कई महीनों तक दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार ठप रहा था.
हिमालय में ग्लेशियर झीलें बनती और फटती रहती हैं
नेपाल में जलप्रलय आने का एक कारण नेपाल के हिमालयी क्षेत्र में बनने वाली ग्लेशियर झीलें हैं, जो सदियों पुराना सिस्टम है. इसे ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF कहते हैं. हिमालय में जब ग्लेशियर पिघलते हैं तो प्राकृतिक झीलें बन जाती हैं. हालांकि इन झीलों के आगे बर्फ या मिट्टी या पत्थरों की प्राकृतिक दीवारें होती हैं या बांध बन जाने हैं. जब गर्मी बहुत बढ़ती है या बहुत ज्यादा बारिश होती है तो झीलों में पानी भर जाता है, तब प्राकृतिक दीवार टूट जाती है और झीलों का पानी पहाड़ों से नीचे मैदानी इलाकों में आता है, जो रास्ते में आने वाले गांवों, पुलों, सड़कों और लोगों को बहा ले जाता है.
ग्लेशियर झीलों के अचानक फटने वाली आने वाली बाढ़ को ‘इनलैंड सुनामी’ कहते है. नेपाल के इंस्टीट्यूट ICIMOD की रिसर्च के अनुसार, साल 2000 के बाद हिंदूकुश हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने की दर बढ़ गई है, इसलिए इन ग्लेशियरों और उनसे निकलने वाली नदियों के किनारे रहने वाले लोगों की जिंदगी हर समय खतरे में रहती है. विश्व बैंक के रिकॉर्ड के अनुसार, नेपाल के इतिहास में ग्लेशिया झीलों के फटने से 24 बार जलप्रलय आई. 14 जलप्रलय नेपाल के अंदर आईं और 10 जलप्रलय तिब्बत के जरिए आईं. 2020 में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की रिपोर्ट में चौंकाने वाला अपडेट था.
रिपोर्ट के अनुसार, कोसी-गंडक-कर्णाली बेसिन में 3500 से ज्यादा ग्लेशियर झीले हैं, जिनमें से 47 झीलें सबसे खतरनाक हैं. इन 47 झीलों में से 25 झीलें तिब्बत में थीं, 21 झीलें नेपाल में थीं और 1 झील भारत में थी. इस रिपोर्ट के आधार पर वैज्ञानिक कहते हैं कि इन्हीं झीलों में से कोई एक झील फटी और नेपाल में बाढ़ आई.
धरती के नीचे हलचल भी जलप्रलय आने का कारण
नेपाल में जलप्रलय आने का एक कारण धरती के नीचे लगातार होने वाली हलचल भी है. नेपाल में हिमालय के नीचे भारत और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेट हैं, जो आपस में टकराती हैं और हर साल करीब 20-21 मिलीमीटर की स्पीड से एक-दूसरे की ओर बढ़ रही हैं. 5 करोड़ साल पहले इनकी आमने-सामने की टक्कर से हिमालय का निर्माण शुरू हुआ था. वहीं टेथिस महासागर को बंद कर दिया था, जिसके चलते पानी वाली पपड़ी मुड़कर ऊपर की तरफ आ गई थी, जिससे विशालकाय पहाड़ और ऊंची चोटियां बनीं. आज भी यह प्रक्रिया जारी है और जब भी प्लेट्स टकराती हैं तो उनके हिस्से टूटकर धरती की सतह से अंदर की तरफ चिपक जाते हैं, जो दबाव पड़ने पर नीचे से चोटियों को ऊपर धकेलती हैं.
इस तरह हिमालय हर साल करीब 5 मिलीमीटर ऊपर उठ रहा है. प्लेटों के लगातार टकराव से चट्टानों में भारी तनाव पैदा होता है, जो भूकंपीय तरंगों के रूप में बाहर निकलता है. 26 अगस्त को भी प्लेट्स टकराईं और पहाड़ ऊपर की ओर धकेला गया, जिससे एवलांच हुआ, ग्लेशियर झील में मलबा गिरा, जिससे दीवारें टूटीं और झील का पानी नीचे की तरफ बाढ़ के रूप में बह गया. हिमालय हर साल 5 से 10 मिमी ऊपर उठ रहा है, इसका राज IIT रुड़की के वैज्ञानिकों ने उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में एक रिसर्च करके पता लगाया. रिसर्च के अनुसार, धरती के नीचे निरंतर दबाव, तापमान और प्लेटों के आपस में टकाने की स्पीड चेंज होती रहती है. प्रति वर्ग सेंटीमीटर 250 किलो तक का दबाव पड़ता है. वहीं तापमान 530 से 600 डिग्री सेल्सियस है.
इतने ज्यादा तापमान से चट्टानें पिघलने की बजाय नरम पड़ जाती हैं. दबाव पड़ने पर वे मुड़ती हैं, खिसकती हैं और ऊपर की ओर उठती हैं. जितनी गहराई से चट्टानें ऊपर आती हैं, तनाव और तापमान कम होने पर वे हार्ड हो जाती हैं, क्योंकि 16 किमी की गहराई में तापमान 390 से 420 डिग्री रह जाता है. सतह के पास आते-आते तापमान 40 से 100 डिग्री रह जाता है और दबाव भी शून्य हो जाता. चट्टानें सख्त होकर किनारों से टूटती हैं और ऊपर सरकती हैं. जब चट्टानें सतह के पास आती हैं तो पहले से सतह पर उभरे पहाड़ों को और ऊंचा उठाती हैं. इस तरह हिमालय हर साल 5 से 10 मिमी ऊपर उठ रहा है. इसी प्रक्रिया के दौरान पहाड़ों पर एवलांच, भूस्खलन होता है जो मैदानी इलाकों में तबाही का कारण बनता है.