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राजस्थान

अरावली के बाद चंबल, अब घड़ियालों की जमीन पर भी सरकार की कैंची? विपक्ष ने जताई चिंता

अरावली के बाद अब चंबल…राजस्थान में पर्यावरण की “रेड लाइन्स” एक-एक कर खिसकती जा रही हैं. पहले अरावली पर्वतमाला…और अब चंबल के घड़ियाल. सरकार के एक फैसले ने वो सवाल खड़े कर दिए हैं, जो सिर्फ जंगलों के नहीं भविष्य के हैं.

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Written By: kj.srivatsan Updated: Jan 3, 2026 21:17

अरावली के बाद अब चंबल…राजस्थान में पर्यावरण की “रेड लाइन्स” एक-एक कर खिसकती जा रही हैं. पहले अरावली पर्वतमाला…और अब चंबल के घड़ियाल. सरकार के एक फैसले ने वो सवाल खड़े कर दिए हैं, जो सिर्फ जंगलों के नहीं भविष्य के हैं. कोटा बैराज तक का 732 हेक्टेयर क्षेत्र अब चंबल घड़ियाल अभ्यारण्य से मुक्त हो गया है. 1972 से लागू प्रतिबंध हटने के बाद अब कई इलाकों में निर्माण कार्य हो सकेंगे. लेकिन घड़ियालों का ठिकाना सिकुड़ जाएगा और यही पर्यावरणविदों के लिए सबसे बड़ी चिंता का कारण भी है. पढ़िए न्यूज 24 की यह खास रिपोर्ट.

अरावली को लेकर उठे विवाद अभी ठंडे भी नहीं पड़े थे कि सरकार ने पर्यावरण की दूसरी सबसे संवेदनशील सीमा पर हाथ रख दिया. इस बार निशाने पर है कोटा का राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य. कोटा से सटे चंबल के उस इलाके में, जहां दशकों से घड़ियाल, डॉल्फिन और दुर्लभ जलीय जीव सुरक्षित माने जाते थे, अब सरकारी अधिसूचना ने नक्शा ही बदल दिया.

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कोटा में घड़ियालों के लिए संरक्षित क्षेत्र हैंगिंग ब्रिज से कोटा बैराज तक के करीब 40 हजार घरों का 732 हेक्टेयर क्षेत्र अब चंबल घड़ियाल अभ्यारण्य से मुक्त हो गया है. 1972 से लागू प्रतिबंध हटने के बाद अब कई इलाकों में निर्माण कार्य हो सकेंगे. सबसे पहले नेशनल बोर्ड ऑफ वाइल्ड लाइफ (एनबीडब्लूएल) से हैंगिंग ब्रिज से लेकर कोटा बैराज तक के इलाका डिनोटिफाई हुआ.

केंद्र सरकार की ओर से सारी प्रक्रियाएं पूरी करने के बाद आखिर में राजस्थान सरकार ने भी इस क्षेत्र को घड़ियाल सेंचुरी से मुक्त करने का आदेश जारी कर दिया. 23 दिसंबर 2025 को राज्यपाल ने भी इस प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दे दी. जिसके बाद आज इसकी बकायदा अधिसूचना भी जारी कर दी गई.

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राजस्थान सरकार के वन विभाग ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत अधिसूचना जारी कर अभयारण्य के कुछ हिस्सों को विमुक्त यानी डिनोटिफाई कर दिया. मतलब साफ है जो जमीन कभी घड़ियालों की मानी जाती थी, अब वहां इंसानी निर्माण और बस्तियों को वैध माना जाएगा. हैंगिंग ब्रिज से लेकर कोटा बैराज तक का 732 हेक्टेयर का क्षेत्र राष्ट्रीय घड़ियाल अभ्यारण्य क्षेत्र से मुक्त हो गया है. करीब 206 खसरों पर लगा प्रतिबंध अब हट जाएगा, जिसके बाद किशोरपुरा का 208.56 हेक्टेयर, शिवपुरा का 320.33 हेक्टेयर, सकतपुरा का 186.36 हेक्टेयर, रामपुरा का 0.7, गुमानपुरा का 3.93 और नयागांव का 12.12 हेक्टेयर एरिया सेंचुरी से बाहर हो जाएगा. जिसके बाद लोगों को घरों से पट्टे जारी हो सकेंगे और निर्माण कार्य पर लगे प्रतिबंध भी हट जाएंगे. बस, यही कारण है कि पर्यावरणविद इसे सीधा-सीधा संरक्षण की आत्मा पर कैंची बता रहे हैं.

सरकार का तर्क है कि यह फैसला राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की सिफारिश पर और वन्यजीव अधिनियम की धारा 26-क (3) के तहत लिया गया है. वह इसे तकनीकी और प्रशासनिक सुधार करार देकर दावा कर रही है और इससे घड़ियालों के मुख्य आवास पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन सवाल यही है क्या कागजों में सुरक्षित लिखा होना, जमीन पर सुरक्षित होने की गारंटी है? यही कारण है कि विपक्ष अब इस फैसले को लेकर अपनी आपत्ति जाता रहा है. विपक्ष इसे खतरनाक मिसाल बता रहा है. उसका कहना है आज 8 हेक्टेयर, कल 80 हेक्टेयर. एक बार दरवाजा खुला, तो विकास के नाम पर जंगल सिकुड़ते चले जाएंगे.

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दरअसल, राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्म साल 1983 में अधिसूचित किया गया था. राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमाओं से गुजरती चंबल — जहां भारत के सबसे संवेदनशील जलीय जीव पाए जाते हैं. अब करीब 40 साल बाद, कोटा जिले के किशनपुरा, बस्ती लाडपुरा समेत 11 खसरों की लगभग 8 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन अभयारण्य से बाहर कर दी गई है.

उधर, सरकार भरोसा दिला रही है कि घड़ियाल और डॉल्फिन के मुख्य क्षेत्र सुरक्षित रहेंगे. लेकिन पर्यावरण विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं संरक्षण अगर नक्शे तक सीमित रह गया, तो जमीन पर सिर्फ सन्नाटा बचेगा. आज सवाल चंबल का है… कल सवाल किसका होगा! अरावली के बाद चंबल…और चंबल के बाद कौन? सवाल खुला है…और जवाब अब सरकार को देना है.

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First published on: Jan 03, 2026 08:31 PM

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