करीब 13 साल तक बिस्तर पर बेजान पत्थर की तरह पड़े रहे 32 वर्षीय हरीश राणा को आज परिवार ने जीवन रक्षक यंत्र हटाए जाने से ठीक पहले उनके आसपास इकट्ठा होकर आखिरी विदाई दी. मां का चेहरा दर्द से भरा, ब्रह्माकुमारी दीदी ने माथे पर तिलक लगाया और भावुक स्वर में कहा – “सबको माफ कर दो, सबको माफी मांग लो. अब जाना है, ठीक है?” यह दृश्य हर किसी को रुला देने वाला है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘पैसिव यूथेनेशिया’ की अनुमति दिए जाने के बाद, हरीश को उनके गाजियाबाद स्थित निवास से दिल्ली के एम्स ले जाया गया. लेकिन इस अंतिम सफर से पहले उनके घर पर जो मंजर दिखा, उसने पत्थर दिल इंसान को भी रुला दिया.
"Forgive everyone… apologize to everyone… it’s time to go now, okay?"
Harish Rana has been brought to AIIMS, Delhi. His life support will now be removed.
13 yrs of a family’s hope, prayers and sacrifice ending today 💔 pic.twitter.com/qZt4RYtA3x---विज्ञापन---— BALA (@erbmjha) March 15, 2026
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा वीडियो
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में हरीश का परिवार उनके बिस्तर के चारों ओर खड़ा नजर आ रहा है. उनकी मां और रिश्तेदारों ने रुंधे गले से हरीश को विदा किया. हरीश राणा 2013 में चौथी मंजिल से गिरने के बाद गंभीर ब्रेन इंजरी का शिकार हो गए थे. उसके बाद से वे 13 साल से ज्यादा समय से जीवन रक्षक यंत्र पर निर्भर हैं – ट्रेकियोस्टोमी ट्यूब से सांस लेते और गैस्ट्रोजेजुनोस्टोमी ट्यूब से खाना खाते हुए बिस्तर पर ही बंधे हुए. हर मेडिकल उम्मीद खत्म होने के बाद उनके मां-बाप ने सुप्रीम कोर्ट में ‘पैसिव यूथेनेशिया’ यानी “मरने का अधिकार” की याचिका दायर की.
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला भारत में पहली बार!
पिछले हफ्ते जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने इस याचिका को मंजूर कर दिया. यह भारत का पहला ऐसा मामला है जहां किसी को ‘पैसिव यूथेनेशिया’ की इजाजत दी गई है. अदालत ने कहा, “गरिमा के साथ मरना, जीवन के अधिकार का ही हिस्सा है. हरीश के माता-पिता का यह फैसला आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि करुणा और साहस का प्रतीक है.” कोर्ट ने साफ किया कि लाइफ सपोर्ट हटाना ‘परित्याग’ नहीं है, बल्कि प्रकृति को अपना काम करने देने का मौका देना है.
अरुणा शानबाग को ‘मरने का अधिकार’ देने से इनकार
इससे पहले, सर्वोच्च न्यायालय ने अरुणा शानबाग को ‘मरने का अधिकार’ देने से इनकार कर दिया था. अरुणा शानबाग 25 वर्षीय नर्स थीं, जिन पर 1973 में मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में क्रूर यौन हमला हुआ था. इस हमले से उनके मस्तिष्क को गंभीर क्षति पहुंची और वे अगले चार दशकों तक कोमा जैसी स्थिति में रहीं. न्यायालय ने शुरू में सख्त दिशानिर्देशों के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, लेकिन बाद में फैसला सुनाया कि सक्रिय इच्छामृत्यु स्वीकार्य नहीं है, जिससे उन्हें अस्पताल के कर्मचारियों से देखभाल मिलती रही. शानबाग की 2015 में निमोनिया से मृत्यु हो गई.










