Exclusive Interview: क्या सच में टूटने वाला है यूनाइटेड किंगडम? स्कॉटलैंड में बैठे प्रो. ध्रुव कुमार ने बताई इनसाइड स्टोरी

यूके के इतिहास में पहली बार स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड ने लंदन के खिलाफ खोला साझा मोर्चा. 14 सितंबर को स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर्स के बीच यूके से अलग होने को लेकर हुए ऐतिहासिक समझौते (MoU) के संदर्भ में न्यूज 24 के साथ स्कॉटलैंड की आजादी के आंदोलन से जुड़े नेता प्रोफेसर ध्रुव कुमार के बीच हुई बातचीत के मुख्य अंश.

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यूनाइटेड किंगडम (UK) इस समय अपने इतिहास के सबसे बड़े संवैधानिक और राजनीतिक संकट से जूझ रहा है. 14 सितंबर को स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर्स ने ब्रिटेन से अलग होने को लेकर एक ऐतिहासिक समझौता (MoU) साइन किया है. इतिहास में पहली बार इन तीनों देशों ने लंदन के खिलाफ एक ‘यूनाइटेड फ्रंट’ तैयार किया है. न्यूज 24 के डिप्टी एग्जीक्यूटिव एडिटर विजय शंकर के साथ खास बातचीत में स्कॉटिश नेता प्रोफेसर ध्रुव कुमार ने बताया कि तीनों क्षेत्रों में इस समय नेशनलिस्ट सरकारें हैं. ये सरकारें महात्मा गांधी के दिखाए रास्ते पर चलते हुए पूरी तरह संवैधानिक और अहिंसक तरीके से अलग होना चाहती हैं. 2014 के जनमत संग्रह में स्कॉटलैंड की आजादी का प्रस्ताव महज 5% से चूका था, लेकिन आज बिना किसी सरकारी प्रचार के भी 55% से 60% जनता पूर्ण स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ी है.

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प्रोफेसर ध्रुव कुमार के बीच हुई बातचीत के मुख्य अंश

एंकर: ‘फर्स्ट मिनिस्टर’ की व्यवस्था क्या है और मौजूदा ढांचे से लोग क्यों परेशान हैं?

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  • प्रोफेसर ध्रुव कुमार: भारत में केंद्र और राज्यों के मुख्यमंत्रियों जैसा ही यह मॉडल है. यूके में इंग्लैंड का कोई अलग फर्स्ट मिनिस्टर नहीं है, ब्रिटिश पीएम ही उसका चेहरा हैं; जबकि स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड ‘डिवॉल्व्ड नेशन्स’ हैं और उनके प्रमुख ‘फर्स्ट मिनिस्टर’ कहलाते हैं. 1990 के दशक में शक्तियां मिलने के बावजूद टैक्स, व्यापार और रक्षा पर लंदन का नियंत्रण रहा. ‘डिवाइड एंड रूल’ और कोविड के बाद की ‘कॉस्ट ऑफ लिविंग क्राइसिस’ ने लोगों में आत्मनिर्णय (Self-Determination) की भावना को मजबूत किया है.

एंकर: क्या वर्तमान ब्रिटिश प्रधानमंत्री यूनाइटेड किंगडम के आखिरी प्रधानमंत्री साबित हो सकते हैं?

  • प्रोफेसर ध्रुव कुमार: 2031 तक ब्रिटेन को एकजुट रखना असंभव दिखता है. ब्रिटेन में पिछले 6–7 वर्षों में 6–7 प्रधानमंत्री बदले हैं, जो भारी राजनीतिक अस्थिरता को दर्शाता है. 2029 के चुनावों के बाद जनता का दबाव और बढ़ेगा, जिसे लंदन या राजशाही नहीं दबा पाएगी. स्कॉटलैंड के अलग होते ही वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड भी इसी राह पर बढ़ेंगे, जिससे मौजूदा दौर के पीएम यूके के आखिरी प्रधानमंत्री साबित हो सकते हैं.

एंकर: अगर ब्रिटेन यूरोपीय संघ में रहता तो क्या यह संकट टल सकता था? अलग होने के बाद क्या आप EU में जाएंगे?

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  • प्रोफेसर ध्रुव कुमार: बिल्कुल. 2016 के ब्रेग्जिट में स्कॉटलैंड और नॉर्दर्न आयरलैंड के 60% से अधिक लोगों ने EU में रहने के लिए वोट किया था, लेकिन इंग्लैंड के फैसले के कारण उन्हें जबरन बाहर होना पड़ा. इससे व्यापार और पाउंड को भारी नुकसान हुआ. अलग होने के बाद स्कॉटलैंड पहले यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (EFTA) से जुड़ेगा. स्वतंत्र स्कॉटलैंड की नीति परमाणु-मुक्त रहने और ‘वॉरफेयर’ के बजाय ‘वेलफेयर’ (जनकल्याण) पर केंद्रित होगी.

एंकर: इस पूरे मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की क्या भूमिका देखते हैं?

  • प्रोफेसर ध्रुव कुमार: डोनाल्ड ट्रंप की माताजी स्कॉटिश थीं और टर्नबेरी व एबरडीन में उनके बड़े गोल्फ रिसॉर्ट्स हैं. स्कॉटलैंड के पास नॉर्थ सी के विशाल तेल और गैस भंडार हैं, जहाँ अमेरिकी एआई व टेक कंपनियां निवेश करना चाहती हैं. इसलिए अमेरिकी राजनयिक स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दर्न आयरलैंड के इस सेल्टिक मूवमेंट पर नजर बनाए हुए हैं.

एंकर: दिल्ली में हुए 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन को यूरोप किस नजरिए से देख रहा है?

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  • प्रोफेसर ध्रुव कुमार: स्पष्ट है कि वैश्विक स्तर पर पश्चिमी ताकतों का दबदबा कम हुआ है. दिल्ली ब्रिक्स सम्मेलन ने ‘मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑर्डर’ और ग्लोबल साउथ की बढ़ती शक्ति को रेखांकित किया है. भारत इसमें संतुलित और मजबूत सेतु की भूमिका निभा रहा है, जिसके रिश्ते पश्चिम के साथ भी प्रगाढ़ हैं और वह रूस-चीन से भी संवाद साधे हुए है.

1947 में भारत के बिखरने की भविष्यवाणी करने वाला ब्रिटेन आज खुद टूटने की कगार पर खड़ा है, जबकि भारत अपनी तमाम विविधताओं के बावजूद पिछले आठ दशकों से एक मजबूत और एकजुट राष्ट्र के रूप में अडिग है.

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लेखक के बारे में

Vijay Jain

Vijay Jain

विजय कुमार न्यूज 24 में बतौर सीनियर न्यूज एडिटर कार्यरत हैं. विजय कुमार ने अपने पत्रकारिता के सफर की शुरुआत प्रिंट मीडिया के साथ की. अपने 23 साल के करियर में वह दैनिक जागरण, अमर उजाला और दैनिक भास्कर जैसे संस्थानों के साथ जुड़े रहे हैं. विजय कुमार राजनीति, चुनाव, क्राइम और करंट अफेयर्स जैसे विषयों पर तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं. विजय कुमार ने दैनिक भास्कर में रिपोर्टिंग के दौरान स्टिंग ऑपरेशन भी किए. 23 साल के अनुभव के दौरान विजय कुमार ने करियर के शुरुआती दौर में डेस्क जर्नलिस्ट रहते हुए की. विजय कुमार को 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव के अलावा बिहार, यूपी, बंगाल, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के विधानसभा चुनाव की ग्राउंड कवरेज का अनुभव है. ग्रामीण उद्योगीकरण में स्नातक की डिग्री होने के कारण विजय कुमार को ग्रामीण इलाकों की समस्याओं और उनसे जुड़ी कवरेज का खासा अनुभव है. अपने लेख के माध्यम से उन्होंने ग्रामीण इलाकों की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया है. पत्रकारिता में अनुभव: 23 साल योग्यता, डिग्री / अन्य उपलब्धियां: शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से ग्रामीण उद्योगीकरण विषय में बीए की डिग्री प्राप्त की है. विजय कुमार को पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए 2017 में 'श्रीफल जर्नलिज्म नेशनल अवॉर्ड' से सम्मानित किया गया.
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